बिजनेस स्टैंडर्ड - मोदी सरकार अपने लक्ष्य का स्तर रखे बरकरार
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मोदी सरकार अपने लक्ष्य का स्तर रखे बरकरार

नीति नियम
मिहिर शर्मा /  September 04, 2017

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के बारे में आप चाहे जो कह लें, यह कतई नहीं कहा जा सकता है कि उसमें महत्त्वाकांक्षाओं की कोई कमी है। मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर जो भाषण दिया उसमें 2022 के भारत को लेकर उनके लक्ष्यों को ही विस्तार से दोहराया गया है। हो सकता है कुछ लोग इस धारणा से असहमत भी हों कि पक्का मकान, बिजली, स्वास्थ्य सुविधाएं और बेहतर मेहनताना आदि जरूरी लक्ष्य हैं और उनको यह भी लगता हो कि प्रधानमंत्री द्वारा तय समयसीमा में इन्हें हासिल कर पाना मुश्किल होगा। 

 
बेहतर समाज बनाने के लिए यह आवश्यक है कि हम व्यापक स्तर पर सोचें और जरूरी कदम उठाएं। रोज देश की श्रम शक्ति में शामिल हो जाने वाले नौजवानों की उम्मीद इससे जुड़ी है और किए गए वादों और हकीकत के बीच के अंतर को पाटना आवश्यक है। तभी इन लक्ष्यों को हासिल किया जा सकता है। 
मुझे भय है कि प्रगति का ठोस लक्ष्य कहीं नदारद है। कई अहम क्षेत्रों में जरूरी कदम और उनका आकार दोनों नदारद हैं। आइए ऐसी कुछ बातों पर नजर डालते हैं जो इसे सही ठहराती हैं। 
 
पहली बात, सरकार ने रोजगार का वादा भुला दिया है और अब उसका आग्रह है कि लोग खुद रोजगार देने वाले बनें। यह रुख में बदलाव का दिलचस्प उदाहरण है। इसमें दोराय नहीं कि यह सरकार की वास्तविक रोजगार सृजित करने में नाकामी का उदाहरण है। मैं यह मानता हूं कि सरकार खुद कहीं रोजगार नहीं तैयार करती लेकिन यह सरकार मानो स्वीकार कर चुकी है कि उसके कार्यकाल में निजी क्षेत्र भी रोजगार सृजित नहीं कर पा रहा। 
 
इस परिवर्तन का अर्थ क्या है? इसका मतलब यह है कि सरकार कुछ हस्तक्षेपों पर भरोसा कर रही है। इसमें वित्तीय समावेशन, डिजिटलीकरण आदि शामिल हैं। इनकी मदद से नवाचार और उद्यमिता को बढ़ावा दिया जा रहा है। निश्चित तौर पर यह बड़ी उपलब्धि होगी। वित्तीय समावेशन का दायरा बढ़ाना तो यकीनन जरूरी कदम है। जरा सोचिए अगर छोटे पैमाने की उद्यमिता से गुणवत्ता वाले और जरूरत के मुताबिक रोजगार पैदा नहीं हुए तो? क्या हम बड़ी कंपनियों के रोजगार सृजन के जरिया होने की बात को तिलांजलि दे रहे हैं? हाल ही में नीति आयोग की तीन वर्षीय योजना के बारे में बोलते हुए अधिकारियों ने शिकायत की थी देश का कारोबारी जगत श्रम आधारित उद्योगों में निवेश नहीं कर रहा। इसमें बदलाव के लिए क्या हो रहा है? अगर निजी क्षेत्र सरकार की मंशा के मुताबिक काम नहीं कर रहा है तो यह उसकी गलती नहीं है बल्कि यह गलत नियामकीय माहौल की देन है। 
 
पहला सवाल, क्या हम बतौर नियोक्ता बड़ी कंपनियों पर ध्यान नहीं दे रहे? ध्यान रहे कि यह ऐसे वक्त पर हुआ है जब छोटे उद्यमों को नोटबंदी और वस्तु एवं सेवा कर ने तगड़ा झटका दिया है। हाल ही में आरबीआई ने सूचीबद्घ कंपनियों का विश्लेषण किया जिससे पता चला कि 2016-17 में 50 लाख रुपये से कम चुकता पूंजी वाली कंपनियों का शुद्घ लाभ 23 फीसदी गिरा। वहीं 25 करोड़ रुपये से कम बिक्री वाली कंपनियों के राजस्व में 44 फीसदी कमी आई। यह क्षेत्र भला रोजगार का मसला कैसे संभाल पाएगा? निवेश भी सामने नहीं आ रहा, वाणिज्यिक बैंकों का ऋण कमजोर हुआ है और सरकार बैंकिंग संकट को हल करने में नाकाम रही है। कॉर्पोरेट बॉन्ड जैसे वैकल्पिक तरीके भी नहीं सामने आए। जाहिर सी बात है कि इससे केवल बड़ी कंपनियों को मदद मिलती है। अगर कोई सुधार होता है तो वह केवल बड़े पैमाने पर काम करने से आएगा। 
 
दूसरा सवाल: क्या हम सुधार के पैमाने के बारे में सोच रहे हैं? नीति आयोग के कार्यक्रम में अधिकारियों ने यह शिकायत भी की कि कंपनियां उन क्षेत्रों का लाभ नहीं ले रही हैं जहां श्रम कानूनों में सुधार हुआ है। दूसरे शब्दों में कमियों को पहचानने के बजाय निजी क्षेत्र के सर पर ठीकरा फोड़ा जा रहा है। यह बात एकदम स्पष्टï होनी चाहिए कि राज्यों के नेतृत्व में और स्थानीय स्तर पर किया गया सुधार देशव्यापी स्तर पर कारगर नहीं होगा। 
 
तीसरा सवाल, क्या हम बड़े सुधारों को त्याग रहे हैं? यहां तक जीएसटी जो एक बड़ा देशव्यापी सुधार हो सकता था वह भी कुछ अहम पहलुओं पर पीछे रह गया। मुझे यह समझ में नहीं आता है कि आखिर एकल राष्ट्रव्यापी अप्रत्यक्ष कर को विविध कर कार्यालयों और भुगतान बिंदुओं की आवश्यकता ही क्या है। यहां व्यापक पैमाने से तात्पर्य केवल आकार से नहीं बल्कि दायरे से भी है। इसका अर्थ नीतिगत प्रभाव में विस्तार और सरकारी हस्तक्षेप को कम से कम करने से है। हमें एक सरल, सार्वभौमिक, कम अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था की आवश्यकता है जहां एकल कर प्राधिकार हो। फिलहाल ऐसा नहीं है। इन कमियों के चलते ही निजी क्षेत्र उस पैमाने पर काम नहीं कर पा रहा जिसकी आवश्यकता है। परंतु अगर इन दोनों में सुधार कर भी लिया जाए तो क्या हमारे पास ऐसी श्रमशक्ति है जिसे ये कंपनियां काम पर रख सकें। स्किल इंडिया मिशन ने जून में अपने उस लक्ष्य को तिलांजलि दे दी जिसके तहत उसे 2022 तक 50 करोड़ लोगों को कुशल बनाना था। मोदी सरकार के शुरुआती दो साल में केवल 1.17 करोड़ लोगों को ही प्रशिक्षण दिया गया। उनमें से कितनों को रोजगार मिला यह किसी को नहीं पता। स्कूली शिक्षा के रिकॉर्ड भी ठीक नहीं हैं। यहां सरकार जरूरी हस्तक्षेप नहीं कर रही। सरकार ने ऑनलाइन शिक्षण के प्लेटफॉर्म पर काम किया है इसे स्वयम का नाम दिया गया है। 
 
शिक्षा को इसी तरह बढ़ावा दिया जाना चाहिए। परंतु सरकार इस प्लेटफॉर्म को प्रमाणित ढंग से प्रमाणन और मूल्यांकन से जोडऩे में नाकाम रही है। यहां सवाल यह उठता है कि क्या शिक्षा के स्तर पर भी सरकार पिछड़ रही है? सरकार ने अपनी आकांक्षा तो दिखाई है। उसने बुनियादी ढांचा, वित्तीय समावेशन और बिजली के क्षेत्र में यह दिखाया है कि वह बड़े पैमाने पर काम कर सकती है। अगर सरकार को अपनी तमाम आकांक्षाओं को सच में बदलना है तो उसे जितनी जल्दी हो सके बड़े पैमाने पर काम करना होगा।
Keyword: narendra modi, development, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी,
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