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निराशाजनक स्थिति

संपादकीय /  August 31, 2017

सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय के सांख्यिकी कार्यालय ने चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के आंकड़े गुरुवार को जारी कर दिए। आंकड़ों ने नकारात्मक रूप से चौंकाया। इस तिमाही के दौरान देश के जीडीपी की वृद्घि दर 5.7 फीसदी रही जबकि कई अनुमानों में सालाना आधार पर इसके 6.5 से 7 फीसदी के बीच रहने का अनुमान जताया जा रहा था। पिछली कई तिमाहियों से वृद्घि दर धीमी बनी हुई है और सरकार को सावधानीपूर्वक यह जांचने की आवश्यकता है कि गलती कहां हो रही है। यह बात ध्यान देने लायक है कि सालाना आधार पर होने वाली जीडीपी वृद्घि में वर्ष 2016-17 की चौथी तिमाही की तुलना में भी धीमापन आया है। इसकी एक वजह यह अनुमान भी रहा कि वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी के प्रभाव में कंपनियां अपना स्टॉक निपटाएंगी। देखा जाए तो कुछ कारकों की बदौलत इसमें इजाफा होना चाहिए था। अर्थव्यवस्था में दोबारा नकदी डालने की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और उपभोक्ता मांग में आई कमी पूरी होने की परिस्थितियां तैयार हो गईं। सरकार ने खुले हाथ से खर्च भी किया। इन दोनों बातों को मिला कर देखा जाए तो संकेत मिलता है कि आर्थिक हालात पहले लगाए गए अनुमान की तुलना में भी काफी खराब हैं। 

 
आंकड़ों पर करीबी निगाह डाली जाए तो आश्वस्त करने वाली तस्वीर नहीं नजर आती। स्वाभाविक सी बात है कि भविष्य में किसी न किसी मोड़ पर सुधार देखने को मिलेगा। मुख्य सांख्यिकीविद टी सी ए अनंत ने ऐसा संकेत भी दिया है। ऐसा इसलिए होगा क्योंकि त्योहारी मौसम के पहले जो माल तैयार किया जाता है उस पर भी इस साल दबाव होगा। परंतु अन्य पहलुओं पर गौर किया जाए तो यही संकेत मिलता है कि भविष्य में कोई सुधार स्थायी होता नजर नहीं आ रहा है। मिसाल के तौर पर सकल स्थायी पूंजी निर्माण कमजोर बना हुआ है। आंकड़ों में निवेश में सुधार का कोई परिदृश्य भी नजर नहीं आ रहा है। इसके अलावा सरकार ने पहले ही अपनी राजकोषीय गुंजाइश का काफी हिस्सा व्यय कर दिया है। सरकार के व्यय में सालाना आधार पर 12.6 फीसदी का सुधार हुआ। जबकि पिछले वर्ष यह दर 11.3 फीसदी थी। सरकारी व्यय में इजाफे की मदद से हमेशा आम आर्थिक वृद्घि को पीछे नहीं छोड़ा जा सकता है। अगर ऐसा हुआ तो इसका असर देश में राजकोषीय सुदृढ़ीकरण के प्रयासों पर पड़ेगा। 
 
विनिर्माण क्षेत्र पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। वर्ष 2017-18 की पहली तिमाही के लिए मूलभूत कीमतों पर सकल मूल्य वर्धन की बात करें तो विनिर्माण क्षेत्र में यह 1.2 फीसदी की दर से बढ़ा। साल दर साल आधार पर होने वाली यह वृद्घि पिछले साल की समान तिमाही में 10.7 फीसदी थी। वर्ष 2017-18 की पहली तिमाही में आईआईपी विनिर्माण महज 1.8 फीसदी की दर से बढ़ा जबकि वर्ष 2016-17 की पहली तिमाही में यह दर 6.7 फीसदी थी। 
 
यह स्पष्टï है कि अब सरकार को इस मंदी से युद्घस्तर पर निपटना होगा। निवेश, विनिर्माण और छोटे तथा मझोले उद्यमों पर खास ध्यान देने की आवश्यकता है। जीएसटी कुछ छोटे-मझोले उद्यमों की राह में अड़चन पैदा कर सकता है और इस क्षेत्र पर इसका नकारात्मक प्रभाव कम करने की आवश्यकता है। इस बीच निवेश क्षेत्र की दिक्कतों को दूर करने पर भी बहुत बारीकी से काम करना जरूरी है। जब तक निवेश के लिए बेहतर माहौल तैयार नहीं किया जाता है और बैंक ऋण की धीमी वृद्घि दर तथा कर्ज की समस्या से निपटा नहीं जाता है तब तक समग्र वृद्घि को गति प्रदान करना मुश्किल होगा। सरकार को चाहिए कि वह अपना आर्थिक प्रबंधन बेहतर करे। यह काम जितनी जल्दी हो उतना अच्छा होगा।
Keyword: GDP, CCI, india,,
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