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ऊर्जित पटेल : आरबीआई के इतिहास में सबसे कठिन दौर के गवाह

अनूप रॉय /  09 03, 2017

आरबीआई के 24वें गवर्नर

गवर्नर ने विदेशी मुद्राओं में जमाओं का प्रबंधन किया और वह नोटबंदी से निपटे। इस प्रक्रिया में आरबीआई ने मुद्रास्फीति को लक्षित करने वाले ढांचे से हटकर संस्थागत मौद्रिक नीति निर्णय प्रक्रिया का रुख किया

प्रमुख घटनाएं
सितंबर
एफसीएनआर (बी) जमा की परिपक्वता की शुरुआत
मौद्रिक नीति समिति की स्थापना
अक्टूबर
भुगतान बैंकों और सूक्ष्म वित्त बैंकों के लिए दिशानिर्देश जारी
नवंबर
बैंकों को मसाला बॉन्ड की मदद से धन जुटाने की इजाजत
नोटबंदी की घोषणा
500 और 1,000 रुपये के तत्कालीन नोट चलन से बाहर।
चलन से बाहर हुए नोटों को जमा करने, उनके लेनदेन पर रोक और 500 और 2,000 के नए नोटों की निकासी आरंभ।
16 सितंबर और 11 नवंबर के बीच की गई  जमा पर 100 फीसदी इन्क्रीमेंटल सीआरआर।
जनवरी
नकद निकासी की सीमा आंशिक तौर पर शिथिल की गई।
फरवरी
आरबीआई ने नीतिगत रुख को बदलकर तटस्थ किया। दरों को रोक कर रखा गया।
नकद निकासी की सीमा को चरणबद्घ ढंग से समाप्त किया गया।
मई
सरकार ने आरबीआई को यह अधिकार दिया कि वह दिवालिया प्रस्ताव पर पहल करे।
जून
आरबीआई ने 12 बड़े खातों को तत्काल दिवालिया प्रक्रिया शुरू करने के लिए चिह्निïत किया।
अगस्त
आरबीआई ने सालाना रिपोर्ट प्रकाशित की। सरकार का लाभांश आधा हुआ।
उसने बताया कि 99 फीसदी बंद किए गए नोट बैंकिंग व्यवस्था में वापस आ गए।

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के 24वें गवर्नर के रूप में काम संभालने के पहले ही दिन ऊर्जित पटेल ने चीजों को एकदम सहज बनाए रखा। उन्होंने न तो अपने कार्मिकों को संबोधित किया और न ही मीडिया के इस अनुरोध को स्वीकार किया कि पूर्ववर्ती रघुराम राजन से कार्यभार संभालने के अवसर को कवर करने दिया जाए। इस दौरार उतार-चढ़ाव से भरा एक वर्ष बीत गया है लेकिन पटेल मीडिया और बैंकरों से उतने नहीं खुल सके हैं जितनी शायद उनसे अपेक्षा की गई होती। लेकिन कई मुद्दों पर वह कड़े कदम उठाने से भी पीछे नहीं हटे हैं। फिर चाहे मामला कृषि ऋण माफी का हो या फंसे हुए कर्ज से निपटने के संबंध में बैंकों के लिए सरकार से अधिक पूंजी की मांग करना। पटेल ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि आरबीआई की स्वायत्तता बरकरार रहेगी। 

अर्थशास्त्रियों की मानें तो पटेल का एक वर्ष आरबीआई के इतिहास के सबसे कठिन वक्त में शामिल है। शायद यह समय सन 1991 के भुगतान संतुलन के संकट से भी कठिन समय था। उस वक्त एस वेंकटरमणन आरबीआई गवर्नर थे और देश को अपना सोना गिरवी रखना पड़ा था। सन 2008-09 का ऋण संकट भी शायद इतना गहन नहीं था। उस वक्त डी सुब्बाराव आरबीआई गवर्नर थे। 

पटेल के आरबीआई गवर्नर बनने के दो महीने के भीतर ही नोटबंदी  के चलते 86 फीसदी बैंक नोट चलन से बाहर कर दिए गए। तब से अब तक केंद्रीय बैंक संकट से निपटने की जद्दोजहद में ही है। विश्लेषकों की मानें तो नोटबंदी की शुरुआती प्रतिक्रिया में तालमेल की कमी नजर आई लेकिन आखिरकार केंद्रीय बैंक व्यवस्था को संभालने में सफल रहा। अब नकदी की उपलब्धता कोई समस्या नहीं है। 

गत सप्ताह आरबीआई ने अपनी सालाना रिपोर्ट में बताया 15.44 लाख करोड़ रुपये की जो नकदी बंद की गई थी उसमें से करीब 99 फीसदी मुद्रा वापस आ गई है। दिसंबर तक आरबीआई ने बता दिया था कि 12.4 लाख करोड़ रुपये के नोट वापस आ गए थे। 3 लाख करोड़ रुपये की अतिरिक्त नकदी गिनने में केंद्रीय बैंक को करीब नौ महीने का वक्त लगा। बहरहाल, अंतिम अनुमान पेश करके आरबीआई ने यह बता दिया है कि उसकी ईमानदारी इतनी बेमिसाल क्यों है। पटेल ने उसे बरकरार रखा है।

आरबीआई को नोटबंदी की पूरी जानकारी थी लेकिन यह पता नहीं है कि उसके पास तैयारी का वक्त कितना था? चाहे जो भी हो लेकिन पटेल ने अपने बचाव में कुछ नहीं कहा, न ही उन्होंने खुद को इस पूरे घटनाक्रम से अलग किया। केयर रेटिंग्स के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस ने कहा था, 'ऊर्जित पटेल इस संस्थान के सर्वश्रेष्ठ गवर्नरों में से एक हैं। वह एक पेशेवर व्यक्ति हैं जिसने तमाम कठिन परिस्थितियों में काम करते हुए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया।' हो सकता है कुछ लोग उनके आकलन से सहमत नहीं हों लेकिन इस बात से कोई इनकार नहीं करेगा कि पटेल का काम बहुत कठिन था। 

बार्कलेज के मुख्य अर्थशास्त्री सिद्घार्थ सान्याल ने गवर्नर की सराहना करते हुए कहा कि नोटबंदी के बाद के कठिन समय से निपटना आरबीआई के लिए बहुत बड़ी चुनौती थी। इसके अलावा भी कई अन्य चुनौतियां थीं। उदाहरण के लिए अर्थव्यवस्था में नकदी की भारी मांग से निपटना और बड़े पैमाने पर नकदी बहाल करना। 

गर्वनर के रूप में उनकी पहली चुनौती थी विदेशी मुद्रा में जमा अनिवासी भारतीयों के 26 अरब डॉलर का ऋणमोचन। यह राशि तीन साल पहले उस वक्त जमा की गई थी जबकि रुपया डॉलर के मुकाबले तेजी से गिर रहा था। पुनर्भुगतान से नकदी संकट उत्पन्न हो सकता था लेकिन पटेल ने इसका कुशलतापूर्वक प्रबंधन किया और बाजार पर कोई असर नहीं होने दिया। नोटबंदी के बाद अत्यधिक नकदी हुई लेकिन आरबीआई ने इससे निपटने के लिए भी कई नकदी प्रबंधन उपाय अपनाए। निश्चित तौर पर आरबीआई को तेल कीमतों में कमी और खाद्य कीमतों में गिरावट का लाभ मिला है लेकिन मुद्रास्फीति इस वर्ष जून में 1.5 फीसदी के साथ न्यूनतम स्तर पर आ गई। पटेल ने देश में मुद्रास्फीति को लक्षित करने वाली प्रणाली भी विकसित की। वह छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति के पहले अध्यक्ष भी बने। अब गवर्नर के बजाय यह समिति ही दरों से संबंधित निर्णय लेती है। एमपीसी की बैठक से आई जानकारी बताती है कि दरों को लेकर सभी सदस्य गवर्नर से सहमत नहीं होते जबकि विकसित देशों के केंद्रीय बैंकों में ऐसा नहीं होता। 

एमपीसी के बाहरी सदस्य रवींद्र ढोलकिया आरबीआई के दरों संबंधी निर्णय की आलोचना करते हैं और मुद्रास्फीति संबंधी अनुमानों तक नहीं पहुंचने की भी। अधिकांश विश्लेषक इस मामले में ढोलकिया के साथ नजर आएंगे। मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने अक्सर आरबीआई की आलोचना करते हुए कहा है कि वह मुद्रास्फीति में तेज गिरावट के बावजूद वह दरों में कटौती नहीं कर रहा। विश्लेषक यह भी कहते हैं कि आरबीआई के नीतिगत कदम में निरंतरता नहीं है और केंद्रीय बैंक अक्सर चूक कर जाता है। 

पटेल को अक्सर फंसे हुए कर्ज का मुद्दा हल करने की दिशा में निर्णायक कदम उठाने के लिए भी याद किया जाता है। उनके पूर्ववर्ती रघुराम राजन ने परिसंपत्ति की गुणवत्ता जांच के साथ इस प्रक्रिया की शुरुआत की थी लेकिन वह किसी समझौते पर नहीं पहुंच सके थे। पटेल ने इस मामले में निर्णायक कदम उठाए। उन्होंने दिक्कतदेह कंपनियों को दिवालिया प्रक्रिया की ओर अग्रसरित किया। हालांकि बैंकरों ने कहा कि यह बहुत कड़वी दवा होगी। आरबीआई के प्रोविजनिंग संबंधी सख्त मानकों ने बैंकों की हालत खराब की है। ऐसा इसलिए कि बैंक पहले ही पूंजी की कमी से जूझ रहे हैं। प्रोविजन में आगे इजाफा ही होगा। इसके चलते कुछ बैंक दिवालिया तक हो सकते हैं।

चाहे जो भी हो विश्लेषक कहते हैं कि पटेल की विरासत इस बात से तय होगी कि केंद्रीय बैंक करीब 8 लाख करोड़ रुपये मूल्य के फंसे हुए कर्ज से कैसे निपटता है। आरबीआई को सरकार ने कंपनियों के बारे में सूक्ष्म स्तर तक के निर्णय लेने के पूरे अधिकार दे रखे हैं। देखना यह होगा कि पटेल के नेतृत्व में आरबीआई बतौर नियामक और समस्या हल करने वाले के रूप में अपनी भूमिका निभा पाता है या नहीं। 

आरबीआई की स्वायत्तता के बारे में काफी कुछ कहा गया है। खासतौर पर नोटबंदी के बाद। एमपीसी के एक संवाददाता सम्मेलन के बाद पटेल यह दिखा भी चुके हैं कि आरबीआई की संस्थागत अक्षुण्णता से समझौता करने का उनका कतई मन नहीं है।  जून की मौद्रिक नीति में जब पूछा गया कि क्या वित्त मंत्रालय द्वारा एमपीसी सदस्यों को चर्चा के लिए बुलाया जाना आरबीआई की स्वायत्तता से समझौता तो नहीं है। इस पर पटेल ने कहा कि  बैठक नहीं हो पाई क्योंकि एमपीसी के सभी सदस्यों ने वित्त मंत्रालय के बैठक के अनुरोध को ठुकरा दिया। उन्होंने कहा कि ऋण माफी से ईमानदार ऋण संस्कृति पर बुरा असर होता है। यह ऋण के अनुशासन को प्रभावित करती है और भविष्य के कर्जदारों को कर्ज न चुकाने के लिए प्रोत्साहित करती है। दूसरे शब्दों में कहें तो ये एक नैतिक समस्या को जन्म देते हैं। 

ऊर्जित के बोल
कर्जमाफी पर
इससे ईमानदार ऋण संस्कृति पर बुरा असर पड़ता है। यह ऋण के अनुशासन को प्रभावित करता है, भविष्य के कर्जदारों को इससे कर्ज न चुकाने को बढ़ावा मिलता है। दूसरे शब्दों में कर्जमाफी नैतिक पतन का जोखिम पैदा करती है।
पारेषण पर
मुझे लगता है कि बैंकों के पास गुंजाइश है कि वह उन तबकों के लिए दरों में कटौती करे जिनको अब तक नीतिगत दरों में कटौती का पूरा लाभ नहीं मिल सका है।
बैंकों और पूंजी के बारे में
'फंसी हुई संपत्तियों का समय पर और सहज नकदीकरण अहम है। इसकी मदद से बैलेंस शीट की दिक्कतों को कम किया जा सकता है। यह बैंकों की पूंजी के किफायती पुनरावंटन के लिए भी अहम है। समस्या निवारण के तमाम प्रयासों की सफलता और विश्वसनीयता सरकारी क्षेत्र की बैलेंस शीट की लागत बरदाश्त करने की मजबूती की दृष्टिï से अहम होगी।
बैंकों के विलय पर
जैसा कि कई लोगों ने कहा है, यह स्पष्टï नहीं है कि हमें इतने अधिक सरकारी बैंकों की आवश्यकता है या नहीं। अगर हमारे पास सीमित लेकिन मजबूत बैंक हों तो बेहतर होगा।
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