Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Saturday, September 23, 2017 07:58 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|
 
होम विशेष खबर

नई हकीकत

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  September 08, 2017

किसी रुझान को तय होने में कितने वर्ष लगते हैं? अगर आप बीते छह सालों (2011-17) को लें तो अर्थव्यवस्था में 6.65 फीसदी की दर से वृद्धि हुई है। अगर चालू वर्ष में यह रुख बरकरार रहता है तो लगातार सात वर्षों के दौरान हमारी अर्थव्यवस्था 7 फीसदी की दर से नीचे रह जाएगी। वृद्घि को देखें तो 7 फीसदी की दर वह सीमा है जिसके पार यह माना जाता है कि अर्थव्यवस्था में तेज वृद्घि हो रही है। दूसरे शब्दों में कहें तो हमारा देश अब तेज वृद्घि वाली अर्थव्यवस्था नहीं रह गया है। यह एक-दो वर्ष का नहीं बल्कि सात साल का रुझान है।

 
फिर भी आज तक यह अनुमान जताया जा रहा है कि अर्थव्यवस्था जल्दी ही 7 फीसदी का स्तर पार कर लेगी। ऐसी उम्मीद दरअसल इसलिए जगती है क्योंकि वर्ष 2003 से 2011 तक आठ साल की अवधि में देश की औसत वृद्घि दर 8.4 फीसदी रही थी। परंतु यह वह दौर था जब पूरी दुनिया में तेजी का रुझान था। निकट भविष्य में तेजी वापस आती नहीं दिखती। आप कह सकते हैं कि आज के हालात भी सामान्य नहीं हैं। भारत में कंपनियां और बैंक ऋण की समस्या से ग्रस्त हैं और नोटबंदी तथा कर संबंधी बदलाव के कारण भारी विसंगति उत्पन्न हुई है। विश्व अर्थव्यवस्था में भी सुधार हो रहा है लेकिन उसकी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। फिलहाल हालात सामान्य से कमजोर ही हैं। सवाल यह पूछा जाना चाहिए कि इनमें कितनी जल्दी सुधार होने की उम्मीद है ताकि हालात सामान्य हो सकें। 
 
यह मान लेना उचित होगा कि नोटबंदी और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू होने से उपजी समस्या अगली छमाही में समाप्त हो जाएगी। उससे वृद्घि को गति मिल सकती है। खासतौर पर यह देखते हुए कि पिछले साल कर आधार कम था। आने वाली कुछ तिमाहियों में 7 फीसदी से अधिक दर देखने को मिल सकती है परंतु वह स्थायी होगी या नहीं यह देखने वाली बात होगी। 
 
बैंक बैलेंस शीट की बात करें तो वह पहले ही संकट में है। आगे उसमें और कमजोरी आएगी, अगर नया दिवालिया कानून लागू कर दिया जाता है तो इससे बैंक ऋण को और अधिक तादाद में बट्टïे खाते में डाला जाएगा। नए ऋण की गुणवत्ता भी एक समस्या है। यह दिक्कत बिजली और दूरसंचार क्षेत्र में उभरी है। बैंकों की कमजोर स्थिति उनके द्वारा जारी किए जाने वाले ऋण को भी निकट भविष्य में कमजोर ही बनाए रखेगी। बात करें निर्यात की तो हाल के वर्षों में हम विश्व व्यापार में अपनी हिस्सेदारी बरकरार रख पाने में नाकाम रहे हैं। उसे बढ़ाना तो दूर की बात है। विश्लेषकों का कहना है कि रुपया अधिमूल्यित है लेकिन अधिकारियों ने ऐसी दलीलों पर कोई ध्यान ही नहीं दिया है। अधिकांश क्षेत्रों में जहां अतिरिक्त क्षमता मौजूद है, वहां समुचित निवेश नहीं है इसलिए सुधार नहीं हो पा रहा। आर्थिक समीक्षा के दूसरे हिस्से में कहा गया है कि दुनिया की कोई अर्थव्यवस्था खराब निर्यात, कम निवेश और ऋण की कमी से जूझते हुए 7 फीसदी की वृद्घि दर हासिल नहीं कर सकती।
 
इस अनुमान के बीच जरा अंदाजा लगाइए कि उन छोटे और असंगठित उद्योगों का क्या हश्र हुआ होगा जो रोजगार की दृष्टिï से बहुत अहम रहे हैं। नोटबंदी ने उनको बड़ी कंपनियों की तुलना में कहीं अधिक गहरा झटका दिया। उसके पश्चात जीएसटी के आगमन ने भी अपना असर डाला क्योंकि शुरुआत में भारी कागजी कार्रवाई के चलते आर्थिक गतिविधियां बड़ी कंपनियों तक सीमित हो गईं। यहां भी असंगठित क्षेत्र के लिए बड़ा जोखिम उत्पन्न हो गया। तीसरी बात, इस क्षेत्र को जो बैंक ऋण मिला भी उसमें सरकारी बैंकों का ही योगदान रहा, निजी का बहुत कम। आने वाले महीनों में यह संभावना भी धूमिल है क्योंकि सरकारी बैंक शायद ही अपने पोर्टफोलियो का विस्तार करें। 
 
कहा जा सकता है कि अतीत में जो उद्योग वृद्घि के वाहक रहे हैं वे अपनी गति खो चुके हैं। उनकी जगह लेने वाली कोई नई फर्म सामने नहीं आ रही है। जिन स्टार्टअप की बदौलत उत्साह का माहौल पैदा होता था वह भी अब खो गया है। कारोबारी जगत में भी कोई नया सितारा उभरता नहीं दिख रहा है। नब्बे के दशक में ऐसे अनेक अवसर सामने आए थे। निश्चित तौर पर अर्थव्यवस्था के सकारात्मक तत्त्व इन नकारात्मक रुझानों को समाप्त कर देंगे लेकिन निरंतर 7 फीसदी की वृद्घि दर हासिल करना तो अभी भी दूर की कौड़ी ही लग रही है। उसके लिए कुछ गंभीर सुधारों की आवश्यकता होगी जो अब तक नदारद रहे हैं। 
Keyword: india, economy, IIP,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
Advertisements 
Cover from Natural Calamities. Buy Home Insurance
Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
  आपका मत
 क्या बुलेट ट्रेन के लिए देश भर में बने हीरक चतुर्भुज?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS General News   Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.