बिजनेस स्टैंडर्ड - आवास ऋण लूट में आरबीआई का पक्ष
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आवास ऋण लूट में आरबीआई का पक्ष

देवाशिष बसु /  August 30, 2017

भारतीय रिजर्व बैंक ऋण को लेकर चिंतित है क्योंकि दरों में कटौती से आर्थिक गतिविधियों को बल नहीं मिला है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं देवाशिष बसु 

 
महज चंद रोज पहले सभी प्रमुख समाचार पत्रों  ने एक खबर प्रकाशित की थी। उसमें कहा गया था कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) एमसीएलआर (मार्जिनल कॉस्ट ऑफ फंड्स बेस्ड लेंडिंग रेट) से संतुष्ट नहीं है और उसने बैंकों से कहा है कि वे दर में और कटौती करें। कई लोग शायद इस बात से प्रभावित हो गए कि देश का केंद्रीय बैंक उपभोक्ताओं के हक में सोच तो रहा है। जिन लोगों ने ऋण ले रखा है उन्होंने सोचा होगा कि शायद उनकी मासिक किस्त छोटी हो जाएगी। बहरहाल जमीनी हकीकत काफी अलग है। ऐसी सुर्खियां तो अखबार में आती रहती हैं लेकिन क्या वाकई कोई बदलाव होता है? बैंक एक कारोबार है जिसमें वह खुद का नुकसान कभी नहीं चाहता। जैसा कि मैंने अपने पिछले आलेख में लिखा था, जब ब्याज दरें बढ़ती हैं तो बैंक तत्काल दरों में इजाफा कर देते हैं लेकिन जब ब्याज दरों में कमी आती है तो कर्ज लेने वालों को बैंक जाकर दरों में कमी कराने की जद्दोजहद करनी होती है। केवल जमा दरों में झटपट कमी की जाती है। आवास ऋण की दर कम करने के लिए हर बैंक मनमाने ढंग से शुल्क वसूल करता है। यह बात एकदम स्पष्ट है कि ऋण दर में कमी लाने के लिए किसी तरह का शुल्क एक तरह की वसूली ही है। परंतु आरबीआई ने इसकी आधिकारिक मंजूरी दे रखी है। वर्ष 2010 में जारी एक परिपत्र के मुताबिक बैंक उपभोक्ताओं से ऐसी वसूली नहीं कर सकते थे। अप्रैल 2016 में आरबीआई ने इस प्रावधान को समाप्त कर दिया। उसने हर बैंक को यह इजाजत दे दी कि वे अपनी मर्जी से निर्णय लें। क्या ऐसा इसलिए क्योंकि आरबीआई का पाला उपभोक्ताओं से नहीं बल्कि बैंकरों से ही पड़ता है?
 
क्या बैंक असंतुष्ट आरबीआई को उपकृत करने के लिए दरों में बदलाव लाएंगे? अब तक मैंने केवल आवास ऋण के नाम पर होने वाली लूट पर ही ध्यान केंद्रित किया है। छोटे कारोबारों की बात करें तो अगर उनको बैंक ऋण की आवश्यकता होती है तो उन्हें बीमा खरीदने पर मजबूर किया जाता है। इसके अलावा ब्याज पर उनसे जबरन अतिरिक्त वसूली की जाती है। आरबीआई का कहना है कि वह एक नए मानक पर विचार कर रहा है जो बाजार से जुड़ा होगा। इसकी मदद से यह सुनिश्चित किया जाएगा कि दरों में कमी प्रभावी तरीके से ग्राहकों तक पहुंचे। आरबीआई के नए डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने कहा है कि बेहतर पारेषण के लिए अप्रैल 2016 में शुरू की गई एमसीएलआर व्यवस्था पूरी तरह संतोषजनक नहीं रही है। उन्होंने कहा कि आरबीआई ने एक आंतरिक अध्ययन समूह का गठन किया है जो एमसीएलआर व्यवस्था के विभिन्न पहलुओं पर गौर करेगा और यह तय करेगा कि क्या बैंक की ऋण दर को जोडऩे का कदम सीधा प्रभाव उत्पन्न कर सकता है या नहीं? यह याद रखिए कि आरबीआई की चिंता केवल कारोबारी ऋण से जुड़ी है क्योंकि दरों में कमी के बाद भी आर्थिक गतिविधियों में अपेक्षित तेजी नहीं आई है। वह वास्तविक बैंकिंग लेनदेन और खुदरा ऋण को लेकर बहुत अधिक चिंतित नहीं है जबकि कड़ी मशक्कत करने वाली आम जनता का ज्यादातर पाला इसी तरह के ऋण से रहता है। आचार्य तथा उनके अध्ययन समूह के लोग अगर चाहते हैं कि आवास ऋण ग्राहकों के साथ भी उचित व्यवहार हो तो उनकी जानकारी के लिए कुछ तथ्य इस प्रकार हैं:
 
मार्च 2016 में एमसीएलआर पर आए आरबीआई के परिपत्र में कहा गया है कि इसके निर्देश वेबसाइट पर प्रकाशन की तारीख से प्रभावी होंगे। आरबीआई के इससे पहले के परिपत्रों में एमसीएलआर की नई व्यवस्था की अवधारणा प्रस्तुत की गई थी। यह काम अक्टूबर 2015 से ही किया जा रहा था ताकि बैंक इसका तत्काल क्रियान्यवन करने की तैयारी कर सकें। एक सेवानिवृत्त बैंकर श्रीनिवास मराठे ने आरबीआई की जटिल वेबसाइट की सैकड़ों घंटों तक पड़ताल की। उन्होंने सूचना के अधिकार का प्रयोग करके इस बात की सही तस्वीर हासिल करने की कोशिश की कि आखिर बैंक आवास ऋण लेने वाले ग्राहकों को किस तरह लूटते हैं। बैंकरों के साथ उनकी बातचीत से यह पता चला कि कई बैंकों ने जून 2016 तक दिशानिर्देशों का क्रियान्वयन नहीं किया। कुछ ने इसका क्रियान्वयन सितंबर 2016 में किया। बहरहाल, जब उन्होंने सात बैंकों में आरटीआई का आवेदन लगाकर यह पता लगाने की कोशिश की कि एमसीएलआर का क्रियान्वयन किस तारीख को किया गया तो उनको इस बारे में समुचित जानकारी नहीं मिल सकी। अगर किसी बैंक ने इस परिपत्र के क्रियान्वयन में छह माह का समय ले लिया तो क्या उन पर उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त शुल्क वसूलने का आपराधिक मामला नहीं बनता? अगर आरबीआई उनके खिलाफ कोई कार्रवाई करना नहीं चाहता है तो इसका क्या मतलब निकाला जाना चाहिए? ग्राहकों के प्रति और अधिक प्रतिकूल एक कदम में कुछ बैंकों ने एक प्रावधान और जोड़ दिया है। उनका कहना है कि वे आवास ऋण के मामलों में फ्लोटिंग यानी घट-बढ़ दरों में साल में केवल एक बार ही बदलाव करेंगे। आरबीआई इससे अनभिज्ञ दिखने का प्रयास कर रहा है। जिस समय दरों में लगातार इजाफा हो रहा था, उस वक्त ऐसा कोई प्रावधान इसमें नहीं जोड़ा गया था। 
 
मराठे ने पाया कि आरबीआई द्वारा ऋण लेने वालों की स्वीकृति हासिल करने का एक विशिष्टï प्रारूप बनाए जाने के बावजूद अधिकांश बैंकों ने उन्हें ब्याज दर में आए बदलाव के बारे में कोई जानकारी नहीं दी। कुछ लोगों ने व्यक्तिगत बातचीत में यह दावा कि उन्होंने ये दिशानिर्देश अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित किए हैं। मराठे ने कुछ बैंकरों के साथ बैठे और उन्होंने उनसे कहा कि वे बताएं कि बैंक वेबसाइट में कहां यह जानकारी प्रकाशित की गई है। बैंक अधिकारी खुद यह जानकारी अपनी वेबसाइट पर खोज पाने में नाकाम रहे। चूंकि बैंक आवास ऋण लेने वालों को लगातार बेवकूफ बनाते चले आ रहे हैं तो क्या यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि आरबीआई को या तो जमीनी हकीकत का कोई अंदाजा ही नहीं है या फिर वह बैंकों के हित में ही काम कर रहा है। आवास ऋण के मसले के कई अन्य पहलू भी हैं। अपने अगले आलेख में मैं इस बात पर विस्तार से चर्चा करूंगा कि कैसे बैंकों के पास एमसीएलआर को अपने पक्ष में तय करने की पर्याप्त गुंजाइश मौजूद थी। 
Keyword: bank, loan, debt, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई),
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