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पूंजी निवेश में कब और कैसे आती है तेजी!

अजय शाह /  September 05, 2017

वृद्घि में सुधार की उम्मीद का सीधा संबंध आर्थिक सुधारों से है। इसके लिए जरूरी है कि मजबूत संस्थागत व्यवस्था मौजूद हो। इस संबंध में विस्तार से बता रहे हैं अजय शाह 

 
देश के कारोबारी चक्र के लिए निवेश में सुधार बहुत अधिक अहमियत रखता है। यह सुधार कब और कैसे होगा? निवेश को लेकर अक्सर कारोबारी उत्साह की बात की जाती है। इससे यह संकेत निकलता है कि निजी क्षेत्र का मिजाज इसके अनुकूल नहीं बन पा रहा है या कुछ तो है जो रहस्यमय है। निवेश को पांच सवालों से समझा जा सकता है। कंपनियां नई क्षमता का निर्माण तभी करती हैं जबकि उनके मुनाफे को लेकर सही अनुमान हों, पूंजी तक उनकी पहुंच हो और क्षमताओं का पूरा इस्तेमाल हो रहा हो। इसके अलावा भारतीय आर्थिक सुधारों को लेकर एक किस्म का आशावाद भी है जिसमें माना जा रहा है कि वृहद आर्थिक वृद्घि संभव है। सबसे आखिर में आता है वह आकलन जिसके तहत अनुमान लगाया जाता है कि नीतिगत प्रतिष्ठïान भविष्य की परिस्थितियों से कैसे निपटेगा? 
 
जीडीपी की बात करें तो सरकार और व्यय दोनों स्थिर नजर आते हैं। कारोबारी चक्र को लेकर जो भी कार्रवाई होनी है वह काफी हद तक निवेश और शुद्घ निर्यात से संबंधित है। निजी कारोबारी निवेश में उतार-चढ़ाव देश की जीडीपी गाथा का एक बड़ा हिस्सा है। वे कौन सी बातें हैं जो कारोबारियों को निवेश के लिए प्रेरित करती हैं? जाहिर सी बात है इसमें विभिन्न कंपनियों में प्रमुख लोगों की अहम भूमिका होती है। कारोबारी उत्साह की भावना से तात्पर्य यही है कि यह पूरी तरह पर भावनाओं पर आधारित निर्णय है। हालांकि भावनाओं की अपनी भूमिका है लेकिन यह व्यापक विश्लेषण के बाद लिया जाने वाला निर्णय है। 
 
पहला मुद्दा है क्षमताओं के समुचित इस्तेमाल का। अगर एक लाइन या एक फैक्टरी अपनी क्षमताओं का पूरा इस्तेमाल नहीं करती है तो फर्म के लिए नई क्षमताएं विकसित करना बेमानी है। पहली प्राथमिकता होनी चाहिए उपलब्ध क्षमताओं का पूरा इस्तेमाल करना। इससे संबंधित एक और मुद्दा है मुनाफा। केवल उच्च क्षमता का इस्तेमाल करना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि इस दौरान मुनाफे का बरकरार रहना भी उतना ही आवश्यक है। 
 
ऐसी अर्थव्यवस्था को गिरावट में माना जाता है जिसका मुनाफा कम हो और जिसमें क्षमताओं का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पा रहा हो। इन हालात से जूझ रही फर्म कभी बड़े पैमाने पर निवेश नहीं करेंगी। मोटे पैमाने पर देखें तो निवेश में तेजी के पहले के दो सालों में हमें मजबूत मुनाफा मार्जिन और उच्च क्षमता का इस्तेमाल देखने को मिलता है। एक बार जब कोई फर्म अच्छे मुनाफे की स्थिति में आ जाती है और उच्च क्षमता निर्माण का काम शुरू कर देती है तो नई क्षमता निर्मित करने के सवाल पर विचार शुरू होता है। यहां पर कारोबारी वित्त का प्रश्न उत्पन्न होता है। फर्म अपनी इस क्षमता पर विचार करेगी कि वह कितनी इक्विटी और डेट पूंजी जुटा सकती है। इस बात पर भी विचार किया जाएगा कि बाजार का इस निर्णय पर क्या असर होगा?
 
वित्तीय मदद जुटाने में बाधा कभी भी मात्रात्मक समस्या नहीं होती। अगर कोई भी फर्म कड़ा प्रयास करती है तो उसे पूंजी मिल ही जाती है। सवाल केवल यह है कि किस मूल्य पर मिलती है। अगर पूंजी की लागत बहुत ज्यादा है तो इसका असर निवेश के शुद्घ मौजूदा मूल्य पर पड़ता है। जब कोई वित्तीय व्यवस्था नाकाम होती है या उसमें खामी आती है और प्रबंधकों से अत्यधिक ऊंची रिटर्न की दर की जरूरत पड़ती है तो प्रबंधक को लगता है कि उसकी परियोजना पर्याप्त आकर्षक नहीं रही है।
 
भारतीय वित्त जगत की बात करें तो शीर्ष 1,000 कंपनियां ऐसी हैं जिनको इक्विटी और डेट पूंजी जुटाते समय सबसे अधिक मूल्य मिलता है। उनको वित्तीय मोर्चे पर भी बढ़त हासिल रहती है। इसकी वजह से उनके लिए वास्तविक क्षेत्र में निवेश के आकर्षक अवसर तैयार होते हैं जबकि अन्य तमाम फर्मों के लिए निवेश का आकर्षण कम हो जाता है क्योंकि उनको आकर्षक वित्तीय तंत्र हासिल नहीं होता। 
 
एक नई निवेश परियोजना में पूंजी की आवक की संभावना हमेशा भविष्य में निहित रहती है। भविष्य के राजस्व से जुड़ी हर परियोजना में अर्थव्यवस्था को लेकर एक भाव निहित रहता है। जब वृद्घि अनुमान बेहतर रहते हैं तो इससे सभी परियोजनाओं की संभावनाएं बहुत अधिक प्रभावी नजर आती हैं। अच्छे दिनों में कंपनियां अपने राजस्व अनुमान में कुछ इजाफा कर सकती हैं और तब सभी वित्तीय संभावनाएं बेहतर नजर आने लगती हैं।
 
बढिय़ा वृद्घि संभावनाओं को आर्थिक सुधार से जोड़कर देखा जाता है। सन 2000 के दशक की शुरुआत में एक ऐसी सरकार सामने आई जो मजबूत टीम का निर्माण कर रही थी और कई इलाकों मसलन राजमार्ग, दूरसंचार, अप्रत्यक्ष कर, शेयर बाजार, पेंशन सुधार आदि की दिशा में काम कर रही थी। इनमें से हर सुधार ने आगामी वर्षों को लेकर विश्वास का माहौल पैदा किया जिसका परिणाम कंपनियों की ओर से बेहतर राजस्व अनुमान के रूप में सामने आया। 
 
इन सबसे परे सरकार और फर्मों के बीच एक अधूरा अनुबंध होता है जो भविष्य के कदमों से संबंधित होता है। अक्सर दुनियावी बदलावों के साथ अप्रत्याशित परिस्थितियां सामने आएंगी। लोग इस बारे में राय बनाएंगे कि सरकारें भविष्य में क्या रुख अपनाएंगी। क्या नुकसानदेह नीतिगत कदम उठाए जाएंगे? अगर एक कठिन परिस्थिति उत्पन्न होती है तो समस्या हल करने के लिए सरकार क्या रुख अपनाएगी? आदर्श स्थिति में देखा जाए तो मजबूत संस्थागत व्यवस्था होनी चाहिए ताकि कंपनियां बिना सोचे व्यक्तियों पर विश्वास कर सकें। जब संस्थान कमजोर होते हैं तो हर कोई जानता है कि बदलाव आते हैं और नई तरह की अनिश्चितता भी आती है। 
 
कारोबारी उत्साह की बात करें तो हमेशा यह माना जाता है कि किसी फर्म का निवेश दरअसल उसके निर्णय लेने वालों के भरोसे का परिचायक होता है। यह बात आंशिक तौर पर सही है लेकिन निर्णय प्रक्रिया के बड़े हिस्से को पांच व्यवस्थित कदमों में समझा जा सकता है। पहली, क्या क्षमता का इस्तेमाल मजबूत है? दूसरा, क्या मुनाफे की दर आकर्षक है?ï तीसरा, क्या इक्विटी और डेट पूंजी आकर्षक दरों पर उपलब्ध है? चौथा, क्या मजबूत आर्थिक नीति टीम है? पांचवां, क्या सरकारी संस्थान और लोग समुचित ढंग से काम कर रहे हैं ताकि अच्छे नतीजे हासिल किए जा सकें? वर्ष 2002 से 2004 तक के सुधार को देखें तो ये पांचों कारक साफ नजर आते हैं। सभी सवालों के जवाब उपरोक्त पांच प्रश्नों में ही निहित हैं। ये पांच परीक्षाएं ऐसी हैं जो हमें परिस्थितियों को समझने में मदद करती हैं कि आखिर निवेश में कब तेजी आ सकती है।
Keyword: GDP, growth,,
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