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विमुद्रीकरण पूरी तरह नाकाम नहीं

अशोक लाहिड़ी /  September 08, 2017

क्या यह आरोप सही है कि नोटबंदी जल्दबाजी में लिया गया निर्णय था। बहरहाल, इसे पूरी तरह विफल बताना भी सही नहीं होगा। सभी संबद्ध पहलुओं की जानकारी दे रहे हैं अशोक लाहिड़ी 

 
वर्ष 2016 में 8 नवंबर को देश में प्रचलित 500 और 1,000 रुपये की मुद्रा का चलन बंद कर दिया गया। यह देश की कुल प्रचलित मुद्रा के 80 फीसदी से ज्यादा थी। कुछ आलोचकों  ने इसे अघोषित देशव्यापी हड़ताल की उपमा दी तो किसी ने इसे संगठित और कानूनी लूट करार दिया। इसे जल्दबाजी में लिया गया निर्णय करार दिया गया। क्या नोटबंदी के चलते 13 मार्च, 2017 तक नकदी की जबरदस्त तंगी और आर्थिक गतिविधियों में बाधा बनी रही? भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की वर्ष 2016-17 की सालाना रिपोर्ट और केंद्रीय सांख्यिकी संस्थान (सीएसओ) के चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही के सकल मूल्य वर्धन के गत सप्ताह जारी किए गए आंकड़ों पर नजर डालें तो कुछ उपयोगी जानकारी सामने आती है। 
 
नकदी से कारोबारी चक्र सुचारु रूप से चलता रहता है। नोटबंदी के बाद हुई नकदी की तंगी ने सकल मूल्यवर्धन की वृद्घि को प्रभावित किया। वर्ष 2014-15 के 7.2 फीसदी के स्तर से सुधरकर यह वर्ष 2015-16 में 7.9 फीसदी के स्तर पर आया लेकिन वर्ष 2016-17 में गिरकर 6.6 फीसदी रह गया। इस पूरी गिरावट के लिए तो नहीं लेकिन इसके एक हिस्से के लिए जरूर नोटबंदी उत्तरदायी थी। 
 
बिना नोटबंदी के भी निवेश में कमी के चलते गिरावट का रुख तो था ही। निवेश में कमी का यह दौर आरबीआई के शब्दों में कारोबारी यकीन के छीजते जाने और उद्यमिता की भावना पर असर पडऩे के कारण उत्पन्न हुआ था। आर्थिक समीक्षा के मुताबिक यह दोहरी बैलेंस शीट की समस्या के चलते उत्पन्न हुआ था। इतना ही नहीं ऋण बाजार की बात करें तो नोटबंदी के बाद उनके लिए तरलता में सुधार हुआ और माना जा सकता है कि बैंकों को नोटबंदी के प्रभाव पर इस मोर्चे पर तो अंकुश लगाने में सफलता मिली। 
 
देश के जीवीए में सालाना आधार पर वृद्घि में गिरावट आई है और वह वर्ष 2015-16 की चौथी तिमाही के 8.7 फीसदी से गिरकर वर्ष 2016-17 की चौथी तिमाही में 5.6 फीसदी पर आ गई। सीएसओ के हालिया आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2017-18 की पहली तिमाही में भी यह दर पूरी तरह अपरिवर्तित रही। अब जबकि नकदी की कमी अतीत का किस्सा हो गई है तो क्या एक ईमानदार कर संस्कृति के लाभ मिलेंगे और क्या कम नकदी आधारित अर्थव्यवस्था तथा नकली मुद्रा में कमी देखने को मिलेगी?
 
आरबीआई की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक 30 जून, 2017 तक 15.28 लाख करोड़ रुपये मूल्य की नकदी बैंक के पास वापस आ गई थी। 29 नवंबर, 2016 को वित्त राज्य मंत्री द्वारा राज्य सभा में दिए गए वक्तव्य को आधार मानें 99 फीसदी नकदी दो माह पहले ही दोबारा लौट आई। सन 1946 की नोटबंदी में 93.7 फीसदी और 1978 में केवल 89 फीसदी मुद्रा चलन में वापस आई थी। 
 
50 फीसदी कर चुकाकर और 25 फीसदी राशि गरीब कल्याण योजना में चार साल तक बिना ब्याज के जमा करने जो व्यवस्था की गई थी उसे लेकर भी कोई खास उत्साह देखने को नहीं मिला। इस योजना के तहत केवल 5,000 करोड़ रुपये का जमा सामने आया। जिन लोगों ने उच्च मूल्य नोट में काला धन रखा था वे अपना पैसा बैंक में जमा कर आए। जाहिर है उनको इस बात से डर नहीं लगा कि वे पकड़े जाएंगे और उनको जुर्माना देना होगा। बैंकों के पास यह जानकारी उपलब्ध है कि 31 दिसंबर, 2016 के पहले किसने बैंकों में कितनी रकम जमा की। प्रधानमंत्री ने स्वतंत्रता दिवस के दिन लाल किले के प्राचीर से देश को बताया कि 1.75 लाख करोड़ से अधिक ऐसे जमा मामलों पर सरकार की नजर है। 
 
अगर नोटबंदी को जल्दबाजी में अंजाम दिए जाने के आरोपों में जरा सी भी सच्चाई है तो भी इसे पूरी तरह विफल करार देना भी सही नहीं होगा। अगर लोगों के सामने कर वंचना करने वालों की तस्वीर साफ हो जाए और सामने आई राशि तथा जुर्माने की राशि प्रकट हो तो शायद नोटबंदी का दंश झेलना कुछ सहज हो सके। वहीं अर्थव्यवस्था में नई नकदी लाने के क्रम में नए नोट छापने और बाजार में पहुंचाने की लागत शामिल है। वर्ष 2016-17 के दौरान आरबीआई की नकदी छापने की लागत बढ़कर 7,965 करोड़ रुपये हो गई जबकि इससे पिछले वर्ष यह 3,420 करोड़ रुपये थी। प्रचलित मुद्रा की बात करें तो 8 नवंबर, 2016 के बाद इसमें गिरावट आई थी लेकिन अब हालात काफी सुधर चुके हैं। परंतु जीडीपी के एक हिस्से के रूप में देखें तो मार्च के अंत में यह 8.8 फीसदी ही थी जबकि पिछले साल इसका स्तर 12.2 फीसदी था। नोटबंदी के बाद डिजिटल भुगतान ने जोर पकड़ा जो स्वागतयोग्य है। इससे लेनदेन की लागत कम होती है और पारदर्शिता बढ़ती है। बहरहाल, इससे आरबीआई की आय भी कम हुई। आरबीआई प्रचलित मुद्रा का इस्तेमाल आय बढ़ाने वाली परिसंपत्तियों के लिए करता है। सरकारी प्रतिभूतियां एवं बैंकों को दिया जाने वाला ऋण इसका उदाहरण है। इसके अलावा नकदी में आई कमी मौद्रिक योजना तैयार करने की दृष्टिï से भी मायने रखती है। आरबीआई की सालाना रिपोर्ट में इस बात पर भी चर्चा है कि कैसे नकदी कम होने से मौद्रिक गुणक में बदलाव आया है लेकिन आरबीआई की शुद्घ आय पर इसका क्या असर होगा इस बारे में कुछ नहीं कहा गया है। 
 
नोटबंदी का एक लक्ष्य नकली नोट पर अंकुश लगाने का भी था। आरबीआई की सालाना रिपोर्ट में कहा गया है कि बैंकों और आरबीआई ने वर्ष 2016-17 में 500 के 3.2 लाख पुराने नोट और 1,000 के 2.6 लाख पुराने नोट पकड़े। यह पूरी राशि केवल 41.5 करोड़ रुपये है। यह समस्या अभी भी बहुत विशद स्तर पर नहीं पहुंची है। यह बात आश्वस्त करने वाली है। हां, नोटबंदी ने इस बारे में कुछ अंतर्दृष्टिï प्रदान करने का काम अवश्य किया है। यह काम करेंसी चेस्ट और आरबीआई के स्तर पर किया गया। आरबीआई ने पाया कि वर्ष 2015-16 से 2016-17 के बीच प्रति 10 लाख नोटों में नकली नोटों की संख्या औसतन दोगुनी हो गई। 500 और 1,000 दोनों ही नोटों में यह बढ़ी। वहीं करेंसी चेस्ट में इसकी तुलनात्मक तादाद और भी ज्यादा थी। द्वितीय विश्वयुद्घ के दौरान हिटलर ने भी यूनाइटेड किंगडम में नकली पाउंड की बौछार करने का प्रयास किया था वहीं स्टालिन ने भी सन 1928 में अमेरिका में नकली डॉलर की भरमार करनी चाही थी। इन कोशिशों को समय पर कदम उठाकर ही रोका जा सका था। भारतीय उपमहाद्वीप की भू राजनीति को देखते हुए नोटबंदी के बाद के हालात का करीबी अध्ययन आवश्यक है। 
Keyword: नोटबंदी, विमुद्रीकरण, economy,,
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