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बाबाओं की दुनिया और भ्रमित जनता

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  August 27, 2017

 

देश के किस हिस्से में प्रति वर्ग किलोमीटर सबसे ज्यादा बाबा मौजूद हैं? अगर ताजा उदाहरण इतना स्पष्टï न होता तो यह सवाल ज्यादा पेचीदा नजर आता। इन दिनों तो कोई भी पंजाब और हरियाणा का नाम ले लेगा। यह इलाका कई अन्य चीजों के लिए जाना जाता रहा लेकिन धर्म, अध्यात्म और स्वयंभू बाबाओं के लिए इसकी चर्चा पहले इस कदर नहीं होती थी। सारे लोग ऐसे ठगबुद्धि के नहीं होते। कई तो अपने ही अलग आध्यात्मिक दर्शन के साथ सामने आए। वे कानून का पालन करते रहे और उन्होंने जन सेवा तथा परोपकार का काम भी किया। बाकी बाबाओं में ज्यादातर जमीन हथियाने की फिराक में रहने वाले, राजनीतिक दलाल, सत्ता के लिए काम करने वाले तथा छद्म कारोबारी निकले। ये बाबा काफी कुछ शोले फिल्म के खलनायक गब्बर सिंह की तरह नजर आते रहे जिसकी अपनी ताकतवर अदालत थी।
 
हमें ऐसे लोगों के लिए शोले का उदाहरण सामने रखते समय सावधानी बरतनी होगी जिनके लाखों-करोड़ों अनुयायी हैं। पिछले दिनों देश के इस इलाके को एक दोषसिद्ध बलात्कारी बाबा के अनुयायियों ने बंधक सा बना लिया। इस स्वयंभू बाबा पर अभी बलात्कार का एक और मामला तथा एक निर्भीक स्थानीय पत्रकार की हत्या का मामला चलना शेष है। बाबा को जिस मामले में सजा हुई है, उसे उजागर करने वाला वही पत्रकार था। बाबा ने मुक्ति दिलाने के नाम पर अपने 400 अनुयायियों के अंडकोष निकलवाकर उन्हें बधिया करा दिया। खबरों के मुताबिक इन अंडकोषों को फ्रिज में रखा गया।
 
इन दिनों बाबा गुरमीत राम रहीम सिंह इंसा का नाम सुर्खियों में है। संभवत: वह सबसे ज्यादा अनुयायियों वाले बाबा हैं। सिरसा में बाबा के उच्च सुरक्षा वाले 'डेरे' (जो एक छोटा मोटा शहर ही है) के अलावा पड़ोस के हिसार जिले में बाबा रामपाल का ठिकाना था। रामपाल भी जेल में है और उस पर इतने गंभीर आरोप हैं कि उसकी बाकी जिंदगी जेल में कटनी तय है। आपको याद होगा कि अभी नवंबर 2014 में हरियाणा पुलिस को उसके अनुयायियों से कड़ा संघर्ष करना पड़ा था। कई मौतों के बाद ही वह पुलिस के हाथ लगा था। हरियाणा के तत्कालीन पुलिस महानिदेशक एस एन वशिष्ठ ने कहा था कि उनकी पुलिस को रामपाल के कमांडो की सेना से भिड़ंत लेनी पड़ी।
 
इन सभी डेरों और पंथों में व्यक्ति विशेष का प्रभाव रहता है। हिसार और सिरसा के आसपास के करीब आठ जिलों में इन दोनों बाबाओं के लाखों भक्त हैं। इनका आध्यात्मिक आभामंडल फीका भी पड़ता है तो अन्य बाबाओं के आगमन से ही। सारे बाबा इतनी समस्याएं पैदा नहीं करते लेकिन उनमें रंगीनियत तो होती है। पंजाब में राधास्वामी और निरंकारी पंथ काफी समय से मौजूद हैं। उत्तर भारत के तमाम इलाके में इनका विस्तार है। राधास्वामी पंथ कभी विवादित नहीं रहा। इसके मौजूदा मुखिया या बाबाजी कैंसर से जूझ रहे हैं। ध्यान रखें कि पंजाब में किसी भी आध्यात्मिक व्यक्ति को गुरु के बजाय बाबाजी ही कहा जाता है क्योंकि सिखों के दसवें गुरु गोविंद सिंह ने खुद को आखिरी गुरु घोषित किया था। उन्होंने कहा था कि आगे पवित्र गुरु ग्रंथ साहब को ही गुरु का दर्जा रहेगा। राधास्वामी संप्रदाय का मुख्यालय जालंधर और अमृतसर के बीच जीटी रोड पर व्यास नदी के करीब है। वहां अब कोई वंशज वारिस नहीं होता बल्कि इसके लिए एक सुविचारित योजना के साथ काम किया जाता है। राधास्वामी संप्रदाय के नए मुखिया का नाम भाई शिविंदर मोहन सिंह है। हममें से ज्यादातर लोग उनको रैनबैक्सी/रेलिगेयर/फोर्टिस जैसी अव्वल कंपनियों से जुड़े भाइयों में से एक के तौर पर जानते हैं। दूसरे भाई मालविंदर मोहन सिंह हैं। सत्ता के गलियारों में दोनों को एमएमएस और एसएमएस के नाम से भी जाना जाता था।
 
निरंकारियों का इतिहास कहीं अधिक घटनाप्रधान रहा है। लंबे समय तक उनके प्रमुख रहे बाबा गुरबचन सिंह की जरनैल सिंह भिंडरांवाले के लोगों ने यह कहकर हत्या कर दी थी कि वह खुद को 'गुरु' बताते हैं। सच तो यह है कि भिंडरांवाले का उदय ही उस समय हुआ जब सन 1978 में बैसाखी के दिन उसके अनुयायी निरंकारियों के धार्मिक जमावड़े के समक्ष प्रदर्शन करने पहुंचे। बाबा के समर्थकों ने उन पर गोलीबारी कर दी जिसमें 16 लोगों की मौत हो गई। उस वक्त स्वर्ण मंदिर स्थित अकाल तखत ने एक हुक्मनामा जारी किया कि निरंकारियों के साथ किसी तरह का सामाजिक संपर्क न रखा जाए। साधारण शब्दों में कहा जाए तो उनके साथ रोटी-बेटी का संबंध खत्म करने को कहा गया।
 
इसके बाद बात आती है नामधारियों की। सफेद पगडिय़ों वाले ये सिख सबसे अधिक मित्रवत और विनम्र होते हैं। उनके पिछले प्रमुख जगजीत सिंह का कोई बेटा नहीं था और उन्होंने अपने दो भतीजों में से एक  उदय सिंह को वारिस चुना। उदय सिंह ने अपनी मां 'बाबा' चांद कौर की मदद से पंथ का नेतृत्व संभाला। लुधियाना में 4 अप्रैल 2016 को मोटरसाइकिल सवार बंदूकधारियों ने चांद कौर की हत्या कर दी। दोनों भतीजों ने एक दूसरे पर इसका आरोप लगाया। 
 
पंजाब के रूपनगर जिले के नूरपूर बेदी में भनियारा बाबा का पंथ भी एक छोटा लेकिन सुगठित पंथ है। उनके अनुयायियों में पूर्व गृहमंत्री और कांग्रेस नेता बूटा सिंह शामिल रहे हैं। उनका मानना था कि उनकी पत्नी की बीमारी बाबा के चमत्कार से ठीक हुई। परंतु 2001 में जब उन्होंने अपने चमत्कारों से सजी किताब प्रकाशित कराई तो उन्हें गुरुद्रोही माना गया। हरियाणा में एक अदालती पेशी के वक्त बब्बर खालसा के एक सदस्य ने उन्हें चाकू मार दिया। इनके अलावा भला फ्रीजर बाबा को कौन भूल सकता है? आशुतोष का संबंध बिहार से था। पंजाब में उन्होंने अपने लाखों अनुयायी बनाए। जनवरी 2014 में उनका निधन हो गया लेकिन अनुयायियों का मानना है कि वह समाधि में हैं और वापस आएंगे। उनके शव को फ्रिज में रख दिया गया और अंतिम संस्कार तक से इनकार कर दिया गया। तीन साल से उच्च न्यायालय यह मसला सुलझाने में लगा है। एकल पीठ ने अंतिम संस्कार का आदेश दिया लेकिन खंडपीठ ने उसे पलट दिया। इस बीच श्रद्धालु आशू बाबा आएंगे ... के गीत गा रहे हैं। 
 
समाज विज्ञानियों को इस प्रश्न का उत्तर तलाश करना चाहिए कि यह क्षेत्र बाबाओं के लिए इतना अनुकूल क्यों है? मैंने इस बारे में कई बातें सुनी हैं लेकिन एक बात जो मुझे सही लगती है वह यह है कि सिख धर्म दुनिया का सबसे नया बड़ा धर्म (500 वर्ष से कुछ ज्यादा) है और अभी इसका विकास हो रहा है। यह एक किताबिया धर्म भी है। बाबा तीन काम करते हैं। पहला, वे इसके आचरण को सरल बनाते हैं, यानी जीवन में कोई खास प्रतिबंध नहीं थोपते। दूसरा, चूंकि सिख और हिंदू धर्मों पर एक-दूसरे का व्यवहार प्रभाव है, इसलिए इनका बाजार भी बड़ा होता है। तीसरी बात, पवित्र पुस्तक में भले ही तमाम बुद्धिमानी की बातें कही गई हों लेकिन निराशा के क्षणों में आपको किसी मनुष्य की आवश्यकता होती है। 
 
ऐसा व्यक्ति अगर ईश्वर जैसी प्रतिष्ठा रखता हो तो बात ही क्या? राम रहीम की फिल्मों, गीतों, मोटरसाइकिलों और तमाम तड़क-भड़क से हम परिचित हैं। वह सभी बाबाओं से अधिक लोकप्रिय हुए। यही वजह है निरंकारियों के खिलाफ हुक्मनामे के 35 साल बाद अकाल तख्त ने एक और हुक्मनामा जारी किया। इस बार कहा गया कि राम-रहीम के अनुयायियों से रोटी-बेटी का कोई संबंध न रखा जाए। वोट के लालच में घिरी अकाली-भाजपा सरकार ने दबाव बनाया कि बाबा की वीडियो के जरिये मांगी गई माफी को स्वीकार किया जाए और माफी दी जाए। सिखों ने इसका विरोध किया और वह माफी वापस लेनी पड़ी। हालांकि आम धारणा यही है उनने हालिया चुनाव में अकाली-भाजपा गठबंधन की मदद इसलिए की ताकि उनको सीबीआई मामलों में राहत मिल सके। अब उनमें से एक मामले में उसे सजा हो चुकी है। 
 
बाबाओं का यह वोट बैंक और राजनेताओं का लालच पंजाब और हरियाणा के लिए अभिशाप बन चुका है। पहले कांग्रेस यह काम करती रही है। अब भाजपा ने भी सीख ले ली है। अकालियों ने भी इन डेरों को भरपूर संरक्षण दिया है। एक बहादुर पत्रकार ने बलात्कार के मामले उद्घाटित किए और उसे अपनी जान गंवानी पड़ी। सिरसा में पूरा सच नामक अखबार निकालने वाले रामचंद्र छत्रपति ऐसे ही बहादुर व्यक्ति थे। बाबाओं को लगने लगा कि वे कानून से ऊपर हैं। परंतु सीबीआई के बहादुर न्यायाधीश जगदीप सिंह जैसे लोग जब सामने हों तो कहानी का अंत बदल भी जाता है। 
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