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अस्पष्ट एमसीएलआर से लुट रहे कर्जदार

देवाशिष बसु /  September 06, 2017

क्या आरबीआई इस बात पर ध्यान देगा कि एमसीएलआर के आकलन में क्या परिचालन लागत शामिल की जा रही है। इस पर सवाल उठा रहे हैं देवाशिष बसु 

 
इससे पहले लिखे दो आलेखों में मैंने बताया था कि कैसे बैंक खुद बैंकिंग नियामक भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की नाक के नीचे लोगों को लूट रहे हैं। इस आलेख में मैं इस लूट का आकार चित्रित करने का प्रयास करूंगा। इसके अलावा मैं फंड आधारित ऋण दर की सीमांत निधि लागत पर आधारित उधार दर (एमसीएलआर) की खामियां उजागर करने का भी प्रयास करूंगा। इस आलेख को लिखने के दौरान मैंने एक सेवानिवृत्त बैंक श्रीनिवास मराठे से आग्रह किया कि वह कुछ आकलन करके मुझे दें। उन्होंने आवास ऋण के मसले की गहरी जांच पड़ताल की है। उन्होंने कुछ अहम आंकड़े जुटाए जो बताते हैं कि घटने-बढऩे वाली फ्लोटिंग ब्याज दर व्यवस्था के अधीन बैंक किस प्रकार जबरन का शुल्क ग्राहकों से वसूल कर रहे हैं। हालांकि जब वह सूचना के अधिकार का आवेदन लगाकर आंकड़े जुटाने का प्रयास कर रहे थे तो बैंकों ने निरंतर उनकी राह रोकने का प्रयास किया। 
 
बैंकिंग व्यवस्था का पूरा ऋण विभिन्न अवधि के कर्ज के रूप में वितरित किया जाता है। इसकी दर भी अलग-अलग होती है। एमसीएलआर की प्रभावी दर (1 अप्रैल, 2016) किसी ऋण के पहले वर्ष से 20 वर्ष तक की पूरी अवधि में निहित होती है। दूसरे शब्दों में कहें तो अगर कोई ऋण अगस्त 2015 में लिया गया है तो वही उसके एमसीएलआर की प्रभावी दर के पहले वर्ष में होगा जबकि अगर कोई ऋण दिसंबर 2006 में लिया गया होगा तो वह अपने 10वें वर्ष में तथा अक्टूबर 1995 में लिया गया ऋण 20वें वर्ष में होगा। वह कहते हैं कि इन सबका वितरण सामान्य वितरण माना जाएगा और सैद्घांतिक तौर पर हम ऋण की अवधि के दौरान, विभिन्न ब्याज दर पर और अलग-अलग अवधि पर इसका औसत भार मानकर चलेंगे। 
 
अपने अनुमान के आधार पर वह मानते हैं कि एमसीएलआर के लाभ को नकारने से बैंकिंग व्यवस्था अनुमानत: 43,000 करोड़ रुपये के नुकसान में है। इसका आकलन इस प्रकार किया गया है: फ्लोटिंग दर पर दिया गया ऋण करीब 29,53,106 करोड़ रुपये मूल्य का है। इसमें से 80 फीसदी ऋण के लिए बैंक कोई लाभ ग्राहकों को नहीं देते। अगर 10 से 20 वर्ष की अलग-अलग ऋण अवधि का अनुमान लगाया जाए और 9.75 फीसदी से 12.75 फीसदी तक की जुदा-जुदा ब्याज दर का अनुमान लगाया जाए तो माना जा सकता है कि करीब 43,437 करोड़ रुपये का ब्याज लाभ देने से इनकार किया गया। यह अनुमान एमसीएलआर के बाद की 8.75 फीसदी की ब्याज दर पर आधारित है। एक बार फिर यह महज अनुमान है क्योंकि हमें नहीं पता कि विभिन्न अवधि के लिए कुल कितना ऋण लिया गया है और इनकी ब्याज दर क्या है तथा उस पर एमसीएलआर के मुताबिक कितना फायदा मिलना चाहिए? 
अब आते हैं समस्या के दूसरे हिस्से पर, यानी ब्याज दर का आकलन। 6 अप्रैल 2010 को जारी किया गया आरबीआई का परिपत्र यह निर्धारित करता है कि ब्याज दर का आकलन किस प्रकार किया जाना चाहिए। वह इसके लिए चार कारक बताता है। 
 
जमा/फंड्स की लागत: मराठे कहते हैं कि जमा या फंड की लागत जमा की प्रकृति पर निर्भर करती है यानी वह चालू खाते में है, बचत खाते में है (सीएएसए), सावधि जमा है, या किसी तरह का ऋण है, परंतु आरबीआई बैंकों में इनमें से किसी की करीबी निगरानी नहीं करता है। ऐसे में जमा की लागत में छेड़छाड़ की पूरी संभावना रहती है। ठ्ठसीआरआर और एसएलआर की नकारात्मक लागत: बैंकों को अपने जमा का एक हिस्सा सांविधिक तरलता अनुपात (एसएलआर) और नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर) में रखना होता है। आरबीआई मानता है कि इसका संयुक्त प्रतिफल जमा की लागत से कम होता है। इसे नकारात्मक कहा जाता है। अगर ऐसा है तो ए, बी,सी,डी के योग के फॉर्मूले में बी को नकारात्मक होना चाहिए। इसका असर आधार दर के फॉर्मूले पर पड़ता है। परंतु मराठे कहते हैं कि आरबीआई का वह फॉर्मूला गलत है। वह कहते हैं कि यह नकारात्मक नहीं सकारात्मक है। इससे आधार दर में इजाफा होता है।
 
अनावंटन योग्य अतिरिक्त लागत: इसे सही ढंग से परिभाषित नहीं किया गया था और बैंकों को आंकड़े बढ़ाकर पेश करने का अवसर दिया गया था। 
 
शुद्घ आय पर औसत रिटर्न: यह आवंटनयोग्य फंड और शुद्घ मुनाफे का अनुपात होता है जिसे प्रतिशत में व्यक्त किया जाता है। मराठे कहते हैं कि यह स्पष्टï नहीं है कि यह पिछली तिमाही का शुद्घ मुनाफा है या किसी वित्त वर्ष का औसत। 
 
अप्रैल 2016 में जब मानक को एमसीएलआर में बदला गया तब घटकों को फंड की मार्जिनल लागत, सीआरआर को आगे ले जाने की नकारात्मक लागत, परिचालन लागत आदि। जाहिर सी बात है गलत आधार दर के लगभग सभी घटक एमसीएलआर व्यवस्था में आगे शामिल हो गए और बैंकों ने मानक दर से छेड़छाड़ करना जारी रखा। इसकी कीमत ग्राहकों ने चुकाई। यह बात ध्यान रखनी होगी कि एसएलआर और सीआरआर की नकारात्मक लागत अब केवल सीआरआर है। इससे एसएलआर की आय के लाभ आकलन से समाप्त हो जाते हैं। इससे बैंकों को एमसीएलआर दर में इजाफा करने का अवसर मिल गया। इस बीच यह याद रखने की बात है कि बैंक लगभग हर सेवा के लिए अतिरिक्त शुल्क बटोरना भी जारी रखे हुए हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि ऐसी कोई परिचालन लागत नहीं है जिसे एमसीएलआर की लागत में जोड़ा जा सके। परंतु बैंक ऐसा करना जारी रखे हुए हैं और आरबीआई की इस पर निगाह नहीं है। क्या आरबीआई कभी इस बात पर ध्यान देगा कि एमसीएलआर आकलन में क्या परिचालन लागत वसूल की जा रही है? आरबीआई ने अब यह तय किया है कि एक आंतरिक समिति बनाई जाए जो एमसीएलआर पर नजर रखे। बैंकों द्वारा अस्पष्टï मानक आकलन का सहारा लेकर ग्राहकों को लूटना जारी है और कहीं किसी की कोई जवाबदेही तय नहीं की जा रही है। आखिरकार नियामक से यह उम्मीद कौन करेगा कि वह स्वयं अपना नियमन करे? ऐसे में बैंक आगे भी ऐसा अतिरिक्त शुल्क वसूलना जारी रखें तो अचरज नहीं।
Keyword: bank, loan, debt, MCLR, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई),
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