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नई कार्ययोजना के साथ कैसे बढ़े नीति आयोग!

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  August 30, 2017

नैशनल इंस्टीट्यूट फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया या नीति आयोग को 1 सितंबर से नया उपाध्यक्ष मिल जाएगा। ऐसे में उचित होगा कि हम उस राह पर चर्चा करें जो आने वाले महीनों में आयोग के नए नेतृत्व को लेनी चाहिए। सबसे पहले हमें यह देखना होगा कि जनवरी 2015 में नीति आयोग के गठन के समय मोदी सरकार के दिमाग में कौन से लक्ष्य थे। हम जानते हैं कि मार्च 1950 से अगस्त 2014 तक देश के लिए काम करने वाले योजना आयोग को भंग करके नीति आयोग का गठन किया गया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सन 2014 में स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर कहा था कि योजना आयोग ने आर्थिक वृद्धि को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभाई है लेकिन अब वह प्रासंगिकता खो चुका है। उन्होंने कहा, 'मैं लाल किले के प्राचीर से कह रहा हूं कि यह व्यवस्था पुरानी हो चुकी है और हमें इसे नए सिरे से परिभाषित करना होगा.. कई बार पुराने घर के सुधार का खर्च अधिक होता है लेकिन इससे पूरी संतुष्टि नहीं मिलती। हमारे मन में भी यह भावना है कि अल्पावधि में नया घर बनाना ही बेहतर होगा। हम योजना आयोग की जगह एक नया संस्थान लाएंगे जिसका ढांचा अलग होगा, स्वरूप नया होगा, आत्मा नई होगी, विचार नया होगा, दिशा नई होगी, जो देश को रचनात्मक विचार पर आधारित नई दिशा दे, निजी-सार्वजनिक भागीदारी, संसाधनों का समुचित इस्तेमाल, युवा शक्ति का इस्तेमाल कर राज्यों की विकास आकांक्षाओं को पूरा करने में मदद करे और उनको तथा संघीय ढांचे को सशक्त बनाए।'

 
इसके बाद नीति आयोग के गठन के लिए हुई बैठक में भी इन तमाम लक्ष्यों को दोहराया गया और कहा गया कि नया संगठन सरकार के थिंकटैंक की तरह काम करे। यह भी कहा गया कि उसे केंद्र और राज्यों को जरूरी तकनीकी तथा अन्य सहायता उपलब्ध करानी चाहिए। इसमें अर्थव्यवस्था को लेकर नीतिगत, राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय महत्त्व के तथा नए नीतिगत विचार और मुद्दा आधारित सहयोग आदि शामिल हैं।
 
आयोग से अपेक्षा थी कि कोई बाहरी मॉडल भारतीय परिदृश्य पर न थोपा जाए यह सुनिश्चित करने का काम वह करेगा। हालांकि सकारात्मक प्रभाव शामिल किया जा सकता था। कैबिनेट के प्रस्ताव में कहा गया, 'हमें वृद्धि की अपनी अलग नीति तलाश करनी होगी। नए संस्थान को यह पता लगाना होगा कि देश के लिए कौन सी नीति सही होंगी। यह विकास का भारतीय दृष्टिकोण होगा।'
 
आयोग के कुछ लक्ष्यों में मोदी के स्वतंत्रता दिवस के भाषण और उसके बाद के कैबिनेट प्रस्ताव की बातें शामिल हैं। उसे देश के वृद्धि मॉडल की तलाश के बीच निजी-सार्वजनिक भागीदारी को बढ़ावा देना ही चाहिए। उसे देश के संघीय ढांचे को सशक्त बनाना चाहिए और राज्यों के बीच तालमेल के लिए काम करना चाहिए। यह भी कहा गया था कि आयोग को बारीकी से यह ध्यान देना चाहिए कि कौन सी बातें भारत में कारगर रहीं और कौन सी नहीं। कैबिनेट प्रस्ताव की सबसे अहम बात यह थी कि आयोग को सरकार के थिंकटैंक की तरह काम करना चाहिए।
 
वृद्धि को गति देने के लिए निजी-सार्वजनिक साझेदारी को बढ़ावा देना सराहनीय विचार है। साथ ही संघीय ढांचे को मजबूत बनाना और राज्यों की विकास संभावनाओं पर ध्यान देना भी। बहरहाल कहना आसान होता है करना मुश्किल। आयोग के कामकाज में निजी-सार्वजनिक भागीदारी मॉडल को शामिल करने के लिए निजी एजेंसियों के प्रति कहीं अधिक उदार रुख अपनाना होगा। 
 
अब तक इस दिशा में कुछ ठोस काम नहीं हुआ है और इस दिशा में नए उपाध्यक्ष की ओर से अधिक प्रयासों की आवश्यकता होगी। तभी निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ेगी और यह सरकारी थिंक टैंक के रूप में काम कर सकेगा। 
 
संघीय ढांचे को सशक्त बनाना और राज्यों को मशविरा देने का काम तो और बड़ी चुनौती है। योजना आयोग में पास फंड आवंटन की सुविधा थी जिसकी मदद से वह सुनिश्चित नीतियों की दिशा में काम करता था। बीते 32 महीनों में नीति आयोग ने राज्यों को नीतिगत मदद देनी चाही है लेकिन नतीजे और बेहतर हो सकते थे। 
 
तीन वर्षीय एजेंडा के दस्तावेज में कई नीतिगत बातें शामिल हैं। परंतु इनका क्रियान्वयन होगा अथवा नहीं, यह देखने वाली बात होगी। जरूरत इस बात की है कि कहीं अधिक प्रभावी और टिकाऊ व्यवस्था विकसित की जाए ताकि आयोग राज्यों के साथ संपर्क प्रगाढ़ कर सके। 
 
सबसे बड़ी चुनौती होगी प्रशासन और विकास का भारतीय मॉडल तय करना। आखिर यह मॉडल है क्या? यह अन्य मॉडलों से अलग कैसे है? नए उपाध्यक्ष को मशविरा यही होगा कि वे भारतीय विकास के जुमले के शिकार न हों। हालांकि उन्होंने इस बारे में जो कुछ अब तक कहा है वह परेशान करने वाला ही है। मॉडल की सफलता मायने रखती है उसका देसी या विदेशी होना नहीं। 
 
आयोग को खुद को सरकार के लिए एक प्रभावी और सक्रिय थिंकटैंक बनाने के लिए काफी मेहनत करनी होगी। यह सबसे कठिन काम होगा क्योंकि बतौर थिंकटैंक इसका प्रदर्शन मौजूदा ढांचे के साथ संघर्ष उत्पन्न करेगा। हालांकि कर्मचारियों की तादाद कम करने की दिशा में प्रयास हुआ है। तीन साल पहले जहां इसमें 1,200 कर्मचारी थे, वहीं आज आयोग में केवल 670 लोग कार्यरत हैं। अगर आयोग थिंक टैंक बनना चाहता है तो कर्मचारियों की संख्या में और कमी लानी होगी तथा कर्मचारियों का स्तर भी बेहतर होना जरूरी है। एक तरीका यह हो सकता है कि प्रतिनियुक्ति पर आने वाले कर्मचारियों को जरूरत न होने पर उनके मातृ संगठनों में वापस भेजा जाए। अच्छी खबर यह है कि कर्मचारियों की संख्या कम होने के बाद भी सरकार ने आयोग के आवंटन में कोई कमी नहीं की है। करीब 73 करोड़ रुपये के सालाना राजस्व व्यय के साथ नीति आयोग को बतौर सरकारी थिंक टैंक संसाधनों की कमी तो नहीं ही होनी चाहिए। 
Keyword: niti aayog, नीति आयोग,
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