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अफगानिस्तान, अमेरिका और भारत के लिए सबक

के शंकर वाजपेयी /  September 04, 2017

अमेरिका में नए राष्ट्रपति के आगमन के बाद जो वैश्विक अनिश्चितता उत्पन्न हुई है वह पहले से अस्थिर दुनिया को और अधिक जटिल बना रही है। विस्तार से बता रहे हैं के शंकर वाजपेयी 

 
अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप यह शिकायत कर सकते हैं कि मीडिया उनके साथ उचित व्यवहार नहीं कर रहा है। अमेरिकी मीडिया के तमाम लोग अफगानिस्तान पर हाल के उनके भाषण की आलोचना कर रहे हैं। ऐसे लोग एक और गलती पर ध्यान नहीं दे रहे हैं और वह है बिना समुचित हल की तलाश किए पुराने विश्लेषण पर टिके रहना। इस पूरे प्रकरण में कहीं अधिक व्यापक सबक हैं। दोनों का ताल्लुक अंतरराष्ट्रीय संबंधों और हमारी चुनौतियों से हैं जिनकी जांच करने की आवश्यकता है। 
 
सच यह है कि हमारे जीवन में और इतिहास में अक्सर जरूरी हल नदारद नजर आते हैं। जब मौजूदा हालात इजाजत नहीं दें तो प्रतीक्षा करनी चाहिए, उन परिस्थितियों की जो बदलाव की इजाजत देती हों। इस बीच परिस्थितियों से निपटने का प्रयास जारी रखना चाहिए। अगर हालात से हार मान ली गई तो भविष्य और खतरनाक हो सकता है। अमेरिका के निर्णय को सहमति और समर्थन की जरूरत है क्योंकि इसने कोशिश की। 
 
अमेरिकी लोगों को समय सीमा से बहुत लगाव है लेकिन यहां अगर समय सीमा की बात की जाती है तो इसका अर्थ यह होगा कि समस्या को ठीक तरह से समझा नहीं गया। यह एक ऐसी जंग है जिसे सामान्य समझ के मुताबिक नहीं जीता जा सकता है। ऐसा केवल तभी हो सकता है जबकि अफगानिस्तान इतना ताकतवर बन जाए कि वह अपने दम पर तालिबान से निजात पा सके। निकट भविष्य में तो ऐसा होता नहीं दिखता। लेकिन तालिबान को जीतने से जरूर रोका जा सकता है। इसके लिए बाहरी हस्तक्षेप जरूरी होगा। यकीनन जीत वही होती है जब आप जंग जीतें और शान से घर जाएं लेकिन अगर आप अपने शत्रु को जीत से दूर रख पाते हैं तो यह भी कम नहीं। आलोचकों को भी यह समझना चाहिए कि समस्या हमेशा सैन्य नहीं होती है बल्कि कई दफा उसके राजनीतिक और कूटनयिक हल तलाश करने की आवश्यकता होती है। आज का अमेरिका किसी संगठित, व्यापक प्रतिबद्घता को लेकर भरोसा नहीं पैदा करता है। 
 
अमेरिका अब उस रुख से हट चुका है जिसे देखने के हम सब आदी रहे हैं। अब वह कहीं अधिक अप्रत्याशित ढंग से काम कर रहा है। इसके चलते दुनिया की भूराजनैतिक बुनावट में, शक्ति समीकरण में और क्रिया-प्रतिक्रिया संबंधी अनुमानों में भारी बदलाव आया है। पुराने मानक ध्वस्त हो चुके हैं। ये तमाम बातें अफगानिस्तान से जुड़े मुद्दों से निपटने को काफी मुश्किल बनाती हैं।  अफगानिस्तान को लेकर ट्रंप के भाषण की आलोचना करने वालों ने पाकिस्तान को दी गई झिड़की को तवज्जो दी। यद्यपि उनका जोर इस बात पर है कि अमेरिका को अफगानिस्तान में पहुंच बनानी चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता है तो उसका झुकाव चीन की ओर हो सकता है। दोनों बातें सही हैं लेकिन यह भी सच है कि बीते तमाम दशकों में कई कोशिशें नाकाम रही हैं। पाकिस्तान ने भले ही चीन का इस्तेमाल भारत पर बढ़त लेने के लिए किया हो और अमेरिका से भी अच्छे रिश्ते कायम रखे हों लेकिन इस बीच चीन ने अपनी मजबूत पकड़ कायम कर ली है। पाकिस्तान वही कह रहा है जो चीन चाहता है।
 
अमेरिकी वक्तव्य की हर आलोचना जायज है सिर्फ निष्कर्ष को छोड़कर। यकीनन केवल अफगानिस्तान के लोग ही अपनी समस्याओं से निपट सकते हैं। राष्ट्र निर्माण का काम कभी भी बाहरी लोग नहीं करते। राजनीतिक हल की बात करें तो तालिबान को शामिल करना होगा, कूटनयिक हल में सभी पड़ोसी देशों को हिस्सेदार बनाना होगा। अगर अमेरिका की विश्वसनीय मौजूदगी नहीं हो तो जिन तमाम हलों की कल्पना की जा रही है उनमें से कोई भी हासिल नहीं होगा। संक्षेप में कहें तो ट्रंप के भाषण में किए गए वादे अंजाम तक नहीं पहुंचेंगे। यहां सवाल यह उठता है कि क्या वाकई वादे विश्वसनीय हैं?
 
इन दिनों अमेरिका में जो घटनाक्रम हो रहा है उसमें किसी भी तरह की अपेक्षा बेमानी है। अमेरिकी जनमत की सत्ता शीर्ष पर बने रहने की आकांक्षा पर हमेशा चकित करती है। उसकी खासी कीमत चुकानी पड़ती है। अक्सर जान की शक्ल में चुकाई जाने वाली कीमत पैसे की तुलना में कहीं महंगी पड़ती है। अनिवार्य राजनीतिक-कूटनीतिक लक्ष्यों की संलग्नता कई बार हताश करती है। ऑस्ट्रिया इसका उदाहरण रहा है। वहां सभी संबद्ध शक्तियों ने निष्पक्ष रुख अपनाया था। हालांकि ऑस्ट्रिया की समस्या अलग थी। वहां वास्तव में पूर्व-पश्चिम की दोमुंही समस्या थी। जबकि यहां विविध हित जुड़े हुए हैं। अमेरिका, ईरान, रूस, चीन और यहां तक कि भारत और पाकिस्तान का भी एक पहलू है। हकीकत में अगर शुरुआती चार देशों के बीच कोई समझ बनती है और अमेरिका की इसमें भूमिका होती है तो काफी कुछ रोका जा सकता है। यहां एक बात यह भी है कि भला अन्य देश यह कैसे तय कर सकते हैं कि अमेरिका के अफगानिस्तान संबंधी इरादों को लेकर अन्य देश कैसा समायोजन करेंगे? 
 
भारत और अफगानिस्तान को लेकर पाकिस्तान की आशंकाएं पूरी तरह निराधार हैं। भारत और अफगानिस्तान दोनों के पाकिस्तान के साथ विवाद हैं लेकिन दोनों ने कभी एक दूसरे का समर्थन नहीं किया है। हमने कभी डूरंड रेखा पर सवाल नहीं किया जबकि अफगानिस्तान ने कभी कश्मीर पर हमारा समर्थन नहीं किया। हां, सन 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय अवश्य अफगानिस्तान ने खुलकर पाकिस्तान का साथ दिया था। अब भारत और अफगानिस्तान के बीच बहुत अच्छे रिश्ते हैं लेकिन अगर पाकिस्तान अफगानिस्तान और भारत को अलग-थलग करना चाहता है तो क्या आशा की जाए?
 
अमेरिका की घोषणा से भारत को कोई फायदा होता नहीं दिखता। ऐसा नहीं है कि चीन और पाकिस्तान की दुर्भावना बढ़ेगी या अमेरिका कुछ ऐसा चाहता है जो हम नहीं कर सकते। अमेरिका की यह नई अनिश्चितता पहले से संकटग्रस्त विश्व को और अधिक अनिश्चित बना रही है। हमारी दिक्कत यह है कि हम आधुनिक हथियारों के लिए विदेश पर निर्भर हैं। अपनी क्षमताएं विकसित करने में अभी बहुत वक्त लगेगा। इन समस्याओं से निपटने के लिए जरूरी है कि हम अपनी निर्णय क्षमता मजबूत करें और क्रियान्वयन पर काम करें। डोकलाम की घटना हमारी कूटनीतिक क्षमताओं का संकेत है। घर में तो इस निर्णय क्षमता की और अधिक आवश्यकता है।
 
(लेखक पाकिस्तान में भारत के उच्चायुक्त, चीन और अमेरिका में भारतीय राजदूत तथा विदेश मंत्रालय में सचिव रहे हैं। लेख में उनके निजी विचार हैं।)
Keyword: america, ट्रंप, आईटी, अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप,
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