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भारत ने दिखाया 'कागजी शेर' से निपटने का रास्ता

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  September 06, 2017

चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग और उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन के बीच अपने देशों के आकार के अलावा भला और क्या असमानता है? लेकिन पहले हम इनके बीच मौजूद समानताओं की बात कर लेते हैं। इनके बीच समानताएं एकदम साफ नजर आती हैं। दोनों ही नेता महज नाम के वास्ते साम्यवादी रह गए देशों के प्रमुख हैं। उनके साम्यवादी दलों के हाथ में सरकारों की कमान होती है। चीन और उत्तर कोरिया की सरकारें काफी दमनकारी रवैया अपनाती हैं। दोनों नेताओं में अपने अधिकार को लेकर गजब का आग्रह नजर आता है। दोनों ही कानून तोड़ते हैं और इसी तरह वे अपने वादे भी अक्सर तोड़ते रहते हैं। चीन और उत्तर कोरिया के नेता अपनी सेनाओं पर अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का बड़ा हिस्सा खर्च करते हैं। दोनों नेता खुद को सत्ता में बनाए रखने के लिए सेना पर काफी हद तक निर्भर हैं। दोनों देश परमाणु हथियार की क्षमता से लैस हैं। दोनों ही नेता धमकाने में लगे रहते हैं। वे अक्सर अपने पड़ोसियों को धमकाते रहते हैं।

 
चीन और उत्तर कोरिया के सर्वोच्च नेता मामूली सी बात पर भी नाराज हो जाते हैं। अगर उनके आसपास किसी व्यक्ति की टोपी भी गिर जाए तो वह उन्हें अपना अपमान लगता है। दोनों नेता सभी की खिंचाई करते रहते हैं और हमेशा अपना ही राग अलापते हैं। लेकिन दोनों नेताओं को अक्सर नाकामी मिलती है। दोनों ही मूर्खतापूर्ण हरकतें करने वाले नेता हैं लेकिन आने वाले कई वर्षों तक उनके सत्ता में बने रहने की संभावना है। यह दुनिया के लिए बेहद गंभीर समस्या है। यह कुछ वैसा ही है मानो हिटलर और मुसोलिनी का पुनर्जन्म हो गया हो। 
 
लेकिन दोनों के बीच फर्क यह है कि जहां दुनिया भर में किम को लेकर काफी मजाक बनाया जाता है वहीं शी चिनफिंग के बारे में उल्टा-सीधा बोलने की शायद ही किसी को हिम्मत होती है। यह चीन के दुष्प्रचार की कामयाबी को रेखांकित करता है। लेकिन शी की नादानी इसकी भरपाई कर देती है। आखिर उत्तर कोरिया और पाकिस्तान को छोड़कर भला कौन हरेक देश पर अपना गुस्सा उतारेगा? वैसे शी की नादानियां ही उनकी इकलौती समस्या नहीं है। चीन कई दूसरे मोर्चों पर भी काफी नाजुक है। इनमें से दो कमजोरियों पर एक नजर डालते हैं।
 
पहली कमजोरी, भोजन। चीन लोगों के जेहन में चुपचाप यह विचार डालने की कोशिश कर रहा है कि जिस तरह से रासायनिक एवं जैव हथियारों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा हुआ है, उसी तरह एक हथियार के तौर पर भोजन का भी इस्तेमाल करने पर रोक लगाने वाला एक अंतरराष्ट्रीय समझौता हो। चीन के कृषि क्षेत्र की उच्च उत्पादकता को लेकर भले ही दावे किए जाते हों लेकिन सच यह है कि यह देश अपनी खाद्य जरूरतों के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर है। चीन अपनी खाद्य जरूरतों का सात से दस फीसदी हिस्सा आयात करता है। वैसे यह कोई असामान्य बात नहीं है। उत्तर अमेरिका को छोड़कर तीव्र आर्थिक विकास से गुजर रहे हरेक देश को कभी-न-कभी खाद्य आयात का सामना करना पड़ा है।
 
खाद्य आयात पर चीन की निर्भरता के चलते पश्चिमी देशों को उस पर लगाम लगाने का एक जरिया मिल जाता है। अगर पश्चिमी देश चीन को अभी निर्यात किए जाने वाले खाद्य उत्पाद को आधा कर देते हैं तो चीन में गहरी अराजकता की स्थिति पैदा हो सकती है। वैसे यह दलील रखी जा सकती है कि ये देश तो चीन को खाद्य उत्पादों के निर्यात से मोटी कमाई करते हैं, लिहाजा वे ऐसा क्यों करेंगे? यहां पर मैं सिर्फ यह कहना चाहता हूं कि खाद्य आयात पर निर्भरता की वजह से चीन नाजुक स्थिति में पहुंच जाता है। यही वजह है कि चीन उस हाथ को नहीं काट सकता है जो उसे भोजन दे रहा है। लेकिन भौंकने से तो कोई नुकसान होता नहीं है।
 
हमें इसे याद रखना होगा। डोकलाम मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दुनिया को यह दिखा दिया है कि शी की अधिकांश हरकतें महज दिखावा होती हैं। दूसरे देश भी शी को लेकर यही रवैया अपना सकते हैं। बराक ओबामा भी ऐसा कर सकते थे लेकिन वह पीछे हट गए। देखना होगा कि डॉनल्ड ट्रंप क्या करते हैं? दूसरी कमजोरी, ऋण। चीन के बैंकों और अन्य ऋणदाताओं के 25-35 लाख करोड़ डॉलर बकाया हैं। क्या शी के कार्यकाल के बारे में कुछ कहने की जरूरत बाकी रह गई है? चीनी मीडिया में प्रचारित किया जा रहा है कि करीब आठ हफ्ते बाद शी को दूसरा कार्यकाल दिए जाने पर मुहर लगने के बाद वह कमियों को दुरुस्त करना शुरू कर देंगे। सवाल है कि वह किसे और किस तरह दुरुस्त करेंगे? क्या उसका चीन की अर्थव्यवस्था पर अपस्फीतिकारी प्रभाव नहीं पड़ेगा? हमें उन कदमों का इंतजार करना होगा लेकिन यह तो तय है कि चीन का दौर वैसे ही खत्म हो चला है जैसा 1990 के दशक की शुरुआत में जापान के साथ हुआ था। 
 
अब आगे क्या राह बचती है? चीन की 'साम्यवादी' पार्टी में पनपते संकट को कोई भी देख सकता है। लेकिन अगर आप शी हैं तो आप क्या करेंगे? आप दूसरे देशों से लिए गए लंबी अवधि के कर्ज से सीमेंट और स्टील कारखानों को दोबारा शुरू करेंगे और फिर वन बेल्ट वन रोड (ओबीओआर) की योजना पेश कर देंगे। चीन के साथ सहयोग के नतीजे ग्वादर और हम्बनटोटा में दिख चुके हैं। इन दोनों बंदरगाहों पर चीन की ही संप्रभुता है। भारत ने ओबीओआर योजना का हिस्सा बनने से मना कर दिया जबकि 300 मीटर के इलाके डोकलाम के लिए चीन ने खूब बयानबाजी की। लेकिन अंत में शी को अपने कदम पीछे खींचने पड़े। इससे उनकी छवि पर भी असर पड़ा है। कुल मिलाकर चीन पहले की तरह अब भी कागजी शेर ही बना हुआ है जो केवल ओबामा को ही डरा पाया। ट्रंप कहीं अधिक मजबूत मिट्टी के बने हो सकते हैं। उस समय असली मजा शुरू होगा। फिर मुकाबला बराबरी का होगा। 
Keyword: india, china, koria,,
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