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टाटा पर वाडिया का नया निशाना, 3 निदेशकों के खिलाफ सेबी को लिखा

श्रीमी चौधरी / मुंबई 09 06, 2017

वाडिया के आरोप

हितों के टकराव पर सेबी ने नहीं दिया समुचित ध्यान
टाटा की तीन कंपनियों के निदेशकों पर गलत घोषणा करने का आरोप
घोषणा कंपनी कानून एवं सूचीबद्धता बाध्यताओं के नियमों का उल्लंघन

वाडिया समूह के चेयरमैन नुस्ली वाडिया ने बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) को पत्र लिखकर टाटा समूह की कंपनियों के तीन स्वतंत्र निदेशकों के खिलाफ कार्रवाई करने की अपील की है। वाडिया का आरोप है कि उन्होंने कंपनी की सालाना रिपोर्ट में गलत घोषणाएं की हैं। वाडिया ने जिनके नाम लिए हैं, उनमें टाटा स्टील के स्वतंत्र निदेशक एंड्रयू रॉब और मल्लिका श्रीनिवासन तथा टाटा केमिकल्स एवं टाटा मोटर्स के स्वतंत्र निदेशक नसीर मुंजे शामिल हैं।

सेबी चेयरमैन अजय त्यागी को आठ पृष्ठ के पत्र में वाडिया ने कहा है कि उनकी ओर से 6 जनवरी को सेबी के समक्ष उठाए गए मामले पर नियामक ने समुचित ध्यान नहीं दिया। वाडिया ने सेबी चेयरमैन से सूचीबद्ध नियमन के तहत संबंधित कंपनियों की लेखा समितियों द्वारा सौंपे गए रिपोर्टों की संपूर्ण एवं निष्पक्ष जांच कराने का अनुरोध किया। वाडिया का आरोप है कि बाजार नियामक ने लेखा समिति पर भरोसा किया था, जो 'अवैध और असंवैधानिक' थी।

सालाना रिपोर्ट में वाडिया द्वारा लगाए गए आरोपों की लेखा समिति द्वारा समीक्षा करने की बात कही गई है। वाडिया ने कहा कि नसीर मुंजे टाटा मोटर्स और टाटा केमिकल्स के ऑडिट समिति के चेयरमैन हैं और वह स्वतंत्र नहीं हैं, ऐसे में समिति का गठन गलत और गैर-कानूनी तरीके से किया गया। वाडिया ने सेबी को लिखा, 'इन कंपनियों की लेखा समिति, जिनके चेयरमैन वास्तव में स्वतंत्र नहीं थे, उन्होंने सेबी को बताया कि सभी कानूनी बाध्यताओं और कारोबारी प्रशासन मानकों का पूरी से पालन किया गया है।'

वाडिया ने कहा कि प्रारंभिक जांच के दौरान सेबी को कंपनियों और उनकी लेखा समितियों के बयानों को दरकिनार करना चाहिए था क्योंकि वह पक्षपातपूर्ण और पूर्वाग्रह से ग्रस्त थे। उन्होंने सवाल उठाया कि लेखा समिति का गठन कंपनी कानून और सूचीबद्धता बाध्यता एवं खुलासा अनिवार्यता का उल्लंघन था क्योंकि वे यह प्रमाणित करने के पात्र नहीं थे कि अनुपालन में कोई उल्लंघन नहीं हुआ था। इस बारे में राय जानने के लिए टाटा संस और नुस्ली वाडिया को ईमेल भेजा गया लेकिन उनका जवाब नहीं आया।

वाडिया भी पिछले साल दिसंबर में पद से हटाए जाने से पहले टाटा स्टील, टाटा मोटर्स और टाटा केमिकल्स के बोर्ड में स्वतंत्र निदेशक थे। टाटा संस के चेयरमैन पद से 24 अक्टूबर को सायरस मिस्त्री को हटाए जाने के बाद वाडिया ने मिस्त्री का समर्थन किया था। यही वजह रही कि मिस्त्री के साथ ही वाडिया को भी समूह की उन सभी कंपनियों के बोर्ड से हटा दिया गया जिनमें वे स्वतंत्र निदेशक थे।    

कंपनी प्रशासन और स्वतंत्र निदेशकों की भूमिका पर इस समय कॉरपोरेट और कानूनी हलकों में बहस चल रही है। सेबी ने भी कंपनी प्रशासन पर एक समिति का गठन किया है जो स्वतंत्र निदेशकों की भूमिका पर व्यापक चर्चा कर रही है। सेबी के पूर्णकालिक सदस्य एस रामन ने पिछले सप्ताह इस अखबार से कहा था, 'एजेंडा यह है कि स्वतंत्र निदेशकों की स्वतंत्र भावना को कैसे सुनिश्चित किया जाए। यह आलोचना हो रही है कि क्या स्वतंत्र निदेशक सही मायनों में स्वतंत्र हैं? पूरी दुनिया में यह समस्या है। स्वतंत्र निदेशकों की भूमिका पर व्यापक चर्चा हो रही है।' सूत्रों का कहना है कि सेबी चाहता है कि सरकार कंपनियों से स्वतंत्र निदेशकों को हटाने के नियमों को सख्त बनाए।

वाडिया ने दूसरी बार सेबी को पत्र लिखा है। पहला पत्र उन्होंने इन कंपनियों के नामांकन और पारितोषिक समितियों के चेयरमैन के तौर पर 6 जनवरी को लिखा था और एक-एक कारण गिनाते हुए कहा था कि क्यों हर स्वतंत्र निदेशक का सीधे तौर पर हितों का टकराव था। सेबी को भेजे अपने पत्रों में वाडिया ने जस्टिस बी एन श्रीकृष्णा की स्वतंत्र राय को भी नत्थी किया है। वाडिया ने कहा कि रॉब को टाटा स्टील की सहायक कंपनी टाटा स्टील यूरोप से 190,000 पौंड का पारितोषिक मिला था जबकि वह इन दोनों कंपनियों की ऑडिट समितियों के सदस्य थे। वाडिया ने कहा, 'अगर उन्हें टाटा स्टील के बोर्ड में स्वतंत्र निदेशक के तौर पर वर्गीकृत नहीं किया गया होता तो वह स्वतंत्र निदेशक के तौर पर दोनों कंपनियों की ऑडिट समितियों में नियुक्ति के हकदार नहीं होते।'

वाडिया ने कहा कि कंपनी कानून के तहत स्वतंत्र निदेशकों केवल एक लाख रुपये पारितोषिक और शुद्ध लाभ का महज एक फीसदी कमीशन देने का प्रावधान है। श्रीनिवासन के मामले में वाडिया ने कहा कि उनके पति वेणु श्रीनिवासन टाटा संस में निदेशक थे और सर दोराबजी ट्रस्ट में न्यासी थे। इस ट्रस्ट की टाटा संस में 28 फीसदी हिस्सेदारी है। उन्होंने कहा कि 2013 के कंपनी कानून में उल्लेखित सहायक कंपनी की परिभाषा के मुताबिक टाटा स्टील टाटा संस की सहायक कंपनी थी। सर दोराबजी ट्रस्ट एक गैर लाभकारी संस्था है जो प्रत्यक्ष लाभार्थी है और उसकी कुल प्राप्तियों में टाटा संस से मिलने वाले लाभांश की 25 फीसदी हिस्सेदारी है। कंपनी कानून में साफ कहा गया है कि किसी गैर लाभकारी संस्था की प्राप्तियां उसकी किसी भी प्रवर्तक से संबंधित कंपनी से हो सकती हैं। वाडिया ने आरोप लगाया कि टाटा स्टील में मलिका श्रीनिवासन का सीधे तौर पर हितों का टकराव था।

टाटा केमिकल्स में 2006 और टाटा मोटर्स में 2008 तक स्वतंत्र निदेशक रहे मुंजी के बारे में वाडिया ने कहा कि फरवरी 2012 में उन्हें रतन टाटा ट्रस्ट का न्यासी नियुक्त किया गया था जो घोषित प्रवर्तक समूह का हिस्सा था। उन्होंने कहा कि न्यासियों को प्रवर्तक के तौर पर वर्गीकृत किया जाएगा क्योंकि ट्रस्ट को प्रवर्तक घोषित किया गया है। इसलिए मुंजी को प्रवर्तक माना जाएगा और इस तरह वह स्वतंत्र निदेशक नहीं हो सकते हैं। टाटा संस में रतन टाटा ट्रस्ट की 23.5 फीसदी हिस्सेदारी है। साथ ही इस ट्रस्ट और टाटा संस की टाटा मोटर्स में 26.5 फीसदी हिस्सेदारी है।

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