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उत्तर और दक्षिण में हिंदू-मुस्लिम रिश्तों की एकदम अलग तासीर

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  August 23, 2017

सन 1947 में भारत ब्रिटिश शासन से आजाद हुआ। उस वक्त हिंदू-मुस्लिम दंगों के बीच उन्होंने पाकिस्तान बनाते हुए कुछ मुस्लिम भारतीयों को हिंदू बहुसंख्यकों के भय से भी स्वतंत्र किया।
पाकिस्तान बहुत दूर निकल चुका है और 70 वर्ष बाद भी हम भारतीय अभी भी हिंदू-मुस्लिम संबंधों की चिंता से ही जूझ रहे हैं। सवाल यह उठता है कि वे कौन लोग हैं जो आज भी दोनों समुदायों के रिश्तों की चिंता में घुल रहे हैं?
बीते 60 वर्ष से राजधानी दिल्ली में रह रहे एक तमिल के रूप में मैं स्पष्टï रूप से कह सकता हूं कि 29 राज्यों को मिलाकर बने हमारे देश में हिंदू-मुस्लिम संबंधों की चिंता केवल तीन राज्यों से संबंधित है। ये राज्य हैं जम्मू कश्मीर, पंजाब और उत्तर प्रदेश। हम उनके ही अनुभव को अपना राष्टï्रीय अनुभव मान बैठे हैं। कश्मीर अंधराष्टï्रवाद का निर्धारक है तो पंजाब उदासी का और उत्तर प्रदेश भारतीय राजनीति की विभाजनकारी तस्वीर पेश करता है।
अगर आप रूढि़वादी व्यक्ति हैं तो आप महाराष्टï्र और गुजरात की ओर संकेत करेंगे जहां हिंदू-मुस्लिम की बहस एक जबरदस्त राजनीतिक उपकरण है। अब बंगाल भी उसी राह पर बढ़ता हुआ नजर आ रहा है। वहां उन मुसलमानों की तादाद बढ़ रही है जिन्होंने एक वक्त हिंदू बहुल भारत छोडऩा ठीक समझा था।
परंतु शेष राज्यों की बात भी करें तो उत्तर भारत के तमाम राज्यों समेत हिंदू-मुस्लिम की बहस को लेकर एक अलग नजरिया है। ऐसा नहीं है कि वहां हिंदू मुस्लिमों से प्रेम करते हैं, न ही मुस्लिम हिंदुओं से प्रेम करते हैं। इन इलाकों में वे एक दूसरे की अनदेखी करते हैं ताकि वे शांतिपूर्ण तरीके से एक दूसरे के साथ रह सकें। इस प्रकार एक दूसरे की अनदेखी करना सांप्रदायिक शांति की स्थापना में एक अहम कारक है। उत्तर प्रदेश और पंजाब की तरह मेलजोल का छद्म इन राज्यों में नहीं रचा जाता।
जियो और जीने दो
कम से कम दो ऐसी वजह हैं जिनके चलते हमें इस सिद्घांत को स्वीकार करना चाहिए। एक वजह तो बहुत पुरानी है जबकि दूसरी अपेक्षाकृत नई है।
प्राचीन वजह की बात करें तो इस्लाम पंजाब के रास्ते उत्तर भारत में घुसा और उत्तर प्रदेश में विस्तारित हुआ। यह सारा काम तलवार के जोर पर किया गया। उत्तर भारत का अनुभव हिंसात्मक इस्लाम का रहा है। इसे तुर्की की शैली का इस्लाम कहा जाता है। उत्तर भारत के लोगों की स्मृति में वह हिंसा दर्ज है।
शेष भारत में और खासतौर पर उत्तर भारत में इस्लाम का प्रवेश तलवार नहीं बल्कि व्यापार के जरिये हुआ। वहां की यादें अलग हैं। दोनों समुदाय एक दूसरे से घृणा नहीं करते। दुख की बात यह है कि घृणा की गैरमौजूदगी का कोई राजनीतिक या सामाजिक मूल्य नहीं है। राजनेता भी उत्तर भारत पर ध्यान केंद्रित करते नजर आते हैं जबकि शेष भारत मुस्लिमों के साथ कहीं बेहतर तालमेल की मिसाल पेश करता है। इसे जियो और जीने दो कहा जा सकता है।
नई वजह में विभाजन के बाद की परिस्थितियां शामिल हैं। पंजाब और बंगाल के अधिकंाश मुस्लिम क्रमश: पश्चिमी और पूर्वी पाकिस्तान चले गए। लेकिन उत्तर प्रदेश से केवल अमीर तबके के लोग गए। शेष यहीं रह गए क्योंकि उनका यह सोचना सही था कि यह उनके पुरखों की जमीन है। इस बीच यह भूलने की जरूरत नहीं कि मुस्लिम केवल उत्तर प्रदेश में ही नहीं बल्कि देश के कई अन्य राज्यों में भी रुके रहे।
एक उत्तर भारतीय तमिल की दृष्टिï से कहूं तो विभाजन ने पंजाबियों और बंगालियों को अधिक प्रभावित किया। इसका संबंध केवल मुस्लिम धर्म से नहीं था। अगर यह पूरी तरह मुस्लिमों का मामला होता तो पूर्वी पाकिस्तान कभी पश्चिमी पाकिस्तान से अलग नहीं होता।
धर्म का तंतु उनको आपस में जोड़े नहीं रख सका। इस्लाम ने राजनीतिक पहचान बनाने में भूमिका जरूर निभाई लेकिन वह दो सांस्कृतिक पहचानों को एकजुट नहीं कर सका। मेरा सवाल यह है कि उत्तर प्रदेश में होने वाली घटना पूरी बहस को कैसे निर्धारित करने लगती है? हकीकत में पूरा उत्तर प्रदेश भी नहीं बल्कि केवल पश्चिमी उत्तर प्रदेश। क्या शेष भारत के लोग बेवकूफ हैं?
यही तो राजनीति है?
क्या यह असामान्य नहीं प्रतीत होता कि आजादी के 70 वर्ष बाद हमने कांग्रेस नामक राजनीतिक दल को प्रतिस्थापित करके भारतीय जनता पार्टी नामक दल को सत्ता सौंप दी है जो कमोबेश कांग्रेस जैसी ही है।
इन दोनों दलों की राजनीति में हिंदुस्तानी मुस्लिमों को लेकर उनके रुख की अहम भूमिका है। मोहम्मद अली जिन्ना इस बात को जानकर कितने प्रसन्न होते?
इस बात की कोई अहमियत नहीं है कि एक दल को उनसे प्यार है और दूसरे को नफरत। असली महत्त्व इस बात का है कि दोनों को उनकी जरूरत है और वे उनका अपने तरीके से इस्तेमाल करते हैं। यह इस्तेमाल ऐसा होता है कि हिंदू दूर जाते हैं। उत्तर भारत में कांग्रेस उनकी सहायता करती है जबकि भाजपा उनको सताती है।
शेष भारत में ऐसा नहीं होता है। यही राजनीतिक दल उन इलाकों में हर वक्त मुस्लिम विरोधी एजेंडा नहीं चलाता। नतीजतन वहां हिंदुओं और मुस्लिमों के रिश्ते एकदम अलग मिजाज के हैं।

Keyword: hindu, muslim, religion,
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