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सरकारी बैंकों का विलय कम नहीं झंझटकारी

हंसिनी कार्तिक /  August 27, 2017

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (पीएसबी) के शेयरों में इस साल ठीक तेजी आई है। कभी दिवालिया प्रक्रिया तो कभी विलय की खबरों को लेकर ये बैंक लगातार सुर्खियों में बने हुए हैं। पिछले हफ्ते भी विलय के रोडमैप के बाद इन शेयरों में मजबूती देखी गई। तेजी की वजह इन बैंकों के विलय के लिए वैकल्पिक व्यवस्था को सरकार से मंजूरी मिलना है। हालांकि विलय की राह इतनी आसान भी नहीं है।

 
गैर-निष्पादित आस्तियों (एनपीए) यानी फंसे हुए कर्जों की बढ़ती समस्या से बैंकिंग उद्योग पहले से ही परेशान है। इसका खासकर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और कुछ निजी बैंकों पर नकारात्मक असर पड़़ रहा है। जून 2017 में समाप्त तिमाही में पीएसबी का सकल एनपीए तिमाही आधार पर 18 फीसदी और सालाना आधार पर 32 फीसदी बढ़कर 7.39 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया। इस समय सिर्फ चार बैंक एनपीए का स्तर 10 फीसदी से नीचे बनाए रखने में कामयाब रहे हैं। दूसरी तरफ कम से कम 5-6 बैंकों का एनपीए 15 से 24 फीसदी के बीच है।
 
देश के सबसे बड़े बैंक भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के एनपीए में भी वृद्घि हुई है। एसबीआई का सकल एनपीए अनुपात मार्च 2017 की तिमाही के 9.11 फीसदी से बढ़कर जून तिमाही में 9.97 फीसदी हो गया। इस अवधि में बैंक का शुद्घ एनपीए अनुपात 5.19 फीसदी से बढ़कर 5.97 फीसदी हो गया। किसी विलय पर विचार करते वक्त परिसंपत्तियों की गुणवत्ता की चिंताओं के अलावा मानव संसाधन, प्रौद्योगिकी या प्रक्रियाओं के एकीकरण जैसी अन्य बातों पर भी ध्यान दिए जाने की जरूरत होती है। 
 
इसी तरह जब विलय होंगे तो बैंकों का मूल्यांकन बढ़े हुए एनपीए के कारण बाधा बन सकता है। अगर एनपीए के लिए पूरा प्रावधान किया गया तो सरकारी बैंकों के नेटवर्थ में भी कमी आएगी। केयर रेटिंग्स की हाल की एक रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2017 तक शुद्घ एनपीए सरकारी बैंकों के नेटवर्थ के प्रतिशत के तौर पर पहले ही 77.5 फीसदी पर पहुंच चुका है। सवाल यह है कि बैंक के अधिग्रहण के इच्छुक शेयरधारक क्या विलय वाले बैंक की मौजूदा शेयर कीमत या उसकी परिसंपत्तियों की वास्तविक कीमत चुकाने को इच्छुक हैं। हालांकि कुछ विश्लेषकों ने फंसे कर्ज के लगातार संकट के बावजूद सरकार की पहल का स्वागत किया है।
 
आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज के शोध प्रमुख पंकज पांडे ने इसे समय की मांग बताते हुए कहा कि यह कदम कम संख्या में बड़े बैंक गठित करने के मकसद से उठाया गया है। इससे ये बैंक कम लागत पर रकम जुटाने में सक्षम होंगे और इस रकम का लाभकारी ढंग से इसत्माल कर सकेंगे। उन्होंने कहा, 'इसलिए निवेशकों को विलय की घोषणा के समय को लेकर सवाल नहीं उठाना चाहिए। बैंकों के फंसे कर्ज के बारे में बाजार को कमोबेश जानकारी है और इसका असर शेयरों में दिख भी चुका है।' एकमात्र चिंता मूल्यांकन को लेकर है। इसलिए जब तक स्थिति पूरी तरह से स्पष्टï नहीं हो जाती, ऐसे घटनाक्रमों पर बाजार का सकारात्मक बने रहना मुश्किल होगा।
 
ज्यादा ब्योरा दिए बगैर वित्त मंत्री ने कहा कि विलय का आधार वाणिज्यिक ही होगा। संबंधित बैंकों के बोर्डों को विलय के आइडिया को आगे बढ़ाना होगा। फिलहाल विश्लेषक मान रहे हैं कि विलय के मानकों में पूंजी पर्याप्तता और बैलेंस शीट में बढ़ोतरी जैसे आधार शामिल हो सकते हैं। इसके अलावा यह भी हो सकता है कि कोई बैंक क्षेत्रीय आधार पर कितना मजबूत है। उनका मानना है कि पंजाब नैशनल बैंक, यूनियन बैंक, केनरा बैंक और इंडियन बैंक विलय प्रक्रिया की दौड़ में सबसे आगे हो सकते हैं। इन बैंकों का सकल एनपीए अनुपात जून तिमाही के अंत में 7.2 से 13.7 फीसदी के दायरे में रहा। अपने संबद्घ क्षेत्रों - उत्तर, पश्चिम और दक्षिण भारत पर बैंकों की पकड़ से विलय की राह में मदद मिलेगी। इन बैंकों ने पिछले 6 से 12 महीनों के दौरान विलय के प्रति खुलापान दर्शाया है। साथ ही बाजार में टियर-1 बॉन्ड या राइट इश्यू के जरिये पूंजी जुटाने की अपनी क्षमता साबित की है। बैंक ऑफ बड़ौदा भी एक मजबूत उम्मीदवार है। हालांकि इस बैंक के प्रबंधन ने इस साल के शुरू में ही विलय प्रक्रिया का अगुआ बनने के अपने संदेह जताए थे।
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