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देसी कपास की वापसी

संपादकीय /  August 23, 2017

जीन संवद्र्घित बीटी कॉटन के आगमन के बाद भुला दिए गए देसी कपास का नए सिरे से उभार स्वागतयोग्य है। बीटी कॉटन धीरे-धीरे बॉलवर्म कीटों के समक्ष अपनी प्रतिरोधक क्षमता गंवाता जा रहा है। इसके अलावा इस किस्म के तमाम नए शत्रु सामने आ गए हैं। व्हाइटफ्लाई भी ऐसा ही एक कीट है। इन वजहों से भी किसान दोबारा देसी किस्मों की ओर रुख कर रहे हैं क्योंकि वह इनमें से अधिकांश कीटों तथा कपास की कुछ आम बीमारियों से निपटने में सक्षम है।
अगर यह रुझान गति पकड़ता है और सार्वजनिक नीतियों में भी इसकी वापसी होती है तो इससे कपास की खेती में वह जरूरी विविधता आएगी जो बीटी कॉटन के आगमन के बाद खत्म हो चुकी थी। कपास की खेती में 95 फीसदी रकबा बीटी कॉटन से आच्छादित है। विविधता का यह अभाव ही कीटों को प्रतिरोधक क्षमता से लैस करता है और वे नए-नए रूप लेने लगते हैं जो कीटनाशकों के असर से बचा रहता है। चाहे जो भी हो लेकिन हाइब्रिड होने के बावजूद कोई पौधा अनंत काल तक बेहतर प्रतिफल देता नहीं रह सकता। ऐसे में उसकी जगह नई और बेहतर फसल देने में सक्षम किस्मों का चयन करना होता है। साथ ही ऐसी किस्में भी जो कीटों आदि का प्रतिरोध कर सकती हों।
बीटी कॉटन के मामले में ऐसा नहीं हुआ। क्योंकि सरकार लगातार ऐसी नई किस्मों के प्रयोग को मंजूरी देने की अनिच्छुक रही जो विभिन्न प्रकार के कीटों से प्रतिरोधक क्षमता रखते हों। अब जबकि देसी कपास में रुचि दोबारा देखने को मिल रही है तो उच्च प्रतिफल वाली नई हाइब्रिड और गैर हाइब्रिड किस्मों की मदद से भी बीटी कॉटन का उक्त एकाधिकार समाप्त किया जा सकता है। इसके परिणामस्वरूप जो विविधता आएगी वह कपास उत्पादन को स्थिर बनाने में मददगार साबित हो सकती है और ऐसी कीमत सुनिश्चित कर सकती है जिसकी मदद से देश दुनिया के शीर्ष कपास उत्पादकों और निर्यातकों में अपनी जगह सुरक्षित कर सकता है।
देसी कपास को जीएम कॉटन पर पहले से ही कुछ बढ़त नैसर्गिक रूप से हासिल है। चूंकि यह देसी ढंग से स्वत: विकसित किस्म है इसलिए इसमें स्थानीय कृषि-पर्यावास हालात को लेकर बेहतर गुणधर्म रहते हैं। यह स्थानीय कीटों और बीमारियों आदि से निपटने के लिए पर्याप्त ताकतवर रहता है। इसे उर्वरकों और कीटनाशकों की भी अधिक आवश्यकता नहीं पड़ती है और कुलमिलाकर इसे उगाना अधिक किफायती है। देसी कपास की मांग चिकित्सकीय प्रयोग के लिए भी होती है। देसी कॉटन की कुछ बीटी किस्मों का विकास सरकारी शोध संस्थानों ने भी किया है और वे निजी क्षेत्र के हाइब्रिड कॉटन को टक्कर दे सकती हैं। ये किस्में जल्दी तैयार होती हैं और कीटों के सक्रिय होने के पहले फसल दे देती हैं। देसी कपास की बुआई भी पास-पास हो सकती है। यानी कम क्षेत्र में अधिक पौधे लगाए जा सकते हैं।
बीटी कॉटन के पतन के लिए तकनीक विकसित करने वालों से लेकर उसे मंजूरी देने वालों, बीज कंपनियों, किसानों और नीति निर्माताओं तक सबकी नादानियां जिम्मेदार हैं। इनमें से किसी ने कायदों को ठीक से नहीं समझा। तकनीक विकसित करने वालों और बीज कंपनियों ने कीटों से निपटने में पर्याप्त विविधता नहीं विकसित की। नीति निर्माताओं ने बीज को मंजूरी में भेदभाव किया जिससे सरकारी क्षेत्र की शोध कंपनियां बाजार में प्रवेश नहीं कर सकीं। ये सारी संस्थाएं मिलकर यह नहीं देख पाईं कि कीट इन किस्मों को लेकर प्रतिरोधी हो रहे हैं। किसानों ने इन्हें उगाते वक्त बताई गई सावधानी नहीं बरती। ऐसी गलतियों से बचा जाना चाहिए ताकि जीएम और गैर जीएम कॉटन के साथ देसी कपास की किस्में बराबरी से बची रहें। इससे जरूरी विविधता आएगी और हर तरह की मांग पूरी की जा सकेगी।

Keyword: GM, cotton, whitefly,
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