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अहम मोड़ पर

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  September 01, 2017

इन दिनों एक विरोधाभास एकदम साफ महसूस किया जा सकता है। अर्थव्यवस्था के खस्ताहाल होते जाने के बीच भी मोदी सरकार राजनीतिक रूप से मजबूत हो रही है और उसे जन समर्थन भी मिल रहा है। क्या इन दोनों बातों का विपरीत दिशाओं में बढऩा जारी रहेगा? फिलहाल तो ऐसा ही लग रहा है। इंदिरा गांधी के साथ भी ऐसा ही हुआ था। आजादी के बाद आर्थिक वृद्घि दर के सबसे निचले स्तर पर आ जाने के बाद भी वह लोकप्रिय बनी रहीं। उन्होंने लोगों को गरीबी हटाने का ख्वाब दिखाया और कई लोकलुभावन कदम उठाए। इन कदमों में बैंकों का राष्टï्रीयकरण करना और गरीबों को सस्ते ऋण देना, रॉबिनहुड की शैली में आयकर को बढ़ाकर 97 फीसदी करना (ताकि अमीरों से कर ले कर गरीब कल्याण किया जा सके) आदि शामिल थे। उन्होंने एक जंग भी जीती और पाकिस्तान को निशाने पर रखा। इस बीच उन्होंने अपनी अलहदा छवि तैयार की। 

 
क्या इन बातों की तुलना आज से की जा सकती है? हां भी और नहीं भी। इस समय बहुसंख्यक राष्टï्रवाद का बोलबाला है। यह गरीबी हटाओ के पुराने नारे की तुलना में कहीं अधिक मजबूत है क्योंकि उसका सीधा संबंध प्रदर्शन से था। नोटबंदी ने वही काम किया। इससे यह संदेश गया कि भ्रष्टï अमीरों को निशाने पर लिया जा रहा है। पुराने दौर में यह काम आयकर की दर ने किया था। फिलहाल किसानों की जो कर्जमाफी हो रही है उसकी तुलना बैंकों के सस्ते ऋण से की जा सकती है। जन धन खाते को भी बैंकों की पहुंच से जोड़कर ही देखा जाता है। डोकलाम की तुलना बांग्लादेश युद्घ में जीत से नहीं की जा सकती है लेकिन इसने चीन के समक्ष मोदी के ताकतवर ढंग से खड़े होने का तथ्य तो स्थापित किया ही है। आखिर में यहां भी वही व्यक्तित्व आधारित राजनीति हमारे सामने है। 
 
दो बातें इंदिरा गांधी के आड़े आ गईं। एक तो उस वक्त भ्रष्टाचार का विस्तार और दूसरा तेल कीमतों में तेजी और लगातार पड़ रहे सूखे से उपजा दोहरा संकट। इसकी वजह से मुद्रास्फीति में बेतहाशा तेजी आई। राजनीतिक और आर्थिक असंतोष के उस दौर में उन्होंने अधिनायकवादी रुख अपना लिया। आज मोदी की भ्रष्टïाचार से लडऩे की भावना को बल मिल रहा है लेकिन आर्थिक खतरा भी बरकरार है। इस बार भय मुद्रास्फीति का नहीं बल्कि मंदी का है जिसकी बदौलत बेरोजगारी जोर पकड़ सकती है। नोटबंदी की आलोचना आगे बढ़कर आर्थिक कुप्रबंधन के व्यापक आरोप में तब्दील हो जाती है। दो तिमाहियों में जीडीपी के कमजोर आंकड़े इसके उदाहरण हैं। परंतु बिना समतुल्य राजनीतिक चुनौती के मोदी को 2019 में कोई बड़ा खतरा नजर नहीं आता। उन्हें खतरा केवल एक ही स्थिति में हो सकता है कि लगभग विपक्षमुक्त होते देश में वह और उनके साथी अधिनायकवादी हो जाएं और आम जन उनसे विमुख हो जाएं। 
 
अर्थव्यवस्था को तेजी की आवश्यकता है लेकिन न चुकाए जा सकने योग्य बैंक ऋण के रूप में एक वित्तीय संकट तैयार हो रहा है। वृद्घि के लिए ऋण जरूरी है लेकिन उसमें भी ठहराव है। तेज वृद्घि के लिए निर्यात में तेजी की आवश्यकता है लेकिन रुपये का अधिमूल्यन भी हमारे लिए अनुकूल नहीं। निवेश में सुधार की जरूरत है और वृद्घि को लेकर आरबीआई का अनुमान भी सटीक नहीं प्रतीत होता। उसने 7.3 फीसदी वृद्घि का अनुमान जताया है। इस साल ब्याज दरें भी बहुत ज्यादा हैं। जमीन, श्रम और पूंजी जैसे कारक वाले बाजारों की बात करें तो उनमें कोई सुधार नहीं हुआ है। इसलिए अचल संपत्ति क्षेत्र में सुधार तथा मेक इन इंडिया के अनुकूल परिस्थितियां तैयार करने की आवश्यकता है। यह कौशल कार्यक्रम तभी कारगर होगा जबकि अप्रेंटिसशिप से जोड़ा जाए। भला कौन होगा जो रोजगार न होने पर भी कौशल हासिल करने के लिए भुगतान करे। शहरों और कस्बों के प्रबंधन में सुधार की जरूरत है। 
 
रोजगार गारंटी कार्यक्रम में अतिरिक्त आवंटन की आवश्यकता है। प्रधानमंत्री इस समय अहम मोड़ पर हैं। दो अंकों की आर्थिक वृद्घि का उनका दावा लोगों की स्मृति से हट गया है। किन सरकार को काम करना होगा ताकि बताने के लिए कुछ तो रहे। वृहद आर्थिक स्थिरता, कर सुधार, नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र, राजमार्ग निर्माण, पेट्रोलियम सब्सिडी का लगभग अंत आदि कई बातें उनके पक्ष में हैं। परंतु उदय, फसल बीमा, स्वच्छ भारत, रक्षा ऑर्डर में आयात को आधा  करने, गंगा सफाई, रेलवे सुरक्षा के मोर्च पर सरकार नाकाम है। मंत्रिमंडल फेरबदल सही समय पर हो रहा है लेकिन अधिकांश बातें मोदी पर निर्भर करती हैं। प्रयासों की बात छोड़ दें तो नतीजों के मोर्चे पर वह पिछड़ रहे हैं।
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