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नोटबंदी की नाकामी की गाज मुखौटा कंपनियों पर

एन सुंदरेश सुब्रमण्यन /  09 10, 2017

मुखौटा कंपनियों का नकाब उतारने की कवायद

सरकार कथित रूप से नोटबंदी को नाकाम करने वालों के पीछे हाथ धोकर पड़ी है जिससे नए तरह के विवाद पैदा हो रहे हैं।

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की वार्षिक रिपोर्ट आने के बाद नोटबंदी के आलोचक और मुखर हो गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक चलन से बाहर किए गए 99 फीसदी नोट बैंकिंग प्रणाली में वापस आ गए हैं। सरकार को संदेह है कि काले धन के खिलाफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस मुहिम को पलीता लगाने में मुखौटा कंपनियों ने अहम भूमिका निभाई थी। यही वजह है कि सरकार अब हाथ धोकर इन कंपनियों के पीछे पड़ गई है।

हालांकि मुखौटा कंपनियों के खिलाफ अभियान 3 महीने पहले ही शुरू हो गया था लेकिन मंगलवार को सरकार ने 200,000 से अधिक कंपनियों के बैंक खातों पर रोक लगा दी। कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय ने इन कंपनियों का पंजीकरण रद्द कर दिया है। साथ ही उसने इन कंपनियों के निदेशकों को हटाने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है। इतना ही नहीं सरकार ने बैंकों से भी इन कंपनियों की निगरानी बढ़ाने को कहा है। वित्त मंत्रालय ने बैंकों को निर्देश दिया है कि अगर किसी कंपनी को कॉरपोरेट मंत्रालय की वेबसाइट पर चालू स्थिति में भी दिखाया गया है लेकिन उसने वित्तीय विवरण या सालाना रिटर्न (खासतौर से सुरक्षित ऋण के चलते संपत्तियों पर कोई भार हो) जमा कराने में चूक की है तो प्रथम दृष्टया ऐसी कंपनी को संदेह की दृष्टि से देखा जाएगा। माना जाएगा कि वह अपनी अनिवार्य सांविधिक जिम्मेदारी का अनुपालन नहीं कर रही है। इस तरह की सूचना हितधारकों के लिहाज से महत्वपूर्ण होती है।

इसके अलावा भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) जैसे अन्य नियामकों ने भी ऐसी कंपनियों पर निगरानी बढ़ाने के निर्देश दिए हैं। शेयर बाजारों ने पिछले महीने 331 सूचीबद्ध कंपनियों के कारोबार पर रोक लगा दी थी। इन कंपनियों की गतिविधियों के बारे में गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय और आयकर विभाग ने शेयर बाजार नियामक को जानकारी दी थी। हालांकि इन संदिग्ध मुखौटा कंपनियों में से कुछ ने प्रतिभूति अपीलीय पंचाट से स्थगनादेश ले लिया लेकिन 200 से अधिक कंपनियां वगीकृत निगरानी उपायों के चौथे चरण के अधीन रखी गई हैं। इसके तहत उन्हें महीने में केवल एक ही बार (पहले सोमवार को) शेयरों के कारोबार की अनुमति है और उसमें भी कई तरह की बंदिशें हैं।

सेबी की इस बात के लिए आलोचना की जा रही है कि उसने इन कंपनियों को अपना पक्ष रखने की अनुमति नहीं दी। हाल तक वित्त राज्य मंत्री रहे अर्जुन राम मेघवाल ने इसे सही ठहराते हुए कहा कि अगर उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाता तो फिर इसमें चौंकाने वाला तत्व नहीं रहता। उन्होंने कहा, 'अगर ऐसा होता तो शायद कंपनियां आदेश जारी होने से पहले ही स्थनगादेश ले लेतीं।' सरकार और सेबी द्वारा की जा रही कार्रवाई में असली दिक्कत यह है कि मुखौटा कंपनियों की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है। किसी भी कंपनी कानून में मुखौटा कंपनियों को परिभाषित नहीं किया गया है और इसी खामी की वजह से प्रतिभूति अपीलीय पंचाट ने इनमें से कुछ कंपनियों के खिलाफ सेबी के आदेश को खारिज कर दिया।

तो फिर सरकार और सेबी किस आधार पर मुखौटा कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई कर रहे हैं? दिल्ली के एक सीनियर ब्रोकर ने कहा कि सरकार यह साबित करना चाहती है कि नोटबंदी अपने मकसद में नाकाम नहीं रही। मुखौटा कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई इसी उसकी मुहिम का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि नोटबंदी के आलोचक इस बात को ज्यादा रेखांकित कर रहे हैं कि चलन से बाहर किए गए नोटों में से अधिकांश बैंकिंग प्रणाली में लौट आए हैं। ब्रोकर ने कहा, 'यह बात मानने के पर्याप्त कारण हैं कि काले धन का उल्लेखनीय हिस्सा कोलकाता की हजारों मुखौटा कंपनियों के जरिये बैंकिंग प्रणाली में लौट आया है।' इनमें से कई सूचीबद्ध कंपनियों के पास वास्तविक शेयरधारक नहीं हैं।

ब्रोकर ने कहा कि इनमें से कई कंपनियों पर प्रवर्तकों का दबदबा है। यहां तक कि इनमें से कुछ कंपनियों में सार्वजनिक शेयरधारक भी प्रवर्तकों के ही बेनामी हैं। इन कंपनियों की हिस्सेदारी (बेनामी या अन्यथा) भी विवाद के प्रमुख कारणों में से एक है। इनमें से करीब आधी कंपनियां शेयर कारोबार में सक्रिय नहीं हैं लेकिन उनके पास अच्छी खासी संख्या में सार्वजनिक शेयरधारक हैं। बिज़नेस स्टैंडर्ड के एक आंकलन के मुताबिक इन कंपनियों के शेयर कारोबार पर रोक लगाने के सेबी के फैसले से 27 लाख खुदरा शेयरधारक और 9,000 करोड़ रुपये का सावर्जनिक स्वामित्व प्रभावित हुआ।

मिडास टच इनवेस्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष वीरेंद्र जैन ने कहा कि अलग-अलग तरह की कंपनियों में अंतर करना जरूरी है। उन्होंने कहा, 'कुछ कंपनियां मुख्य रूप से कर चोरी और काले धन को सफेद बनाने के लिए स्थापित की जाती हैं और अवैध गतिविधियों से कमाई करती हैं। यह एक गंभीर मुद्दा है। लेकिन कुछ ऐसी कंपनियां भी होती हैं जिनके बाकायदा निवेशक होते हैं। उनसे अलग तरीके से निपटने की जरूरत है।'

जैन का मानना है कि मुखौटा कंपनियों को समाप्त करना कोई सजा नहीं है। उन्होंने कहा, 'वे घोड़े के आगे गाड़ी रख रहे हैं। बंद होने के बाद ये कंपनियां कंपनी कानून के दायरे से बाहर हो जाएंगी। ऐसा करने के बजाय इन कंपनियों और उनके प्रवर्तकों के खिलाफ मुकदमा चलना चाहिए और उन्हें जेल भेजा जाना चाहिए। इन मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतें होनी चाहिए।' जैन ने प्रतिभूति अनुबंध नियामक कानून के प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि सूचीबद्ध कंपनियों के मामले में सूचीबद्धता नियमों के उल्लंघन की उचित प्रक्रियाओं का पालन किया जाना चाहिए ताकि निवेशकों के हितों की रक्षा की जा सके। इस कानून में सूचीबद्धता खत्म किए जाने और शेयरधारकों के लिए बाहर निकलने का विकल्प है। इस दौरान शेयर कारोबार जारी रहेगा।

हालांकि जानकार जैन की राय से सहमत नहीं हैं। शेयरहोल्डर्स एम्पावरमेंट सर्विसेज के प्रबंध निदेशक जे एन गुप्ता ने कहा, 'अगर मैं कंपनी में फंस गया हूं तो मुझे परेशान होने दीजिए। मुझे अपनी परेशानी दूसरों को देने की अनुमति क्यों दी जानी चाहिए। इस तरह समस्या का समाधान नहीं होगा।' मुखौटा कंपनियों का रहस्य और नोटबंदी को नाकाम करने में उनकी भूमिका की गुत्थी जल्दी सुलझने वाली नहीं है।

Keyword: demonetization, RBI, shell companies,
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