बिजनेस स्टैंडर्ड - बिजली, विनिर्माण उपकरण व राजमार्ग क्षेत्र में जीएसटी
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बिजली, विनिर्माण उपकरण व राजमार्ग क्षेत्र में जीएसटी

विनायक चटर्जी /  August 28, 2017

व्यापक आर्थिक लक्ष्यों को देखते हुए इन तीनों क्षेत्रों में जीएसटी व्यवस्था को लेकर पुनर्विचार करना चाहिए। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं विनायक चटर्जी 

 
इस बात से कोई इनकार नहीं कि वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) व्यवस्था ने बुनियादी ढांचा क्षेत्र पर सकारात्मक प्रभाव डाला है। इसके चलते अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था में मौजूद तमाम करों से जुड़ी जटिलताएं स्वत: समाप्त हो गई हैं। इसमें सीमा शुल्क, उत्पाद शुल्क, मूल्यवर्धित कर, केंद्रीय बिक्री कर, प्रवेश कर, उपकर आदि शामिल हैं। पहले जहां धन जुटाने में तमाम तरह की बाधाएं थीं, वहीं अब यह काम बेहद आसानी से बड़े पैमाने पर हो रहा है। हर तरह की आपूर्ति शृंखला के लिए इंटरनेट आधारित एक समान इंटरफेस ने परिवहन और लॉजिस्टिक्स को प्रोत्साहन दिया है। यह निश्चित रूप से एक बड़ा बदलाव है जो बुनियादी क्षेत्र में आया है। 
 
जब जीएसटी की ये तमाम प्रक्रियाएं सुव्यवस्थित हो जाएंगी तो बुनियादी ढांचे के हर क्षेत्र पर विशिष्टï असर होगा। इससे इस क्षेत्र के रोजमर्रा के कारोबार प्रभावित होंगे। फिर चाहे वह तेल एवं गैस क्षेत्र हो, इंजीनियरिंग खरीद का क्षेत्र हो, विनिर्माण अनुबंध हों, बिजली क्षेत्र हो, नवीकरणीय क्षेत्र हो, बंदरगाह हों या विमान तल हों, सभी से तमाम प्रतिनिधित्व वित्त मंत्रालय और जीएसटी परिषद के समक्ष पहुंचे होंगे ताकि इन क्षेत्रों को निम्र कर दायरे में शामिल किया जाए। ऐसे तमाम निर्णय लेने के पहले आर्थिक लक्ष्यों पर गंभीरतापूर्वक विचार किया जाएगा। 
 
आर्थिक लक्ष्य एकदम स्पष्ट हैं, वृद्घि और निवेश में तेजी लाना और नए रोजगार तैयार करना। इन लक्ष्यों को हासिल करने में बुनियादी ढांचा एक अहम क्षेत्र है। इसके अधीन तीन अन्य ऐसे क्षेत्र हैं जिनसे तत्काल नतीजे सामने आएंगे। ये हैं बिजली, विनिर्माण उपकरण और राजमार्ग। बिजली: इस क्षेत्र को लेकर तमाम अस्पष्टïता और असहजता है क्योंकि बिजली को जीएसटी के दायरे से बाहर रखा गया है। बिजली पर पहले भी अप्रत्यक्ष कर के अधीन कर नहीं लगता था क्योंकि इस पर हमेशा से विद्युत शुल्क लगता आया है। बहरहाल, मौजूदा संदर्भ एकदम अलग है। फिलहाल किसी भी तरह के उपभोक्ताओं को बिजली बेचने के लिए एक विशाल आपूर्तिकर्ता समूह मौजूद है। मौजूदा हालात में वे इनपुट क्रेडिट से वंचित हैं। 
 
बिजली को केंद्रीय उत्पाद शुल्क की परिभाषा के तहत रखा गया है, जहां कर की दर शून्य थी। इसी तरह वैट कानून के तहत इसे वस्तुओं की श्रेणी में रखा गया था लेकिन इस पर कोई वैट नहीं लगा। बिजली पर शुल्क वसूलने का अधिकार राज्य सरकारों के पास है। यह अधिकार उनको राज्य सूची की सातवीं अनुसूची में 53वीं प्रविष्टिï के अधीन मिला है। यह जीएसटी से बेअसर है। यह अब भी जस के तस है। 
 
जीएसटी के अधीन बिजली वस्तु है या सेवा? वस्तुओं की परिभाषा में चल संपत्ति आती है जबकि सेवा की परिभाषा में वस्तुओं के अलावा चीजें शामिल हैं। यहां बिजली को लेकर प्रश्न खड़ा होता है। पहले तो बिजली के लिए विशेष प्रावधान था लेकिन जीएसटी में इसका कहीं अलग से उल्लेख नहीं किया गया है। आदर्श स्थिति यही होती कि विद्युत शुल्क को जीएसटी में समाहित कर दिया जाता और इसे केवल एक जीएसटी का विषय बनाया जाता। बहरहाल इसके लिए सभी राज्यों को मनाने की जरूरत पड़ती क्योंकि विद्युत शुल्क उनके राजस्व का अहम स्रोत है। एक विकल्प यह है कि इसे शून्य दर वाली सूची में शामिल कर दिया जाए। अब तक यह सूची निर्यात तक सीमित है जहां बिना इस्तेमाल के इनपुट क्रेडिट की व्यवस्था रीफंड के लिए की जाती है। दूसरा विकल्प है बिजली के उत्पादन, पारेषण और वितरण पर 5 फीसदी जीएसटी लगाना। उत्पादन पर शुल्क लगाने से बिजली कंपनियों का उपकरणों, पूंजीगत वस्तुओं, परिचालन व्यय और अन्य कारोबारी खर्चों पर इनपुट क्रेडिट लेने का दावा बनेगा। इससे बिजली की लागत कम होगी। उच्च इनपुट कर क्रेडिट के चलते घटी लागत का फायदा उपभोक्ताओं तक पहुंचेगा क्योंकि मुनाफाखोरीरोधी कानून अस्तित्व में हैं। 
 
बड़े विनिर्माण उपकरण : पूर्ववर्ती अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था में बड़े, विनिर्माण में काम आने वाले उपकरणों पर 12.5 फीसदी का उत्पाद शुल्क लगता था और इसे सेनवैट का लाभ मिलता था। इसके अतिरिक्त 5-6 फीसदी वैट भी लगता था। व्यापक तौर पर विनिर्माण उपकरणों पर देश के अलग-अलग हिस्सों में 18 फीसदी तक कर लगता था। ऐसे में 28 फीसदी जीएसटी लगाने की बात को इस क्षेत्र के लिए बड़ा झटका माना गया। इनपुट क्रेडिट में इजाफे के बावजूद कीमतों में 8-10 फीसदी इजाफे का अनुमान लगाया गया। इसे कई मायनों में बुनियादी ढांचा क्षेत्र के लिए नुकसानदेह माना जा रहा है क्योंकि यह क्षेत्र विनिर्माण आधारित है।
 
देश में बनने वाले उपकरणों के लिए जीएसटी की उच्च दर को भी आयातित उपकरणों को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने वाला कदम माना जा रहा है। वैश्विक विनिर्माण उपकरण उद्योग मुसीबत से दोचार है और घरेलू उपकरणों की कीमतों में इजाफा देश को आयात पर और अधिक निर्भर बनाएगा। इतना ही नहीं अधिकांश पूंजीगत वस्तुएं अब 18 फीसदी के जीएसटी दायरे में हैं। परंतु बड़े बुनियादी उपकरण को वाहन क्षेत्र के साथ 28 फीसदी के दायरे में रखा गया है जबकि वह पूंजीगत वस्तुओं में ही आता है। इसे 18 फीसदी के दायरे में रखने की अनुशंसा की गई है।
 
सड़क एवं राजमार्ग निर्माण: जीएसटी से पहले वाली व्यवस्था में सड़क निर्माण से जुड़ी सेवाएं सेवा कर से बाहर थीं। यह रियायत समाप्त कर दी गई है और ऐसी सेवाओं पर 18 फीसदी जीएसटी लगाया गया है। यह बात बड़े और छोटे रखरखाव अनुबंधों पर भी लागू होगी। टोल संग्रहण, रियायतग्राहियों आदि को छूट होगी लेकिन वे आपूर्तिकर्ता द्वारा वसूले गए कर क्रेडिट का दावा नहीं कर सकेंगे। 
 
गत 5 अगस्त को बैठक में जीएसटी परिषद ने उन सुझावों पर गौर किया जिनमें बुनियादी क्षेत्र पर कर दर को घटाकर 12 फीसदी करने की मांग की गई थी। परंतु घटी कर दर का लाभ केवल तभी दिया जा रहा है जब सेवाएं सरकार को दी गई हों। ऐसे में समान परियोजनाओं के लिए सरकारी और निजी कंपनियों के बीच विसंगति पैदा हो रही है। सुझाव यह है कि राजमार्ग निर्माण, परिचालन और रखरखाव से जुड़ी सभी गतिविधियों को एकजुट कर 5 फीसदी के कर दायरे में डाल दिया जाए। सरकारी और निजी परियोजनाओं का भेद खत्म करने की भी बात है। आशा तो यही है कि इन सुझावों का असर कर-राजस्व को प्रभावित करने के बजाय वृद्धि और निवेश को जरूरी गति प्रदान करेगा।
Keyword: GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी, power, electric,,
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