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माणिक सरकार को ही हासिल है आलोचना का नैतिक अधिकार

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  August 22, 2017

त्रिपुरा विधानसभा के लिए वर्ष 2013 में हुए चुनावों के दौरान दाखिल आयकर रिटर्न से काफी चीजें स्पष्ट हो जाती हैं। माणिक सरकार सबसे निर्धन उम्मीदवारों में से एक थे। अब भी वह अपनी पार्टी माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) से मिलने वाली 5,000 रुपये की मासिक तनख्वाह से अपना गुजारा करते हैं। उनके पास अपना कोई घर नहीं है। मुख्यमंत्री होने के नाते उन्हें जो वेतन मिलता है उसे भी वह अपनी पार्टी को दे देते हैं।
त्रिपुरा के मुख्यमंत्री के तौर पर माणिक सरकार इतनी साधारण जिंदगी जीने वाले पहले शख्स नहीं हैं। उनसे पहले नृपेन चक्रवर्ती भी इसी मिजाज वाले मुख्यमंत्री थे। जब कोई चक्रवर्ती से मिलने के लिए जाता था तो उसे लोहे के संदूक पर ही बैठना पड़ता था। उनके सरकारी आवास में कोई सोफा नहीं था और उनके कपड़े भी बगल के कमरे में एक रस्सी पर लटके रहते थे। त्रिपुरा कोई अमीर राज्य नहीं है और शीर्ष नेतृत्व की तरफ से इस तरह की सादगी का प्रदर्शन माकपा को लगातार मतदाताओं का पसंदीदा बनाता रहा है। माणिक सरकार भी 1998 से ही लगातार त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बने हुए हैं।
पूर्वोत्तर के सभी राज्यों में त्रिपुरा को सबसे कम भ्रष्ट माना जाता है। वाम मोर्चे के शासन में लंबे समय तक रहे पश्चिम बंगाल में हालत यह हो गई थी कि स्थानीय पुलिस थाने में कोई पीडि़त व्यक्ति तभी केस दर्ज करा सकता था जब वह या तो वामपंथी दल का सदस्य हो या फिर उसके साथ कोई कार्यकर्ता मौजूद हो। लेकिन त्रिपुरा में तय नियमों के मुताबिक शासन चलता रहा है। विधि का शासन हर जगह नजर आता है और उग्रवाद को पीछे छोडऩे में इस छोटे राज्य को मिली कामयाबी इसकी मिसाल है।
त्रिपुरा में कभी आदिवासी समुदाय की बहुतायत थी लेकिन पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) से बड़ी संख्या में शरणार्थियों के यहां आने से जनसंख्या का स्वरूप ही बदल गया। आदिवासियों को पहाड़ी इलाकों की तरफ खदेड़ दिया गया और राजनीति एवं प्रशासन पर बांग्ला-भाषी लोगों का वर्चस्व स्थापित हो गया। राज्य के मूल निवासियों को कमजोर करने की इस कोशिश के खिलाफ आंदोलन शुरू हुआ तो जल्द ही उसने उग्रवाद का रूप ले लिया। त्रिपुरा का पहला संगठित सशस्त्र आदिवासी आंदोलन 'सेंगक्रैक' 1960 के दशक के मध्य में उभरा था। उसकी वजह यह थी कि आदिवासी इलाके में भी बाहर से आए लोग बसने लगे थे।
वर्ष 1971 में त्रिपुरा उपजाति युवा समिति, 1981 में त्रिपुरा नैशनल वॉलंटियर्स, 1989 में नैशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा और उसकी सशस्त्र इकाई नैशनल होली आर्मी और ऑल त्रिपुरा टाइगर फोर्स ने जुलाई 1990 में राजनीतिक चर्चाओं को खासा प्रभावित किया। कुछ उग्रवादी संगठनों ने भारतीय संघ में त्रिपुरा के विलय पर ही सवाल उठाते हुए कहा था कि त्रिपुरा को संप्रभुता मिले और गैरकानूनी प्रवासियों को बाहर निकाला जाए। केंद्रीय पुलिसबल और सेना की सख्ती इन इलाकों में उग्रवादी भावनाओं के जन्म का कारण बनती रही है। आर्थिक विपन्नता के चलते इन इलाकों में उग्रवाद को प्रश्रय मिलता है और स्थानीय लोगों की नजर में वह वैकल्पिक माध्यम बन जाता है।
माणिक सरकार त्रिपुरा के लोगों की स्थिति में नाटकीय बदलाव नहीं ला सकते थे क्योंकि यह छोटा राज्य चारों तरफ स्थलीय इलाके से घिरा हुआ है लिहाजा उद्योग लगाने या निवेश के लिए कारोबारियों को आकर्षित करना खासा मुश्किल है। ऐसी स्थिति में माणिक सरकार ने बड़े पैमाने पर रबर के पेड़ लगाने का कार्यक्रम शुरू किया। रबर का पेड़ पांच साल के भीतर लेटेक्स का उत्पादन करने लायक हो जाता है। इस तरह एक एकड़ जमीन में लगे रबर के पेड़ों से सालाना एक लाख रुपये की आमदनी होने लगती है। एक छोटा परिवार सीमित स्तर पर भी रबर उत्पादन के जरिये हर महीने 8,000 से लेकर 9,000 रुपये तक कमा सकता है। इस जिंस उत्पाद की सही तरह से मार्केटिंग करने के लिए मुख्यमंत्री ने स्वयं-सहायता समूहों के गठन को प्रोत्साहित किया। आज के समय में वहां करीब 35,000 स्वयं-सहायता समूह काम कर रहे हैं और हरेक समूह में 10 लोग होते हैं। इसके बावजूद त्रिपुरा में बेरोजगारी की दर काफी अधिक है लेकिन उसकी एक वजह वहां पर कोई उद्योग नहीं होना है।
अद्र्धसैनिक बलों को काबू में रखने से त्रिपुरा में पुलिस द्वारा मानवाधिकार हनन के बहुत कम मामले सामने आए हैं। यह सुनने में भले ही घिसा-पिटा लगे लेकिन कानून व्यवस्था को बनाए रखने के साथ विकास की दिशा में उठाए गए कदमों ने त्रिपुरा में उग्रवाद को नियंत्रित रखा है। त्रिपुरा का अध्ययन करने से यह बात पूरी तरह साफ हो जाती है।
बांग्लादेश के साथ भारत के रिश्ते सुधरने से त्रिपुरा को फायदा हुआ है। त्रिपुरा के पास प्राकृतिक गैस का विशाल भंडार है और अगर पूर्व-पश्चिम गलियारे का रास्ता वहां से गुजरता है तो वह दक्षिण-पूर्व एशिया का प्रवेश द्वार बन सकता है। बांग्लादेश के साथ 865 किलोमीटर लंबी सीमा को देखते हुए अगर त्रिपुरा को एक पारगमन मार्ग मिल जाता है तो बड़ा लाभ होगा।
त्रिपुरा के राज्यपाल रह चुके डी एन सहाय कहते हैं कि शेष भारत को उग्रवाद से निपटने का तौर-तरीका इस राज्य से सीखने की जरूरत है। पूर्व पुलिस अधिकारी सहाय कहते हैं कि साम्यवादी त्रिपुरा कभी भी साम्यवादी पश्चिम बंगाल नहीं बन सकता है। सरकार ने 2013 में कहा भी था कि पश्चिम बंगाल के मतदाताओं ने वाम मोर्चे को उसकी कमजोरियों और कारगुजारियों के लिए दंडित किया है।
ऐसी पृष्ठभूमि में स्वतंत्रता दिवस पर माणिक सरकार के भाषण का दूरदर्शन और आकाशवाणी पर प्रसारण नहीं होना अखरता है। सच तो यह है कि मुख्यमंत्री के रूप में हर महीने 9,200 रुपये वेतन पाने वाले और इस पूरी राशि को पार्टी को दान करने वाले माणिक सरकार ही ऐसा भाषण दे सकते थे। वर्ष 2013 के विधानसभा चुनावों से पहले उनके पास महज 1,080 रुपये की नकदी थी और उनके बैंक खाते में 9,700 रुपये ही थे।

Keyword: tripura, manik sarkar, Chief minister,
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