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कर संग्रहण से जुड़ी कुछ पहेलियों का हल जरूरी

दिल्ली डायरी
ए के भट्टचार्य /  August 21, 2017

केंद्र की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली नरेंद्र मोदी सरकार जिस तरह लोगों को प्रत्यक्ष कर दायरे में लाने में कामयाब रही है, उसके लिए उसकी सराहना की जानी चाहिए। इस बीच अप्रत्यक्ष कर का दायरा भी बढ़ रहा है क्योंकि वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के अधीन कंपनियों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है। परंतु व्यवस्था पर जीएसटी का पूरा असर शायद इस वर्ष के आखिर तक ही सामने आ पाएगा। फिलहाल वित्त मंत्रालय के ताजातरीन आंकड़ों पर नजर डालें तो इससे यह पता चलता है कि प्रत्यक्ष कर कैसे चुकाए जा रहे हैं और कैसे अधिक से अधिक लोग कर रिटर्न दाखिल कर रहे हैं। वित्त वर्ष 2016-17 के लिए रिटर्न दाखिल करने की आखिरी तारीख यानी 5 अगस्त तक दाखिल करने वालों की तादाद में करीब 24.6 फीसदी का इजाफा हुआ और आंकड़ा बढ़कर 2.83 करोड़ तक पहुंच गया। इसी तरह वर्ष 2016-17 के लिए ताजातरीन प्रत्यक्ष कर संग्रह के 8.5 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान लगाया गया। यह आंकड़ा गत बजट में प्रस्तुत संशोधित अनुमान से बेहतर है।
बहरहाल अगर रिटर्न और कर संग्रह के इन आंकड़ों पर एक करीबी नजर डाली जाए तो एक ऐसा रुझान सामने आता है जो अब तक सरकार या किसी अन्य कर विशेषज्ञ द्वारा सामने नहीं लाया गया है। निश्चित तौर पर ये रुझान सरकार के प्रत्यक्ष कर दावे में विस्तार के दावों को लेकर एक नई दृष्टिï प्रस्तुत करते हैं।
पहली बात, 5 अगस्त को तय मियाद तक व्यक्तिगत कर रिटर्न में 25.3 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। परंतु फर्मों, कंपनियों, एसोसिएशनों, विभिन्न संस्थाओं और अविभाजित हिंदू परिवारों द्वारा दाखिल कर रिटर्न में समान अवधि में 10 फीसदी की गिरावट भी दर्ज की गई। यह गिरावट क्यों आई? जबकि समान अवधि में व्यक्तिगत फाइलिंग में 25 फीसदी तेजी आई।
अभी इस बारे में कोई विस्तृत अध्ययन उपलब्ध नहीं है। बहरहाल, लगता यही है कि छद्म या अपरिचालित कंपनियों पर सरकार की कार्रवाई ने अर्थव्यवस्था के इस क्षेत्र पर गहरा असर डाला है। करीब 10 लाख से अधिक दोहरे पैन खातों को बंद किए जाने ने भी ऐसे तमाम रिटर्न को प्रभावित किया है जो अतीत में लगातार दाखिल किए जा रहे थे। अब उनका अस्तित्व ही समाप्त हो गया। परंतु इस 10 फीसदी की गिरावट को कहीं अधिक स्पष्टï रूप से समझाए जाने की आवश्यकता है।
वर्ष 2016-17 के ताजातरीन कर संग्रह के आंकड़े अपने आप में कुछ चौंकाने वाली बातें छिपाए हुए हैं। यह सही है कि व्यक्तिगत आय कर संग्रह में 21 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। पिछले साल यह बढ़ोतरी केवल 8 फीसदी थी। निगमित कर संग्रह में भी 7 फीसदी का इजाफा देखने को मिला। जबकि वर्ष 2015-16 में यह बमुश्किल 6 फीसदी रहा था। परंतु सबसे चौंकाने वाली जानकारी राज्यों से सामने आई है जहां संग्रहण में सबसे अधिक इजाफा देखने को मिला है। यह भी याद रखिए कि वर्ष 2016-17 वह वर्ष था जब नोटबंदी हुई थी और व्यक्तिगत आय कर में हुए इजाफे का श्रेय इस बात को भी दिया गया था कि 8 नवंबर, 2016 को प्रचलित मुद्रा का 85 फीसदी सीधे चलन से बाहर कर दिया गया था।
बड़े शहरों वाले राज्यों की बात करें तो हरियाणा में 21 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। वहीं कर्नाटक और तमिलनाडु में 19 फीसदी की वृद्घि दर्ज की गई। पश्चिम बंगाल में 18 फीसदी और गुजरात में 14 फीसदी की तेजी आई।
इसके एकदम विपरीत महाराष्टï्र और दिल्ली दोनों जगह मिलकर देश के कुल प्रत्यक्ष कर संग्रह इजाफे का बमुश्किल आधा ही बढ़ा। यह वृद्घि क्रमश: 9 फीसदी और 7 फीसदी की थी। क्या यह केवल आधार प्रभाव था या फिर इसके पीछे अन्य वजह भी हैं जिनकी तलाश करनी होगी।
दो ऐसे क्षेत्र हैं जो वास्तव में चिंता की वजह लेकर आए हैं। पहली बात, वर्ष 2016-17 में कुल कर संग्रह में प्रत्यक्ष कर की हिस्सेदारी 49.66 फीसदी के साथ 10 वर्ष के न्यूनतम स्तर पर रही। इसमें गिरावट का रुझान वर्ष 2009-10 में शुरू हुआ था जब 61 फीसदी के उच्चतम स्तर पर रहा था। मौजूदा रुझान जितनी जल्दी बदलेगा देश के सार्वजनिक वित्त के लिए उतना ही अच्छा होगा। दूसरी बात, स्रोत पर कर कटौती तथा अग्रिम कर का कुल प्रत्यक्ष कर संग्रह में क्रमश: 35 फीसदी और 41 फीसदी योगदान होता है। अगर इन दोनों को मिलाकर देखा जाए तो कुल केंद्र के प्रत्यक्ष कर संग्रह में करीब तीन चौथाई से ज्यादा योगदान इनका ही होता है। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक तौर पर उठता है कि कर संग्रह की लागत क्या रही। वर्ष 2016-17 में यह लागत 0.66 फीसदी रही जबकि इससे पहले यह मामूली रूप से कम थी। वहीं वर्ष 2013-14 में यह 0.57 फीसदी थी। हालांकि वर्ष 2000-01 के 1.36 फीसदी की तुलना में इसमें काफी गिरावट आई है लेकिन डिजिटलीकरण प्रौद्योगिकी के तेज विस्तार के दौर में आगे इसमें और गिरावट की उम्मीद करना भी वाजिब होगा।
ऐसे में गत वर्ष प्रत्यक्ष कर विभाग में काम करने वालों में 73 फीसदी के इजाफे के असर को लेकर सवाल करना भी उचित ही कहा जाएगा।

Keyword: BJP, indirect tax, GST,
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