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हमेशा कारगर नहीं रहती कंपनी में पूर्ववर्ती चेहरों की वापसी

इंसानी पहलू
श्यामल मजूमदार /  August 29, 2017

हर कोई इन्फोसिस में नंदन नीलेकणी की दशक भर बाद हुई वापसी का जश्न मना रहा है। इस बात से कोई इनकार नहीं कि कंपनी के सह संस्थापक और पूर्व मुख्याधिकारी रहे नीलेकणी के पास वह नैतिक और बौद्घिक क्षमता है कि वह इन्फोसिस को प्रबंधन संबंधी मौजूदा दिक्कत से निजात दिला सकें। उनके शुभेच्छुओं का कहना है कि इन्फोसिस को अपने मौजूदा संकट से निकलने के लिए नीलेकणी की क्षमताओं की ही आवश्यकता है। 

 
नीलेकणी के गैरकार्यकारी चेयरमैन बनने को लेकर जो उत्साह दिखाया जा रहा है वह चार साल पुरानी याद ताजा करता है जब एन आर नारायण मूर्ति बोर्ड के आमंत्रण पर इन्फोसिस के कार्यकारी चेयरमैन बनकर वापस आए थे ताकि कंपनी को खोया हुआ गौरव दोबारा दिला सकें। तत्कालीन संकट का कारोबारी प्रशासन से कोई लेनादेना नहीं था बल्कि वह संकट वित्तीय प्रदर्शन से जुड़ा था। इससे पिछले दो सालों में कंपनी को राजस्व और मुनाफे के मोर्चे पर नुकसान का सामना करना पड़ा था और उसके वृद्घि अनुमान गलत साबित हुए थे। सालाना राजस्व के मामले में कंपनी कॉग्निजेंट से पीछे हो गई थी। 
 
कार्यभार संभालने के बाद मूर्ति ने कहा था, 'मुझे अचानक बुलाया गया था और यह काफी हद तक अस्वाभाविक था। लेकिन इन्फोसिस मेरे बच्चे के समान ही तो है। इसलिए मुझे अपनी सारी योजनाओं को छोड़कर इस जिम्मेदारी को संभालना पड़ा।' नीलेकणी ने यह सब तो नहीं कहा लेकिन वह बोले कि कारोबारी अवसरों का लाभ लेने के क्रम में वह इन्फोसिस में दोबारा आकर प्रसन्न हैं। मूर्ति ने एक पेशेवर सीईओ की नियुक्ति करके साल भर के भीतर इन्फोसिस छोड़ दिया था। हो सकता है नीलेकणी भी ऐसा ही करें। 
 
लेकिन क्या यह इन्फोसिस जैसी कंपनी के लिए सही तरीका है? इस बात पर बहस हो सकती है कि क्या चार साल के भीतर एक समय के दिग्गज नेता की वापसी करना सही कदम है? वह भी तब जबकि कंपनी खुद को भविष्य के लिए बेकरारी से तैयार कर रही है। यह साफ है कि कंपनी के संस्थापक और बोर्ड पेशेवर नेतृत्व की दिशा में निष्पक्ष बदलाव की ओर जाने में नाकाम रहे हैं। गौरतलब है कि इन्फोसिस एक ऐसी कंपनी है जहां अंशधारिता काफी बंटी हुई है और प्रवर्तकों की हिस्सेदारी नाम मात्र की है। चाहे जो भी हो सिक्का के तीन साल के कार्यकाल के अलावा कंपनी का हर संस्थापक उसका सीईओ रह चुका है। ऐसे में नीलेकणी को वापस लाने जैसे अल्पकालिक हल अपनाने की कोई आवश्यकता नहीं थी, भले ही वह अपने पिछले कार्यकाल में चाहे जितने सफल रहे हों। हालांकि उनको गैर कार्यकारी चेयरमैन की गद्दी दी गई है लेकिन इस बात में कोई संदेह नहीं है कि वह जब तक कंपनी में हैं वही सब काम संभालेंगे।
 
इन्फोसिस के संस्थापकों ने अगर 'बूमरैंग सीईओज' के रिकॉर्ड पर नजर डाली होती तो बेहतर होता। इन्हें वापसी करने वाले सीईओ के रूप में भी जाना जाता है। उनका प्रदर्शन मिलाजुला रहा। ऐपल में स्टीव जॉब्स की वापसी जरूर एक शानदार उदाहरण है। जॉब्स को सन 1985 में सत्ता संघर्ष में जॉन स्कली के हाथों पराजित होने के बाद कंपनी छोडऩी पड़ी थी। सन 1996 में उनको ऐपल में कंपनी में वापसी का न्योता दिया गया। वापस आने के बाद उन्होंने इस कंप्यूटर निर्माता कंपनी को तकनीकी क्षेत्र की अव्वल फर्म में बदल दिया।
 
परंतु ज्यादातर लोग ऐसी जादूगरी नहीं दिखा पाए। प्रॉक्टर ऐंड गैंबल के अपने पुराने सीईओ ए जी लाफली के साथ प्रयोग पर नजर डालिए। सन 2013 में उनसे कहा गया था कि वह अपनी सेवानिवृत्ति त्यागकर वापसी करें और कंपनी को उबारें। लाफली की वापसी को लेकर ब्लूमबर्ग ने जो सुर्खी दी उसका तात्पर्य यह था कि प्रॉक्टर ऐंड गैंबल भी स्टीव जॉब्स जैसा कारनामा दोहराना चाहती है। दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं हो सकता और लाफली को दो साल बाद कंपनी के खराब प्रदर्शन के बीच अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा।
 
कई अन्य उदाहरण भी हैं। याहू के जेरी यांग। सन 1995 में डेविड फिलो और मार्क पिनकस के साथ मिलकर उन्होंने इस सर्च इंजन की स्थापना की थी। सन 2015 में वह दोबारा इस कंपनी के सीईओ बनकर वापस आए लेकिन कुछ खास नहीं कर पाए। केनेथ ले सन 2001 में एनरॉन के सीईओ के रूप में वापस आए लेकिन कंपनी उनके हाथों में ही बरबाद हो गई। इनके पक्ष में दलील यही दी जाती है कि उनके बारे में पहले से मालूमात होती हैं और कर्मचारियों और निवेशकों दोनों को उन पर भरोसा रहता है। संकट के समय कई कंपनियों के पास नया सीईओ खोजने का वक्त नहीं होता। ऐसे में पुराने व्यक्ति को वापस लाना बेहतर होता है क्योंकि उसे कंपनी की जानकारी औरों से बेहतर होती है। इसके खिलाफ यह दलील है कि सही मायनों में प्रतिभाशाली लोग ऐसी कंपनियों से दूरी बनाए रखते हैं। इन्फोसिस के लिए ऐसा नुकसान ही सबसे बड़ा नुकसान होगा। नारायण मूर्ति और उनके सह संस्थापकों ने एक शानदार कंपनी बनाई थी। अगर वे अपने पेशेवर उत्तराधिकारियों को कंपनी को आगे ले जाने का अवसर देते तो शायद अधिक बेहतर होता। 
Keyword: infosys, आईटी सेवा प्रदाता इन्फोसिस,
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