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दूर हों 'आकाश' की खरीद से जुड़ी हुई तमाम अड़चनें

दोधारी तलवार
अजय शुक्ला /  August 31, 2017

विश्व की प्रमुख शक्तियां रक्षा क्षेत्र में स्वदेशीकरण अपनाती हैं यानी अपने ही देश में हथियारों और रक्षा उपकरणों का विकास और निर्माण करती हैं। हमारे देश में एक के बाद एक सरकारें संसद और सार्वजनिक तौर पर इस बारे में बातें तो करती रही हैं लेकिन इस दिशा में क्या किया जाना है यह जानने के लिए आकाश मिसाइल सिस्टम के उदाहरण पर गौर करना होगा। यह प्रणाली भारतीय आकाश की रक्षा के लिए तैनात है। इस व्यवस्था में रोहिणी रडार शामिल है जो 120 किलोमीटर की दूरी से आने वाले विमान को भांप लेता है और कमांड पोस्ट को जानकारी देता है। इसमें तय लक्ष्यों को मार गिराने के लिए मिसाइल लॉन्चर शामिल हैं। एक कमांडो गाइडेंस रडार लक्ष्य तय करता है और मिसाइलों को उसकी ओर दागता है। आकाश पहले ही यह दिखा चुका है कि वह 25 किमी की दूरी से बहुत नीचे उड़ रहे दुश्मन विमान को ध्वस्त कर सकता है।

 
आकाश का निर्माण रक्षा अनुसंधान एवं विकास संस्थान (डीआरडीओ) ने एकीकृत निर्देशित प्रक्षेपास्त्र विकास कार्यक्रम के तहत किया। इसकी शुरुआत सन 1983 में डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के नेतृत्व में की गई थी। उस वक्त किसी देश से कोई तकनीक न मिलने के कारण भारत के पास इसके अलावा कोई चारा नहीं रह गया था कि वह अपनी मिसाइल व्यवस्था बनाए। इस परियोजना ने पृथ्वी और अग्रि जैसी मिसाइल को जन्म दिया, नाग के रूप में टैंक रोधी मिसाइल दी और आकाश मिसाइल का निर्माण किया। इन तमाम बातों के बीच यह स्पष्ट है कि आकाश के साथ रक्षा मंत्रालय का व्यवहार उचित नहीं। डीआरडीओ द्वारा आकाश की मूल तकनीक विकसित करने के बाद दो सरकारी कंपनियों भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड और भारत डायनामिक्स ने पूरी व्यवस्था को एकरूपता दी। टाटा पावर और लार्सन ऐंड टुब्रो जैसी निजी कंपनियों ने मिसाइल लॉन्चर जैसी अन्य व्यवस्थाएं विकसित कीं। 330 छोटी कंपनियों ने दूसरे और तीसरे दर्जे की कंपनियों के रूप में इसके निर्माण में योगदान किया। इन कंपनियों ने मिलकर पूरा माहौल तैयार किया जिसके तहत मौजूदा व्यवस्था को उन्नत किया जाना है और नई पीढ़ी की मिसाइल तैयार की जानी हैं। यह पहला मौका है जब देश में स्वदेशी मिसाइल निर्माण को लेकर ऐसी व्यवस्था विकसित की जा सकी है। इसे बरकरार रखना देश के हित में है। इसके लिए जरूरी है कि निर्माण के ठेके मिलते रहें। आज आकाश का निर्माण रुका है क्योंकि रक्षा मंत्रालय अगले ऑर्डर की लागत को लेकर बीईएल से सहमत नहीं। इसके चलते आकाश के आठ बेड़े सेना में शामिल नहीं हो पा रहे हैं क्योंकि मंत्रालय का कहना है कि इसकी कीमत अंतरराष्ट्रीय कीमतों से मेल खानी चाहिए। घरेलू निर्माताओं को जो कठिनाइयां होती हैं उनकी समझ किसी को नहीं।
 
शुरुआत से ही वायु सेना भी विदेश में निर्मित मिसाइल सिस्टम चाहती थी। वर्ष 2004 तक बार-बार परीक्षण के बाद भी वायु सेना इसे खारिज करती रही जबकि मिसाइल हमेशा लक्ष्य भेदती रही। एक किस्सा तो अब डीआरडीओ के इतिहास में दर्ज हो चुका है। आकाश के परियोजना निदेशक डॉ. प्रह्लाद ने मिसाइल को करो या मरो परीक्षण के लिए तैयार किया। एक निशांत ड्रोन के माध्यम से लक्ष्य आसमान में भेजा गया, आकाश मिसाइल को इसे भेदना था। अचानक लक्ष्य ड्रोन से अलग होकर जमीन पर आ गिरा। तब डॉ. प्रह्लाद ने साहसपूर्वक ड्रोन को ही लक्ष्य घोषित किया और 20 किलोमीटर की दूरी से आकाश मिसाइल ने एक अत्यंत छोटे ड्रोन को ध्वस्त कर दिया। डेढ़ करोड़ रुपये का ड्रोन नष्ट हो गया। डॉ. प्रह्लाद को लंबे समय तक आपत्तियों का सामना करना पड़ा लेकिन विमान से बहुत छोटे लक्ष्य को भेदकर आकाश ने अपनी श्रेष्ठता साबित कर दी थी। 
 
सेना को महंगा होने के बावजूद आकाश की खरीद करनी चाहिए। इसकी कम से कम पांच वजह हैं। पहली बात, मौजूदा आकाश भविष्य में बेहतर संस्करणों की राह बनाएगा। डीआरडीओ पहले ही महज 50 करोड़ रुपये की लागत से एक प्रणाली विकसित कर रहा है जो आकाश को अधिक उपयुक्त और लंबी दूरी तक मार करने में सक्षम बनाएगा। दूसरी बात, देश में आकाश के निर्माण से रोजगार तैयार होगा। यह मेक इन इंडिया के अनुरूप ही है। तीसरा, स्वदेशी खरीद का अर्थव्यवस्था पर कई तरह से प्रभाव पड़ेगा जबकि विदेशी खरीद से पैसा देश से बाहर जाता है। रक्षा उत्पादन से जुड़ी हर कंपनी, हर कर्मचारी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कर दे ही रहा है। चौथी बात, देश में रक्षा व्यवस्था का विकास करना एक बौद्धिक संपदा का निर्माण भी है। सरकार को इसे रियायत देनी चाहिए। दुनिया के तमाम देश ऐसा करते हैं। पांचवीं बात, भारतीय रक्षा कंपनियों की सीधे विदेशी उद्योगों से तुलना नहीं की जा सकती क्योंकि देश में कारोबार करने की लागत बहुत ज्यादा है। देसी रक्षा कंपनियों पर 33 फीसदी का निगमित कर भी लगता है। ऐसे में देशी उपकरणों की लागत तो ज्यादा होगी ही।
 
यही वजह है कि आम वित्तीय नियमन कहते हैं कि सरकारी खरीद में अगर 50 फीसदी मूल्यवर्धन वाला कोई भारतीय उपकरण विदेशी समकक्ष से 20 फीसदी महंगा है तो भारतीय कंपनी को न्यूनतम मूल्य पर बोली प्रदान की जानी चाहिए। अगर विदेशी कंपनी 100 रुपये की बोली लगाती है और भारतीय कंपनी 100-120 रुपये की तो भारतीय वेंडर को 100 रुपये में आपूर्ति करने की इजाजत दी जाए। रक्षा उपकरणों के मामले में भारतीय कंपनियों को 20 फीसदी तक ऊंची बोली लगाने का अवसर देना चाहिए। अधिक तादाद में आकाश सिस्टम का ऑर्डर देना भारतीय रक्षा उद्योग के लिए आवश्यक है। यह पहला मौका है जब एक पूर्ण स्वदेशी ढंग से निर्मित उत्पाद को तैनाती दी जा रही है। आकाश का अनुभव हमें बताएगा कि व्यापक उत्पादन, रखरखाव और कलपुर्जों आदि की व्यवस्था कैसे करनी है तथा इसे अगले स्तर पर कैसे ले जाना है। सरकार की स्वदेशीकरण को लेकर गंभीरता की दृष्टि से भी यह अहम है।
Keyword: defense, india, रक्षा उपकरण,
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