बिजनेस स्टैंडर्ड - दीर्घकालिक अनिश्चितता के खतरे अनेक
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Wednesday, November 22, 2017 11:02 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|
 
होम विशेष खबर

दीर्घकालिक अनिश्चितता के खतरे अनेक

नीलकंठ मिश्रा /  September 07, 2017

लंबे समय तक बरकरार अनिश्चितता वृद्घि के लिए घातक साबित हो सकती है। अर्थव्यवस्था को मौद्रिक और राजकोषीय मदद की आवश्यकता हो सकती है। विस्तार से बता रहे हैं नीलकंठ मिश्रा

 
भारतीय अर्थव्यवस्था में इस बात को लेकर लगभग आम सहमति बन चुकी है कि दीर्घकालिक मजबूती के लिए अल्पकालिक कमजोरी से निबाह करना होगा। लाखों श्रमिकों के कृषि क्षेत्र से दूर होने, वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी), दिवालिया कानून का प्रवर्तन और रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण (रेरा) जैसे ढांचागत बदलावों ने दशकों पुराने कारोबारी मानकों को बदल दिया। इसकी बदौलत काफी समय से लंबित व्यवस्थागत सफाई और प्रतिष्ठिïत नए और किफायती नियम सामने आए। अब पूरे हालात कुछ ऐसे हैं जैसे किसी मकान के पुनर्निर्माण के समय देखने को मिलते हैं। शोरगुल और धुआं, सहजता का अभाव और लगातार इस बात की चिंता कि यह सारी असहजता का कुछ नतीजा भी निकलेगा या नहीं? चीजें दोबारा सामन्य हो सकेंगी या नहीं?
 
निवेशक और मतदाता दोनों अल्पावधि के दर्द से गुजरने को तैयार नजर आते हैं। शायद उनके पास इसके अलावा कोई विकल्प भी नहीं है। व्यापक खपत वाली जिंसों मसलन तेल, सीमेंट और बिजली आदि की कमजोर मांग, ऋण वृद्घि का कई दशकों के निचले स्तर पर होना और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में संशोधन के उपरांत कमी करना तथा इस वर्ष के आय अनुमानों की स्थिति के चलते भी बाजार में समुचित समायोजन देखने को नहीं मिला है। अगले वित्त वर्ष के अनुमानों को लेकर आशावाद है, हालांकि आर्थिक स्थितियां अस्थिर ही नजर आ रही हैं। वाहन और विमानन आदि क्षेत्रों में अवश्य सुधार देखने को मिला है। 
 
अहम सवाल यह है कि आर्थिक उथलपुथल कब तक जारी रहेगी। कुछ वर्ष तक चलने वाली मंदी लंबी अवधि में इस आशावाद की कड़ी परीक्षा लेगी। हमें इस मंदी से गुजरते एक वर्ष का समय तो पहले ही बीत चुका है। दुर्भाग्य की बात है कि कई वृहद आर्थिक मानकों पर हालत खराब हुई है। मानो कोहरा सा छा गया हो। हमें वृद्घि के बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं है। राजकोषीय घाटे, बैंकिंग व्यवस्था की स्थिति, मुद्रास्फीति और यहां तक कि मुद्रा को लेकर भी बहुत अच्छी समझ नहीं है। वृद्घि की बात करें तो फिलहाल यह अनुमान तो लग रहा है कि जीएसटी के चलते अनुपालन में इजाफा हो रहा है, हालांकि यह किस हद तक हो रहा है इसका आकलन करना मुश्किल है। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर के बीच बहुत प्रतीक्षित जुड़ाव से भी मदद मिल सकती है। 
 
कई अनचाहे बदलाव भी सामने आए हैं। इनमें से प्रत्येक वांछित है लेकिन इसे समय चाहिए। इससे गतिविधियों में धीमापन आता है। थोक कारोबारियों और खुदरा कारोबारियों की बात करें तो अगर उनको सभी कर चुकाने पड़े तो शायद मौजूदा मार्जिन उनके लिए पर्याप्त नहीं साबित हो। इतना ही नहीं खुदरा कारोबारियों को यह समझ में आ रहा है कि जीएसटी पंजीयन करने के लिए उनको अपनी दुकानों का भी पंजीयन कराना होगा। परंतु सरकार का बुनियादी ढांचा पंजीयन के बढ़ते अनुरोधों से निपटने के लिए तैयार नहीं है। इससे कई तरह की अनियमितताएं भी सामने आ रही हैं। उदाहरण के लिए फार्मासिस्ट और फार्मेसी के बीच की विसंगति सामने आ रही है क्योंकि हर दवा दुकान के लिए एक फार्मासिस्ट का होना अनिवार्य है। वृद्घि की अनिश्चितता में आकलन की अनिश्चितता और अधिक इजाफा कर रही है। तिमाही जीडीपी वृद्घि अनुमान से कुछ ही बेहतर है। लेकिन अभी कई तिमाहियां बाकी हैं और अनुमान है कि इसकी विसंगति बढ़ती चली जाएगी। 
 
तिमाही जीडीपी का एक बड़ा हिस्सा बिक्री कर और सेवा कर संग्रह के आंकड़ों के आधार पर अनुमानित रहता आया है लेकिन अब ये आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं क्योंकि उन्हें जीएसटी में समाहित कर लिया गया है। जो जीएसटी आंकड़ा सामने है उसे स्थिर होने और उसकी व्याख्या करने में काफी वक्त लगेगा। राजकोषीय मोर्चे की बात करें तो जीएसटी दरें राजस्व निरपेक्ष हैं या नहीं यह पता लगाने में अभी काफी वक्त लगेगा। पूरे वर्ष के दौरान अगर 10.6 लाख करोड़ रुपये का कर संग्रह हुआ तो ऐसा माना जाएगा। यही वह राशि है जो उन करों से आनी थी जो अब जीएसटी का हिस्सा बन चुके हैं। अनुपालन में अनुमानित सुधार की बात करें और अल्पावधि की आर्थिक मंदी को देखें तो राजस्व निरपेक्षता का आकलन करना लगभग असंभव नजर आता है। अगर कर ज्यादा आता है तो इससे भी दिक्कत है क्योंकि सरकार राजस्व के समकक्ष अपने व्यय में इजाफा नहीं कर पाएगी। अगर कर राजस्व कम रहता है (इसकी संभावना कम है) तो यह राजकोषीय प्रोत्साहन की तरह काम करेगा लेकिन इस वर्ष का राजकोषीय घाटा तो बढ़ जाएगा। जीएसटी परिषद नवंबर में या उसके बाद ही दरों में संशोधन कर सकती है। यह काम अगले वित्त वर्ष को ध्यान में रखकर किया जाएगा। 
 
जुलाई महीने में जीएसटी संग्रह 11.1 लाख करोड़ रुपये रहा। परंतु इसे हर माह का प्रतिनिधि संग्रह नहीं माना जा सकता है। सीमित इनपुट टैक्स क्रेडिट की संभावना के अलावा (खबरों के मुताबिक अब तक बहुत कम इनवॉयस अपलोड किए गए हैं। ), मई और जून में जमकर स्टॉक कम करने के बाद अब दोबारा स्टॉक जुटाने की प्रक्रिया, धीमी गतिविधियां (जिनमें अगस्त में तेजी आई) और जीएसटी के पहले की कम कर दर का लाभ लेने की कोशिश को देखें तो कई ऐसे मुद्दे हैं जो हल करने हैं। आधे से अधिक करों को आईजीएसटी यानी एकीकृत जीएसटी में समाहित कर दिया गया है। 
 
वृद्घि और राजकोषीय अनिश्चितता के बीच एक चिंता मुद्रास्फीति की भी है। इसकी वापसी का भय बरकरार है। यह भी कि क्या उच्च कर अनुपालन से कीमतों पर भी असर होगा? मुद्रा में मजबूती आने का क्रम क्या जारी रहेगा? बैंकिग व्यवस्था की सेहत और दिवालिया प्रक्रिया को लेकर भी तमाम चिंताएं हैं कि वह कैसे आगे बढ़ेगी? उद्यमियों से यह उम्मीद करना बेमानी है कि वे ऐसी अनिश्चितता के बीच निवेश करेंगे। यह मानसिकता बाजार को प्रभावित करती है। कारोबारी चक्र के उतार-चढ़ाव को भलीभांति समझा जा सकता है  लेकिन आर्थिक चक्र को कारोबारी उत्साह की भावना भी उसी तरह प्रभावित करती है। उद्योग जगत का इस्तेमाल निवेश संबंधी निर्णयों का एक अहम हिस्सा है लेकिन मांग का पूर्वानुमान भी उतना ही अहम है। अगर अनिश्चितता बहुत लंबे समय तक बरकरार रही तो इसका असर वृद्घि पर पड़ता है। ऐसे में अर्थव्यवस्था को मौद्रिक और राजकोषीय मदद की आवश्यकता पड़ सकती है। 
Keyword: india, economy, IIP,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 कर में छूट से बढ़ेंगे ऑनलाइन भुगतान?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS General News   Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.