Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Thursday, September 21, 2017 07:04 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|
 
होम विशेष खबर

सच से दो-चार

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  August 25, 2017

दो वर्ष से भी ज्यादा पहले भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने बैंकों की बैलेंस शीट में फर्जीवाड़े के खिलाफ जंग छेडऩे की घोषणा की थी। तब से अब तक बैकों ने फंसे हुए कर्ज (एनपीए) की जिस पैमाने पर घोषणा की है वह अकल्पनीय है। सरकारी बैंकों (स्टेट बैंक को छोड़कर) की हालत खस्ता है। अभी तस्वीर और बुरी होनी तय है। इन बैंकों का सारा एनपीए मिला दिया जाए तो वह 7 लाख करोड़ रुपये से ऊपर है। परंतु बैंकों ने अपने बही खातों में अलग-अलग आंकड़े पेश किए हैं। यह बात ध्यान रखनी होगी कि स्टेट बैंक के अलावा सरकारी बैंकों का कुल मूल्य बमुश्किल 3.8 लाख करोड़ रुपये है। कुछ सरकारी बैंक बहुत जल्दी दिवालिया होने के कगार पर हैं।
इन खुलासों के अलावा सरकार और आरबीआई ने पिछले ढाई-तीन सालों में ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जिससे बैंकों की कामकाजी क्षमता में सुधार हो। निष्प्रभावी बैंक बोर्ड ब्यूरो का गठन, निजी बैंकों के प्रबंधकों की नियुक्ति, बैंकों को फंसी हुई परिसंपत्ति का पुनर्गठन करने को कहने, इन्हें पूंजी मुहैया कराने जैसे तमाम कदमों का कोई खास असर नहीं हुआ है। सरकारी बैंकों ने इस साल कर्ज भी कम बांटा है।
यह लड़ाई अब एक नए चरण में प्रवेश कर चुकी है। रिजर्व बैंक और सरकार बैंकों पर दबाव बना रहे हैं कि वे दिवालिया संहिता के तहत कदम उठाएं जबकि बैंक इसके इच्छुक नहीं नजर आ रहे। बैंक प्रबंधनों के पास अब किसी तरह की गुंजाइश ही नहीं छोड़ी गई है। उदाहरण के लिए शेयर बाजार नियामक ने कहा है कि अगर कोई कंपनी बैंक ऋण के ब्याज में एक दिन की भी देरी करती है तो उसके तमाम बैंक ऋण पर देनदारी चूक का मामला स्वत: आरंभ हो जाएगा। अगर ऐसा हुआ तो क्रेडिट रेटिंग में गिरावट आएगी और बैंकों की पूंजी पर्याप्तता पर असर पड़ेगा। इससे कमजोर बैंकों की कर्ज देने की क्षमता प्रभावित होगी। इस बीच कंपनियों का मालिकाना भी बदलेगा। टाटा स्टील और पोस्को कर्जग्रस्त एस्सार स्टील की बोली लगाने की इच्छुक हैं। तमाम बैंकों और कारोबारियों को अनुशासित करने के बाद ही एक स्वस्थ ऋण संस्कृति मिल सकती है।
यह उपाय तो ठीक नजर आता है लेकिन बैंकों की हालत इतनी खस्ता है कि उन पर इतनी सख्ती नहीं बरती जा सकती। सिनर्जी-डोरे ऑटोमेटिव का उदाहरण लेते हैं जो नए दिवालिया कानून के तहत हल किया जाने वाला पहला मामला है। करीब 900 करोड़ रुपये से अधिक की बकाया राशि में से 54 करोड़ का भुगतान होगा। इसकी आधी राशि अभी दी जाएगी और शेष राशि कई वर्ष के बाद। यानी 94 फीसदी की राशि बट्टïे खाते में डाल दी गई और लगभग कर्जमुक्त हो चुकी कंपनी नीलामी के लिए तैयार। अगर दिवालिया कानून इस तरह काम करने जा रहा है तो भविष्य की तस्वीर कोई ठीक नहीं।
यह स्पष्टï हो चुका है कि सरकारी बैंक केवल तभी पूरी तरह सुचारु कामकाज कर सकेंगे जब उन्हें नई पूंजी मिलेगी। परंतु सरकार के पास बैंकों को पर्याप्त नई पूंजी देने की गुंजाइश ही नहीं है। बैंक पूंजी बाजार भी जा सकते हैं लेकिन उनके शेयर मूल्य इतने कम हैं कि वहां भी बहुत अधिक संभावनाएं नहीं हैं। साफ कहें तो शेयर बाजार से भी वे अपेक्षित पूंजी नहीं जुटा पाएंगे। सरकार बैंकों का निजीकरण करते हुए उन्हें बेच भी सकती है लेकिन फिलहाल देश में ऐसे लोग कम ही हैं जिन पर भरोसा किया जा सके कि वे बैंक चलाएंगे। बैंकों को विदेशियों को भी बेचा जा सकता है लेकिन यह राजनीतिक दृष्टिï से सही नहीं होगा। विलय की चर्चा चलती रहती है। परंतु कुछ संबद्घ बैंकों के विलय के बाद स्टेट बैंक की जो हालत है, वह अपने आप में एक चेतावनी है।
यानी ऐसा कोई उपाय नहीं है जो एक झटके में हालात सुधार दे। धीमे सुधार का मतलब यह होगा कि अर्थव्यवस्था की दिक्कतें लंबे समय तक कायम रहेंगी। व्यवस्था सरकारी बैंकों को दरकिनार कर काम करने का कोई न कोई तरीका तलाश ही लेगी। निजी बैंक विकल्प हो सकते हैं। परंतु फिलहाल बैंक देश के वित्तीय तंत्र के मूल में हैं और कुल वित्तीय तंत्र में सरकारी बैंकों की हिस्सेदारी करीब 70 फीसदी है। लब्बोलुआब यह कि बैंकिंग संकट से एयर इंडिया की तरह आसानी से नहीं निपटा जा सकता है। हम सरकारी स्वामित्व और तेजी के दिनों में की गई गड़बडिय़ों की कीमत चुका रहे हैं। उन दिनों में ऐसी परियोजनाओं को भी बैंक ऋण मिल गया जिन्हें अन्यथा कोई नहीं पूछता। वही ऋण अब बैंकों पर भारी पड़ रहे हैं और उसका असर हम सभी पर होगा।

Keyword: RBI, Reserve bank of india, banks, NPA,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
Advertisements 
Cover from Natural Calamities. Buy Home Insurance
Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
  आपका मत
 क्या सरकार के कदम से अर्थव्यवस्था को मिलेगी रफ्तार?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS General News   Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.