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आरबीआई को कमजोर कर रही अफसरशाही : रघुराम राजन

बीएस संवाददाता / मुंबई 09 03, 2017

अपनी किताब 'आई डू व्हॉट आई डू' में प्रकट किए विचार

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने एक बार फिर आगाह किया है कि नौकरशाही को केंद्रीय बैंक के अधिकारों में हस्तक्षेप करने से रोका जाना चाहिए और उसे साफ तौर पर बताया जाना चाहिए कि गवर्नर का पद किसी नौकरशाह की तरह नहीं है। राजन ने अपनी किताब 'आई डू व्हॉट आई डू' में लिखा है कि आरबीआई गवर्नर के पद को अच्छी तरह परिभाषित नहीं करना खतरनाक है क्योंकि नौकरशाही लगातार उसे कमजोर करने का प्रयास कर रही है। यह कोई हाल की बात नहीं है लेकिन इसके खतरनाक स्तर तक कमजोर होने का जोखिम बढ़ रहा है क्योंकि एक के बाद एक सभी सरकारों और वित्त मंत्रियों ने आरबीआई गवर्नर की भूमिका को गलत समझा।

उन्होंने कहा कि टेक्रोक्रेट के तौर पर देश के आर्थिक जोखिम प्रबंधन के लिए आरबीआई गवर्नर की जिम्मेदारी किसी दूसरे नौकरशाह या नियामक की तरह नहीं है और इसे नौकरशाही के पदानुक्रम में लाकर कमतर बनाने के प्रयास गुमराह करने वाले हैं और देश के हित में नहीं हैं। आरबीआई की भूमिका और आजादी को लेकर ज्यादा स्पष्टïता देश के हित में है। संभवत: यह पहला मौका है जब राजन ने इस मुद्दे पर खुलकर अपनी बात रखी है और वित्त मंत्रालय तथा आरबीआई के बीच मतभेदों को दुनिया के सामने रखा है। उनकी बातों से साफ है कि वित्त मंत्रालय आरबीआई को कमजोर करने की कोशिश करता है।

राजन ने अपनी किताब में नोटबंदी के बारे में भी साफगोई से अपने विचार रखे हैं और कहा है कि वह इस फैसले का हिस्सा नहीं थे। उन्होंने लिखा, 'फरवरी 2016 में सरकार ने नोटबंदी के बारे में मुझसे राय मांगी जिस पर मैंने मौखिक जवाब दिया। मैंने कहा कि इसके दूरगामी फायदे हो सकते हैं लेकिन इसकी अल्पकालिक आर्थिक लागत उन फायदों से ज्यादा होगी। इस लक्ष्य को पाने के दूसरे बेहतर तरीके हो सकते हैं।'

इसके बाद राजन को एक नोट बनाने को कहा गया जिसे आरबीआई ने तैयार करके सरकार को सौंप दिया। राजन के मुताबिक नोट में नोटबंदी की संभावित लागत और फायदों के अलावा समान लक्ष्यों को पाने के वैकल्पिक रास्ते भी बताए गए थे। नोट में कहा गया था कि अगर इसके फायदे और नुकसान पर गौर करने के बाद भी नोटबंदी का फैसला होता है तो इसके लिए जरूरी तैयारी और उस पर लगने वाले समय के बारे में भी बताया गया था। आरबीआई ने यह भी आगाह किया था कि पर्याप्त तैयारी के बिना नोटबंदी से क्या हो सकता है। इसके बाद सरकार ने इससे जुड़े मुद्दों पर विचार करने के लिए एक समिति बनाई जिसमें मुद्रा की जिम्मेदारी संभाल रहे आरबीआई के डिप्टी गवर्नर भी थे। संभवत: उस समय इस पद पर आर गांधी थे। राजन ने कहा, 'मेरे कार्यकाल के दौरान कभी भी आरबीआई को नोटबंदी पर फैसला लेने के लिए नहीं कहा गया।'

राजन ने पिछले साल 3 सितंबर को आरबीआई गवर्नर का पद छोड़ा था जबकि नोटबंदी की घोषणा 8 नवंबर को की गई थी। इसका मतलब यह है कि नए गवर्नर ऊर्जित पटेल के पद संभालने के बाद आरबीआई को नोटबंदी की तैयारी के लिए अधिकतम दो महीने का समय मिला। वास्तव में तो आरबीआई को इससे भी कम समय मिला होगा या फिर इस तरह फैसले की गोपनीयता को देखते हुए घोषणा के लिए ज्यादा समय नहीं मिला होगा। आरबीआई ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट में अनुमान जताया है कि चलन से बाहर किए गए 15.44 लाख करोड़ नोटों में से 15.28 करोड़ नोट वापस बैंकों में जमा करा लिए गए हैं। इससे देश में इस बात पर बहस शुरू हो गई है कि नोटबंदी सफल रही या नाकाम। राजन ने एक अन्य मीडिया संस्थान को दिए साक्षात्कार में संभावना जताई कि नोटबंदी सफल नहीं रही।

राजन ने आरबीआई गवर्नर के तौर पर 3 सितंबर, 2016 को दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज में दिए गए अपने अंतिम भाषण पर स्पष्टीकरण दिया है। उस भाषण में उन्होंने कहा था कि ऐसे शक्तिशाली पद का होना खतरनाक है जिसका कानूनी दर्जा कम हो। उनका कहना था कि गवर्नर का वेतन कैबिनेट सचिव के बराबर होता है और उसकी नियुक्ति वित्त मंत्री की सलाह पर प्रधानमंत्री करते हैं। सरकारी पदानुक्रम में गवर्नर का पद परिभाषित नहीं है लेकिन यह आमतौर पर इस बात पर सहमति रहती है कि आरबीआई के फैसलों के बारे में केवल प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री को ही बताया जाएगा। गवर्नर के पद को देश की आर्थिक नीति के लिए जिम्मेदार सबसे अहम टेक्रोक्रेट के तौर पर परिभाषित किया जाना चाहिए।

अपनी किताब में राजन ने अपने साक्षात्कार का भी जिक्र किया है जिसमें उन्होंने कमजोर वैश्विक हालात में भारत के आर्थिक उभार को अंधों में काना राजा बताया था। उनका यह बयान सोशल मीडिया पर तुरंत विवादास्पद हो गया था। राजन का कहना है कि उन्हें जबरदस्ती विवाद में घसीटने की कोशिश की जा रही थी जिससे वह तंग आ गए थे। बाद में उन्होंने इस बयान पर स्पष्टïीकरण देने की भी कोशिश की लेकिन उसका भी गलत मतलब निकाला गया। राजन अपनी किताब में लिखते हैं, 'मैंने सोचा कि अब और स्पष्टीकरण देने की जरूरत नहीं है। जो समझना ही नहीं चाहते उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।'

साथ ही वह लिखते हैं कि एक भाषण के दौरान उनके द्वारा हिटलर का उल्लेख करना बहुत विवादास्पद हो गया था। अगर उन्हें इसका पूर्वाभास होता तो वह कभी ऐसा नहीं करते। उनका कहना है कि यह किसी खास प्रशासन से नहीं जुड़ा था। राजन ने आरबीआई गवर्नर का पद संभालने के बाद अपने पहले भाषण का भी अपनी किताब में जिक्र किया है। तब उन्होंने सुधारवादी एजेंडा दुनिया में समक्ष रखा था और अनिवासी भारतीयों के लिए डॉलर जमा करने की एक योजना शुरू करने की बात कही थी। उनका कहना है कि इसका मकसद लोगों और निवेशकों को यह आश्वासन देना था कि आरबीआई अच्छी तरह जानता है कि उसे क्या करना है। इसका मकसद दुनिया को यह संदेश देना था कि भारत के पास आरबीआई जैसे मजबूत संस्थान हैं जो संसद में गतिरोध के बावजूद सुधारों को आगे बढ़ा सकता है और अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को खारिज नहीं करना चाहिए। उनका यह संदेश काम कर गया और एक महीने पहले ही डॉलर के मुकाबले 68.87 के न्यूनतम स्तर पर पहुंच चुका रुपया स्थिर होकर मजबूत होने लगा।
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