बिजनेस स्टैंडर्ड - आगामी सामाजिक क्रांति के लिए रहना होगा तैयार
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आगामी सामाजिक क्रांति के लिए रहना होगा तैयार

अजित बालकृष्णन /  August 23, 2017

अतीत में जो भूमिका भूमि, कोयला और अन्य संसाधनों की थी, वही स्थिति आने वाले दिनों में डेटा की होगी। विस्तार से बता रहे हैं अजित बालकृष्णन
मैं पिंगली वेंकैया का बहुत सम्मान करता हूं। इन शख्स ने सन 1921 में एक ध्वज तैयार किया जिसे स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान तमाम भारतीय लहराते। उनके डिजाइन में शीर्ष पर भगवा पट्टी थी, बीच में सफेद और नीचे हरी पट्टïी। संभवत: महात्मा गांधी की सलाह पर उन्होंने बीच में चरखा रखा था। इस डिजाइन के पीछे दलील यह थी कि भगवा और हरा रंग हिंदुओं और मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व करते हैं और बताते हैं कि उनको देश के भविष्य के लिए एकजुट रहना होगा। दोनों के बीच में चरखा स्वतंत्रता आंदोलन का प्रतीक था। यह औद्योगिक क्रांति के प्रति हमारा प्रतिरोध था। कताई और बुनाई मशीनों के साथ ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने भारत को गुलाम बना लिया था और इसके चलते बड़े पैमाने पर बेरोजगारी पैदा हो गई थी।
कांग्रेस ने सन 1921 में विजयवाड़ा में आयोजित सम्मेलन में इस ध्वज को अपना लिया और यह पार्टी का ध्वज बन गया। यह ध्वज एक नजर में अशिक्षित भारतीयों तक को स्वतंत्रता संघर्ष के बारे में बताने में सक्षम था। यह कपड़ा बनाने की मशीनों के कारण देश में आई गरीबी और दमन की कहानी भी कहता था और उनसे आजादी की मांग भी करता था। आज, यह देश का राष्टï्रीय ध्वज है। केवल चरखे की जगह अशोक चक्र ने ले ली है।
प्रतीकों वाले ध्वज लंबे समय से जनता को एकजुट करने के लिए प्रयोग में लाए जाते रहे हैं। रूस की कम्युनिस्ट क्रांति लगभग उसी समय घटित हुई थी जब वेंकैया ने कांग्रेस का ध्वज बनाया था। रूसी क्रांति में हंसिए और हथौड़े को प्रतीक बनाया गया था। हथौड़ा औद्योगिक श्रमिकों के हितों का प्रतिनिधित्व कर रहा था तो हंसिया कृषि श्रमिकों की प्रतीक थी। दोनों ही हृदयहीन जार के शासन से त्रस्त थे जिसने औद्योगिक क्रांति के जरिये उनकी मुसीबतें बढ़ा दी थीं।
मुझे कई बार आश्चर्य होता है कि क्या हमारे नीति निर्माताओं ने चीजों को डिजिटल बनाने की अपनी धुन में उस सामाजिक धुरी की जांच परख ही बंद कर दी है जो वास्तव में डिजिटल दुनिया के हमारे वादों की राह में मौजूद थी।
उदाहरण के लिए दुनिया भर में हुए कई अध्ययन बताते हैं कि डिजिटल युग के आगमन से बड़ी तादाद में रोजगारों को खतरा उत्पन्न होने जा रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक कृत्रिम बुद्घिमता और इससे जुड़ी तकनीक के आगमन के बाद माल ढुलाई, ग्राहक सेवा, और उपभोक्ता मामलों से जुड़े कई क्षेत्र के तमाम रोजगार दांव पर लग सकते हैं।
डेलॉयट इनसाइट की एक रिपोर्ट में गत वर्ष कहा गया था कि विधिक क्षेत्र के 39 फीसदी रोजगार अगले 10 साल में समाप्त हो जाएंगे। अन्य अध्ययनों के मुताबिक भी बीमा और बैंकिंग क्षेत्र में भी ऐसे मझोले रोजगार आने वाले दिनों में समाप्त हो जाएंगे। यहां तक कि श्रम की कम लागत वाले देश भी सुरक्षित नहीं हैं। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के एक अध्ययन में कहा गया है कि आसियान क्षेत्र के सबसे बड़े नियोक्ताओं में से एक कपड़ा और जूता क्षेत्र में भी कंप्यूटर आधारित डिजाइन और रोबोटिक्स के कारण रोजगार को चुनौती उत्पन्न हो गई है।
सूचना युग के कारण उपजा यह द्वंद्व अधिक वृहद और सामाजिक स्तर पर भी हो सकता है। इसे केवल विरोध प्रदर्शन के स्तर पर सीमित करके देखना ठीक नहीं। हाल ही में प्रकाशित पुस्तक द इंडस्ट्रीज ऑफ द फ्यूचर में लेखक एलेक रॉस कहते हैं कि औद्योगिक युग में जमीन कच्चा संसाधन थी। अब सूचना प्रौद्योगिकी के युग में उसका स्थान डाटा ने ले लिया है। हमें अपने भारतीय अनुभव से यह बात पता है कि कृषि युग में जो जमीन पर कब्जा रखता था वह मालिक था। यही वजह थी कि लोग भूस्वामियों को ईष्र्या की नजर से देखते थे। वे फिल्मों में नायक बनकर आते। उस वक्त ऐसी सामाजिक व्यवस्था बन गई जहां भू स्वामियों को अन्य लोगों पर तमाम तरह के वरीय अधिकार हासिल थे। औद्योगिक युग में जो लोग लोहे, कोयले और पेट्रोलियम की आपूर्ति पर नियंत्रण रखते थे वे निर्विवाद राजा थे। सूचना युग में आंकड़ों पर अधिकार रखने वाले राजा होंगे। जिस तरह हम जमीन का रकबा या कोयला खदान, तेल क्षेत्रों के लिए लड़ते थे, वैसी ही लड़ाई अब डाटा पर नियंत्रण को लेकर लड़ी जाएगी। गत सप्ताह मैंने सोचा कि मैं भी वेंकैया का अनुकरण करते हुए एक ध्वज बनाऊं जो आसन्न विवादों की भावना को अपने में समेटे हो।
मेरा विचार है कि बुनाई की मशीन ने जो काम चरखे के साथ किया और खेतों में काम आने वाली मशीनों ने हंसिए के साथ किया, अलगोरिदम वही काम आज के दौर में पेन के साथ कर रहा है। सही कहा जाए तो कीबोर्ड और वर्ड प्रोसेसर ने कागज पर लिखने की जगह कंप्यूटर स्क्रीन पर हमारे विचारों को दर्ज करने के अलावा कुछ नहीं किया है।
ऐसे में अगर हमें कल्पनाशीलता के साथ एक ध्वज तैयार करना हो तो उसके केंद्र में हमें क्विल पेन रखना होगा। यह वैसा ही प्रतीक होगा जैसा हंसिया, हथौड़ा और चरखा था। ऐसा करके हम आम जनता को अपने साथ जोड़ पाएंगे। गौरतलब है कि डिजिटल अलगोरिदम ने पहले ही लोगों के रोजगार छीनने शुरू कर दिए हैं। अब किसी विषयवस्तु को पढऩे उसे प्रसंस्कृत करने का काम आदमी की जगह कंप्यूटर ने करना शुरू कर दिया है।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि औद्योगिक क्रांति में जहां हथकरघों और बुनकरों के काम को चुनौती उत्पन्न हुई थी और कई जगह उनका काम छिन भी गया था वहीं इसकी बदौलत कपड़े सस्ते हुए थे और आबादी के बड़े तबके की पहुंच कपड़े तक हो सकी थी। यह वह वर्ग था जो इससे पहले कपड़े तक नहीं पहन पाता था। इसी प्रकार सूचना प्रौद्योगिकी के युग में अलगोरिदम से अंकेक्षकों, वकीलों, चिकित्सकों और लिपिक वर्ग के काम मुश्किल हो सकते हैं लेकिन इसके साथ ही यह इन तमाम सेवाओं को अधिक विश्वसनीय और सस्ता बनाएगी। यानी आबादी के बड़े तबके की पहुंच इन तक हो सकेगी।
सूचना के इस युग में भारत जो भी रास्ता लेगा वह पेशेवर सेवाओं को अधिक विश्वसनीय और सस्ता बनाएगा या उसकी वजह से केवल रोजगार जाएंगे यह इस बात पर निर्भर करेगा कि भारतीय नीति निर्माता इस दिशा में किस प्रकार कदम उठाते हैं। अगर वे गलत नीतियों और गलत स्वप्नों का पीछा करेंगे तो भारतीय समाज में कई ऐसे समूह हैं जो मेरे द्वारा तैयार किया गया ध्वज लहराते हुए सामने आ जाएंगे। अगर वे सही ढंग से नीतियां बनाएंगे तो मेरे द्वारा तैयार किया गया ध्वज कई अन्य रचनात्मक रूप से बनाई गई चीजों की तरह बरकरार रहेगा। यानी एक ऐसा रोचक डिजाइन जिसका कोई व्यावहारिक इस्तेमाल न हो।

Keyword: resources, data, social revolution,
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