बिजनेस स्टैंडर्ड - रेल की गति और सुरक्षा का नहीं कोई मेल
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रेल की गति और सुरक्षा का नहीं कोई मेल

विवेक देवरॉय /  August 22, 2017

एहतियात के तौर पर रेलवे ट्रैक के किसी भी हिस्से की मरम्मत और देखरेख के लिए उसे दो घंटे तक खाली रखना आवश्यक है। विस्तार से जानकारी दे रहे हैं विवेक देवरॉय

जरा टुंडला जंक्शन और कानपुर सेंट्रल रेलखंड पर विचार कीजिए। वाया इटावा यह दूरी 231 किलोमीटर है। इस रेलमार्ग की दूरी वाया शिकोहाबाद और फर्रुखाबाद भी तय की जा सकती है और तब यह दूरी बढ़कर 282 किमी हो जाती है। लेकिन यह वैकल्पिक मार्ग उस दलील में सही नहीं बैठता जिसका जिक्र मैं करूंगा। ऐसा इसलिए क्योंकि टुंडला-शिकोहाबाद मार्ग का कोई विकल्प नहीं है। टुंडला और कानपुर सेंट्रल के बीच करीब 70 टे्रनें गुजरती हैं और इनमें से लगभग सभी लंबी दूरी की हैं। एक तिहाई से ज्यादा ये ट्रेनें सुपरफास्ट श्रेणी की हैं। इस पूरे रेल मार्ग पर 15270 अहमदाबाद-मुजफ्फरनगर जन साधारण एक्सप्रेस और 64588 टुंडला-कानपुर मेमू (मेनलाइन इलेक्ट्रिक मल्टीपल यूनिट) के रूप में केवल दो ट्रेनें अनारक्षित हैं। इनमें से टुंडला-कानपुर मेमू 231 किमी की दूरी छह घंटे 20 मिनट में तय करती हैं। आजकल डेमू (डीजल इलेक्ट्रिक मल्टीपल यूनिट), ईएमयू (इलेक्ट्रिक मल्टीपल यूनिट) और मेमू श्रेणी की गाडिय़ों में शौचालय नहीं होते। एमू के लिए यह मायने नहीं रखता और भविष्य में शायद डेमू और मेमू में शौचालय की व्यवस्था कर दी जाए। परंतु आज, उनमें शौचालय नहीं हैं। गौरतलब है कि देश में करीब 235 डेमू और करीब 1600 मेमू हैं। जहां तक मैं समझता हूं, भारतीय रेल ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को आश्वस्त किया है कि चार घंटे से ज्यादा समय लेने वाली या 160 किमी से ज्यादा दूरी तय करने वाली कोई भी ट्रेन बिना शौचालय के नहीं चलेगी। यही वजह है कि 64588 मेमू में शौचालय का न होना विचित्र है। हालांकि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के समक्ष भारतीय रेल ने यह दलील भी दी थी कि अगर कोई डेमू या मेमू वाहन अपने चलने के स्थान से गंतव्य के बीच कहीं 30 मिनट या अधिक रुकती है तो उसमें शौचालय की आवश्यकता नहीं है। बहरहाल, 64588 फफूंद में अधिकतम छह मिनट रुकती है।
एक चेन लिंक्ड मेमू तो ऐसी भी है जो 435 किमी का सफर 10 घंटे 35 मिनट में तय करती है। 64152 दिल्ली-अलीगढ़ मेमू, 64154 अलीगढ़- टुंडला मेमू, 64158 टुंडला-इटावा मेमू और 64156 इटावा-कानपुर मेमू का समय कुछ इस तरह निर्धारित किया गया है कि अगर कोई एक टे्रेन लेट हो जाए तो बाकी की गाडिय़ों का छूटना तय है। बहरहाल चूंकि ये चेन लिंक्ड मेमू हैं इसलिए मुझे लगता है कि एक गाड़ी के आने तक उसकी अगली गाड़ी निश्चित तौर पर प्रतीक्षा करती होगी। यह सिलसिला आखिरी मेमू तक चलता होगा। ध्यान रहे कि इनमें से प्रत्येक स्टॉप पर करीब 30 मिनट का वक्त होता है। यानी यात्री अपनी शौच की शंका का निवारण इस समय में आराम से कर सकता है।
मध्य रात्रि से शुरू करते हैं और टुंडला और कानपुर के बीच की ट्रेनों के समय पर एक नजर डालते हैं। टुंडला से कानपुर के लिए अक्सर एक के बाद एक गाडिय़ां हैं। हालांकि मुझे दो घंटे की प्रतीक्षा के बाद भी कोई टे्रन नजर नहीं आई। मैंने इस मार्ग का चयन इसलिए किया क्योंकि यह भारतीय रेल के सबसे व्यस्त रेलमार्गों में से एक है। अगर इस मार्ग को दिल्ली-टुंडला-कानपुर में बदल दें तो इसकी व्यस्तता और अधिक बढ़ जाती है। टुंडला टेक्रीकल हॉल्ट वाला स्टेशन भी है और यहां कई ट्रेनों के चालक और गार्ड बदलते हैं। हर दिन करीब 120 ट्रेनें टुंडला में रुकती हैं, आठ ट्रेनें यहां से बनती हैं और आठ ही ट्रेनें यहां आकर अपना सफर समाप्त करती हैं। यहां रुकने और यहां से गुजरते हुए कानपुर में बनने या समाप्त होने वाली ट्रेनों की तादाद टुंडला की तुलना में तकरीबन दोगुनी है। यह रेलखंड अत्यंत व्यस्त है।
ऊपर जो आंकड़े दिए गए वे केवल सवारी गाडिय़ों के हैं। मालगाडिय़ों की गिनती इससे अलग है। ज्यादा दिन नहीं हुए जब टुंडला में कालिंदी एक्सप्रेस एक मालगाड़ी से टकराकर बेपटरी हो गई थी। अगर टे्रन की रफ्तार उस समय धीमी नहीं होती तो इसके बहुत भयावह नतीजे निकल सकते थे। मालगाडिय़ों के आने जाने का कोई समय निर्धारित नहीं रहता है इसलिए रेलवे की व्यवस्था के बाहर के लोगों को यह पता नहीं है कि इस विशिष्टï मार्ग पर कितनी मालगाड़ी चलती हैं। कानपुर माल ढुलाई का बड़ा केंद्र है इसलिए कई ट्रेनों का होना तय है।
रेलवे ट्रैक के किसी भी हिस्से की मरम्मत और देखरेख के लिए उसका दो घंटे तक खाली होना आवश्यक है। पता नहीं टुंडला और कानपुर के बीच ये दो घंटे का समय कैसे मिलता होगा। भारतीय रेल ने हाल ही में घोषणा की थी, 'यह निर्णय भी लिया गया है कि जहां ट्रेनों के बीच पर्याप्त अंतराल नहीं हो वहां ट्रेनों के आने जाने के समय को नए सिरे से निर्धारित किया जाए और कम से कम तीन घंटे का समय रखरखाव और मरम्मत के लिए मिल सके। इसके लिए मेल और एक्सप्रेस ट्रेनों का समय बदलना पड़े और सवारी गाडिय़ों को निर्धारित से पहले स्टेशन पर रोकना पड़े तो यह किया जाना चाहिए।'
मार्च 1998 में भी सभी महाप्रबंधकों को एक पत्र लिखकर उनसे कहा गया था कि वे ट्रेनों की समय-सारणी देखते हुए हर ब्लॉक में मरम्मत और रखरखाव का समय निकालने का प्रयास करें। लेकिन इसका क्रियान्वयन नहीं किया गया। परंतु परिचालन विभाग अधिक से अधिक ट्रेन चलाना चाहता है। क्योंकि इससे उसे राजस्व अर्जित करने में मदद मिलती है। अगर भारतीय रेल के दुर्घटनाओं के आंकड़ों पर नजर डालें तो अधिकांश दुर्घटनाएं लेवल क्रॉसिंग पर होती हैं। दूसरी सबसे बड़ी वजह है ट्रेनों का बेपटरी होना। सड़कों पर हमें अक्सर ऐसे संकेत चिह्नï देखने को मिलते हैं जिनका मतलब होता है कि तेज गति से वाहन चलाना जोखिम भरा हो सकता है। रेल पर भी यही बात लागू होती है। हम एक साथ सुरक्षा और गति दोनों नहीं हासिल कर सकते। कम से कम इतनी बड़ी संख्या में ट्रेनों के साथ तो कतई नहीं। अगर हमें ट्रेनों की तादाद कम कर सकें तो बात अलग है। रेलवे अधिनियम के अधीन रेलवे सुरक्षा आयोग के पास यह अधिकार नहीं है कि वह सुरक्षा को लेकर किसी तरह का प्रीमियम तय कर सके। शायद यह भी एक वजह है जिसके चलते एक नए और स्वतंत्र सुरक्षा प्राधिकार की बात चल रही है।
(लेखक नीति आयोग के सदस्य हैं। लेख में प्रस्तुत विचार पूरी तरह निजी हैं।)

Keyword: Rail, Train, Security,
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