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दिग्गज मीडिया कंपनियों के कारोबार का बदलता ढांचा

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  September 03, 2017

भारतीय मीडिया जगत की अग्रणी कंपनियों का बदलता स्वरूप किस तरफ इशारा करता है? वर्ष 2003 में टेलीविजन  शो 'कौन बनेगा करोड़पति' को मिली शानदार कामयाबी के बाद स्टार इंडिया का परचम लहरा रहा था। उस समय मैंने बिज़नेसवल्र्ड पत्रिका के लिए एक कवर स्टोरी की थी जिसका विषय 'दिग्गज मीडिया घरानों का उदय' था। उस समय स्टार इंडिया का अनुमानित राजस्व करीब 1,200 करोड़ रुपये था और वह भारत की शीर्ष मीडिया कंपनी टाइम्स ग्रुप के 1,500 करोड़ रुपये के राजस्व से ज्यादा पीछे नहीं था। ज़ी समूह भी 1,199 करोड़ रुपये के राजस्व के साथ स्टार के बेहद करीब था। 

 
वर्ष 2003 में भारत की शीर्ष 10 मीडिया कंपनियों में से पांच को अपना बहुत बड़ा राजस्व प्रकाशन से मिलता था। लेकिन उसके 14 साल बाद वर्ष 2017 में मीडिया कंपनियों का स्वरूप काफी हद तक बदल चुका है। इस समय की शीर्ष 10 मीडिया कंपनियों के ढांचे पर नजर डालें तो उनकी प्रगति, गंवाए हुए अवसरों और बेतुके मीडिया नियमनों की कहानी बयां होती है। सबसे पहले हम मीडिया कंपनियों के विकास पर गौर करते हैं। वर्ष 2003 में 24,600 करोड़ रुपये के आकार वाले मीडिया एवं मनोरंजन जगत का आकार अब करीब पांच गुना बढ़ोतरी के साथ 126,210 करोड़ रुपये पर पहुंच चुका है। शीर्ष मीडिया कंपनियों में ज़ी समूह 11,287 करोड़ रुपये के राजस्व के साथ सबसे आगे खड़ा है। स्टार और टाइम्स ग्रुप भी 10,000 करोड़ रुपये के राजस्व के साथ भारत के अग्रणी मीडिया घरानों में बने हुए हैं। अगर 2003 की स्थिति से तुलना करें तो आज उनका आकार करीब 10 गुना बढ़ चुका है। नेटवर्क18, सोनी, टाटा स्काई, सन नेटवर्क और भारती एयरटेल का मीडिया कारोबार भी इन शीर्ष मीडिया कंपनियों में शामिल हैं।  जाहिर है कि इस सूची में टेलीविजन मीडिया कंपनियों का वर्चस्व बना हुआ है। वर्ष 1991 में उदारीकरण के बाद निजी कंपनियों को प्रसारण क्षेत्र में आने की मंजूरी दी गई थी और टेलीविजन उद्योग के अब तक के प्रदर्शन से यह साबित होता है कि वह लगातार बढ़ रहा है। वर्ष 2017 की दिग्गज मीडिया कंपनियों की सूची इस सच्चाई पर मुहर भी लगाती है। असलियत तो यह है कि इन 10 कंपनियों में से सात कंपनियां अपना समूचा राजस्व टेलीविजन प्रसारण या वितरण से कमाती हैं। राजस्व कमाने के मामले में टीवी उद्योग ने प्रिंट की तुलना में लगभग दोगुनी रफ्तार दिखाई है। हालांकि एक सच यह भी है कि मुनाफा कमाने के मामले में प्रिंट मीडिया का प्रदर्शन टीवी से बेहतर रहा है। कुछ प्रिंट कंपनियां तो 20-25 फीसदी का परिचालन लाभ कमा रही हैं। 
 
भारती एयरटेल और टाटा स्काई ने पिछले एक दशक में डीटीएच सेवाओं का प्रसार होने की वजह से खासा दबदबा बनाया है। इन कंपनियों ने टेलीविजन सिग्नल को आपके घरों तक पहुंचाने के कारोबार के अनुकूल माहौल का पूरा फायदा उठाया है। उनका उदय गंवाए हुए अवसरों के साथ अजीबोगरीब नियमन को भी परिलक्षित करता है। यहां पर अवसर गंवाने का जिक्र भला क्यों किया गया है? इसकी वजह यह है कि शीर्ष कंपनियों में कोई भी केबल प्रसारण कंपनी नहीं है। हैथवे केबल ऐंड डेटाकॉम कंपनी 1,368 करोड़ रुपये के राजस्व के साथ शीर्ष 20 मीडिया कंपनियों में जगह बनाने में जरूर सफल रही है। केबल के जरिये ही पहले निजी टेलीविजन चैनलों का प्रसारण हुआ करता था। हकीकत तो यह है कि आज के दौर में भी कुल 18 करोड़ घरों में से 10 करोड़ घरों तक टीवी प्रसारण केबल नेटवर्क के जरिये ही होता है। अमेरिका में केबल प्रसारण कंपनियों की गिनती शीर्ष मीडिया कंपनियों में होती है। ऐसे में सवाल उठता है कि कॉमकास्ट या लिबर्टी ग्लोबल की तरह की कोई केबल प्रसारण कंपनी भारत में क्यों नहीं है? इसका जवाब यह है कि केबल प्रसारण का कारोबार बेहद बिखरा हुआ है और उसका नियमन कर पाना भी काफी मुश्किल है।
 
कीमतों का विनियमन होने से टीवी सामग्री विज्ञापनदाताओं के चंगुल में फंस गया है। इसका एक और मतलब है कि भारत में सही मायनों में पे टीवी की कोई गुंजाइश ही नहीं बन पाई। इसका नतीजा यह हुआ है कि भले ही संख्या के मामले में भारतीय टेलीविजन उद्योग दुनिया में दूसरे स्थान पर है लेकिन राजस्व संग्रह और लाभपरकता के मामले में इसकी गिनती निचली कतार में ही होती है। फिल्मों के कारोबार में यह परिदृश्य और भी स्पष्ट नजर आता है। दुनिया में सबसे ज्यादा फिल्में बनाने वाले देश में कोई भी फिल्म निर्माण या फिल्म वितरण कंपनी शीर्ष मीडिया कंपनियों में शामिल नहीं है। शीर्ष 20 मीडिया कंपनियों में शामिल पीवीआर सिनेमा का राजस्व 2,062 करोड़ रुपये रहा है। अमेरिका और कनाडा के फिल्म उद्योग में बनने वाली फिल्मों की संख्या भारत की तुलना में करीब आधी होती हैं लेकिन बॉक्स ऑफिस पर वे दस गुना राशि कमा लेते हैं। इसकी वजह अमेरिका में फिल्म टिकटों की ऊंची कीमतें होने के अलावा यह भी है कि भारत में सिनेमाघरों की संख्या ही काफी कम है। फिल्म उद्योग का 70 फीसदी से भी अधिक कारोबार तो स्क्रीन के ही जरिये आता है। इस तरह भारत फिल्म कारोबार के लिहाज से अहम ढांचे की कमी का सामना कर रहा है। अधिक स्क्रीन होने का मतलब है कि अधिक राजस्व मिलेगा और अधिक लोगों को रोजगार भी मिलेगा।  भारतीय सिनेमा की असरदार क्षमता को दुनिया भर में स्वीकार किया जाता है। लेकिन भारत में ही उसे तमाम बंदिशें झेलनी पड़ी हैं और सही मायनों में रचनात्मक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने का ढांचा नहीं बन पाया है। इस तरह भारत की प्रमुख मीडिया कंपनियों की सूची मीडिया एवं मनोरंजन जगत की वास्तविक क्षमताओं को ठीक से नहीं दिखाती है। यह सूची उन गिनी-चुनी कंपनियों का संकलन है जिन्होंने मीडिया कारोबार के लिए अधिक अनुकूल माहौल न होते हुए भी अपना मुकाम बनाया है। भारत में तो अभी तक यह स्वीकार ही नहीं किया गया है कि मीडिया क्षेत्र की कोई कंपनी भी बड़ी हो सकती है और सकल घरेलू उत्पाद में सकारात्मक योगदान कर सकती है। 
Keyword: media, TV, KBC,,
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