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कर्नाटक में विपक्ष के पराभव से भाजपा के उभार को मिला संबल

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  September 08, 2017

कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का उभार और अन्य राजनीतिक ताकतों का पतन होने से वहां के समाज में हिंसात्मक विरोधाभास पैदा हो रहा है। श्रीराम सेना और हिंदू जागरण वेदिके का उदय इसकी बानगी हैं। ऐसा लगता है कि गौरी लंकेश इसी राजनीतिक प्रक्रिया की भेंट चढ़ी हैं, हालांकि अभी पुलिस जांच चल रही है । कर्नाटक में भाजपा की चुनावी कामयाबी का सिलसिला 1983 से शुरू होता है। अमरनाथ गोविंदराजन ने स्वराज्य पत्रिका में इस राज्य में भाजपा के विकास के इतिहास को बखूबी बयान किया है। उनका कहना है कि कर्नाटक में भाजपा की जड़ें जमाने में यू रामा भट की अहम भूमिका रही है। अपने निर्वाचन क्षेत्र पुत्तूर में रामा भट ने मंगलूर के आसपास भाजपा को खड़ा करने के लिए कड़ी मेहनत की थी। हालांकि इस इलाके में पहले से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की उपस्थिति थी और केरल से आए मुस्लिम शरणार्थियों के खिलाफ हिंदू भावनाओं को स्वर देने की कोशिश की थी। असर यह हुआ कि 1980 के दशक से पहले भी मंगलूर इलाके में भाजपा और आरएसएस का अच्छा-खासा प्रभाव स्थापित हो चुका था। खासकर वहां के किसानों ने 'सुरक्षाÓ के लिए आरएसएस से जुडऩा शुरू कर दिया था।

 
कर्नाटक के भूतपूर्व जिलों दक्षिण कन्नड़ और उत्तर कन्नड़ में सक्रिय रामा भट की कोशिशों से भाजपा को 1983 के विधानसभा चुनाव में 18 सीट मिली थीं। राज्य में भाजपा को मिली यह पहली उल्लेखनीय कामयाबी थी। उस चुनाव से धनंजय कुमार, रुकमय्या पुजारी, वसंत बांगेरा, वी एस आचार्य और डी वी सदानंद गौड़ा जैसे नेता उभरे थे। हालांकि राज्य में आठ फीसदी मत हासिल कर भाजपा ने अपने आगमन का ऐलान कर दिया था लेकिन उसकी मौजूदगी केवल पश्चिमी तट के एक छोटे इलाके तक ही सीमित थी। मैसूर में एन गंगाधर और शिमोगा में बी एस येदियुरप्पा का भी सीमित प्रभाव था।
 
भाजपा ने पश्चिमी तट पर काजू और कॉफी की खेती करने वाले किसानों के बीच अपनी पैठ बना ली थी लेकिन बड़े किसानों के बीच अब भी उसकी खास उपस्थिति नहीं थी। इसका नतीजा यह हुआ कि 1985 में हुए अगले चुनावों में भाजपा का मंगलूर समेत पूरे राज्य से लगभग सफाया ही हो गया। विधानसभा में केवल दो सदस्यों को ही वह पहुंचा पाई। लेकिन 1989 में हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा ने शानदार वापसी की और आश्चर्यजनक ढंग से 118 सीट जीतीं।
 
वर्ष 1991 आने तक बेंगलूरु शहर के अभिजनों को भी हिंदुत्व के उभार का अहसास हो चुका था। येदियुरप्पा ने कर्नाटक के प्रभावी समुदायों के बीच भाजपा की पैठ बनाने में अहम भूमिका निभाई। वह खासकर लिंगायत समुदाय को यह अहसास दिला पाने में सफल रहे कि उनके हित भाजपा के साथ ही सुरक्षित हैं। इसका नतीजा यह हुआ कि 1991 के लोकसभा चुनाव में भाजपा कर्नाटक से चार सीट जीतने में सफल रही। पार्टी ने 1994 के चुनाव में सत्तारूढ़ कांग्रेस के खिलाफ पनपी सत्ता-विरोधी लहर का भी जमकर फायदा उठाया। इस मामले में भाजपा ने पुराने मैसूर क्षेत्र से इतर अन्य इलाकों में जनता दल को भी पीछे छोड़ दिया। मैसूर इलाके में उस समय भी एच डी देवेगौड़ा की अगुआई में वोक्कलिगा समुदाय का वर्चस्व बना हुआ था।
 
वर्ष 1990 के दशक के मध्य तक भाजपा के पास तगड़ा जनाधार हो चुका था। बेंगलूरु, मैसूर और हुबली जैसे शहरी इलाकों के अलावा तटीय मैदान और मलनाड इलाकों में उसकी गतिविधियां काफी तेज हो गई थीं। हुबली-धारवाड़ इलाके में भी ईदगाह मैदान विवाद के चलते भाजपा को मजबूती मिली। इसके चलते 1996 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने दक्षिण बेंगलूरु, मंगलूर और बीदर सीटें बरकरार रखने के साथ ही दावणगेरे, उत्तर धारवाड़ और उत्तर कन्नड़ को भी अपने कब्जे में ले लिया।
 
उस समय तक रामकृष्ण हेगड़े द्वारा गठित जनता दल लोकशक्ति भी कमजोर हो चला था। भाजपा ने हेगड़े का सहारा लेते हुए जनता दल में विभाजन करा दिया। इसके बाद जनता दल के तमाम नेता भाजपा के पाले में आ गए। उस समय किसान संगठनों को भी यह लगने लगा था कि जनता दल के बजाय भाजपा ही उनकी मददगार हो सकती है। कर्नाटक राज्य रैयत संघ के जरिये भाजपा को राज्य की ताकतवर चीनी लॉबी का भी समर्थन मिल गया। इसने बेलगाम, बीजापुर और बगलकोट इलाके में भाजपा को मजबूत बना दिया। हालांकि जनता दल और भाजपा के एक साथ आने से परेशानियां भी खड़ी हुईं। जे एच पटेल सरकार के खिलाफ सत्ता-विरोधी रुझानों के चलते 1999 के चुनाव में भाजपा को भी करारी हार का सामना करना पड़ा। इसका परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस ने कर्नाटक के किले पर दोबारा कब्जा कर लिया।
 
बहरहाल भाजपा ने 2004 का चुनाव आने तक खुद को संभाल लिया था और पूरी एकजुटता दिखाते हुए शानदार प्रदर्शन किया। उसने अपने पुराने गढ़ों के अलावा जनता दल के भी प्रभाव क्षेत्रों में सेंध लगाते हुए 79 सीटें जीत ली थीं। उसके बाद भाजपा का बड़ी तेजी से विस्तार हुआ लेकिन उसमें बड़ी तादाद महत्त्वाकांक्षी नेताओं की थी। रेड्डïी बंधुओं जैसे नेताओं के शामिल होने से भाजपा का स्वरूप बिल्कुल बदल चुका था। 
 
उसके बाद भाजपा ने एच डी कुमारस्वामी धड़े के साथ गठजोड़ किया लेकिन वह बुरी तरह नाकाम साबित हुआ। 2008 के चुनाव में भाजपा सत्ता के करीब पहुंची लेकिन येदियुरप्पा ने अपनी मर्जी से कर्नाटक में पार्टी को चलाने की शर्त रख दी। उन्होंने भाजपा के कई नेताओं को एक-एक कर ठिकाने लगाया जबकि केंद्रीय नेतृत्व इसे नजरअंदाज करता रहा। भाजपा के बीच नेतृत्व के लिए मचे सत्ता संघर्ष ने तमाम गुटों और सामुदायिक राजनीति को जन्म दिया है जिनके नेता जल्द शोहरत पाने की तिकड़म में लगे रहते हैं। जल्द चर्चा में आने के लिए किसी अजीब काम से बेहतर क्या हो सकता है? इसने गौरी लंकेश को चिंतित किया था।
Keyword: karnataka, BJP, congress,,
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