बिजनेस स्टैंडर्ड - नए वित्त आयोग के समक्ष बुनियादी राजकोषीय प्रश्न
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Saturday, November 25, 2017 02:43 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|
 
होम विशेष खबर

नए वित्त आयोग के समक्ष बुनियादी राजकोषीय प्रश्न

रथिन रॉय /  August 21, 2017

इस साल गठित होने जा रहे 15वें वित्त आयोग को राजकोषीय पुनर्संरचना पर खास ध्यान देने की जरूरत होगी। बता रहे हैं रथिन रॉय
इस साल नए वित्त आयोग का गठन हो जाएगा। संविधान के अनुच्छेद 280 के मुताबिक वित्त आयोग का यह दायित्व है कि वह केंद्र और राज्यों के बीच करों के वितरण के नियम तय करे। करों के इस समूह में आयकर, वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) और सीमा शुल्क शामिल होते हैं।
तेरहवें वित्त आयोग के आर्थिक सलाहकार के रूप में काम करते समय मुझे करों के इस विभाजन को नजदीक से देखने का मौका मिला। केंद्र और राज्यों के बीच करों का ऊध्र्वाधर विभाजन आवश्यक रूप से पुनरावृत्ति के आधार पर होता है क्योंकि अगर केंद्र की जरूरतों को पहले निर्धारित किया जाता है तो राज्यों के हिस्से में कम रकम ही आ पाएगी। इसी तरह राज्यों का हिस्सा पहले निर्धारित कर दिए जाने पर केंद्र के लिए संसाधन कम पड़ जाएगा। लगातार कई वित्त आयोगों ने धीरे-धीरे राज्यों के हिस्से में बढ़ोतरी की लेकिन 14वें वित्त आयोग ने एकमुश्त 10 फीसदी की बढ़ोतरी करते हुए राज्यों की हिस्सेदारी 42 फीसदी पर पहुंचा दी थी।
मौजूदा समय में जीएसटी लागू होने के बाद केंद्र ने राज्यों को करों के घाटे की क्षतिपूर्ति की गारंटी दी हुई है। इसके अलावा अप्रत्यक्ष करों पर लगने वाले उपकरों को भी खत्म कर दिया गया है। इससे राज्यों को मिलने वाला कुल कर हिस्सा बढऩे की संभावना है। इसके साथ ही केंद्र ने राज्यों को योजनागत अनुदानों को खत्म कर राज्यों को दिए जाने वाले हिस्से को भी कम करने की कवायद शुरू की है। ऊध्र्वाधर विभाजन के मामले में ये अहम कारक बनकर
उभरेंगे और आगामी कर विभाजन पर भी असर डालेंगे।
केंद्र की कमजोर राजकोषीय स्थिति, खासकर राजस्व घाटे को काबू में रखे जा सकने लायक स्तर तक लाने की उसकी प्रतिबद्धताओं को देखते हुए 15वें वित्त आयोग के लिए यह काफी अहम होगा कि वह रक्षा और आंतरिक सुरक्षा जैसे मामलों में केंद्र की आर्थिक जिम्मेदारियों को पूरा करने के प्रति यथार्थवादी नजरिया अपनाए। इसके साथ ही आयोग को संचित ऋण पर दिए जाने वाले ऊंचे ब्याज के बोझ का भी ख्याल रखना होगा। केंद्र आयोग के सामने शुरुआत में अवास्तविक एवं बढ़ा-चढ़ाकर आंकड़े पेश करने की ऐतिहासिक परंपरा से अलग हटते हुए अधिक मुखर एवं यथार्थवादी नजरिया अपना सकता है। जहां तक राज्यों का सवाल है तो आयोग को निजी निवेश के असंतुलित वितरण की वजह से राज्यों के बीच बढ़ती असमानता को काबू में रखने पर ध्यान देना होगा। गरीब राज्यों की श्रेणी से निकलकर समृद्ध राज्य बनने की राह में अपनी राजनीतिक एवं सामाजिक सीमाएं है और इस नकारात्मक पहलू को दूर करने में अंतर-सरकारी वित्त की भूमिका पर ध्यान देना होगा। राजकोषीय जवाबदेही एवं बजट प्रबंधन (एफआरबीएम) समिति की रिपोर्ट ने एक और अहम जिम्मेदारी डाल दी है। राज्यों का एकीकृत ऋण और जीडीपी के बीच अनुपात 21 फीसदी पर तय करने के साथ ही इस समिति ने 15वें वित्त आयोग से अलग-अलग राज्यों के लिए सीमा तय करने को कहा है। कर्ज और राज्य सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) का अनुपात राज्यों में अलग-अलग है, लिहाजा ऐसा कर पाना आसान नहीं होगा। हालांकि आयोग के लिए यह राज्यों के वित्त पर समग्र नजरिया अपनाने का एक मौका भी होगा। क्षैतिज कर वितरण में अब राज्यों के पास उपलब्ध कुल संसाधनों का ध्यान रखा जाएगा। आयोग कर वितरण के दोनों तरीकों के बारे में एक साझा फॉर्मूला अपनाने के बारे में भी सोच सकता है जिससे राज्यों को राजकोषीय अनुशासन की राह पर चलाया जा सकेगा।
अनुच्छेद 280 के मुताबिक वित्त आयोग के पास वित्तीय मामलों पर विचार के लिए अलग से भी मामले भेजे जा सकते हैं। वित्त आयोग को आपदा प्रबंधन के लिए समुचित कोष मुहैया कराने के लिए जरूरी प्रावधानों पर गौर करना होगा। मेरा मानना है कि बिजली वितरण में लगी कंपनियों के आर्थिक पुनरुद्धार के लिए सरकार की तरफ से लाई गई 'उदय' योजना का राज्यों की वित्तीय स्थिति पर पडऩे वाले असर पर भी आयोग को गंभीरता से विचार करना चाहिए। इसी तरह संपोषणीय विकास के लक्ष्यों को हासिल करने और जलवायु परिवर्तन पर लगाम लगाने के वास्ते सरकारों की प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए एक सुसंगत वित्तीय रणनीति भी बनानी होगी। यहां पर इन कार्यों को संपन्न करने में अनुदान सहायता एक महत्त्वपूर्ण सहयोगी की भूमिका निभाएगा। लेकिन आयोग सहकारी संघवाद की भावना का हवाला देते हुए समग्र वित्तीय प्रावधानों का भी बंदोबस्त कर सकता है।
देश की बढ़ती आबादी की जरूरतों को पूरा करना लगातार एक समस्या बना हुआ है। पिछले कई वित्त आयोगों ने करों के क्षैतिज वितरण के लिए 1971 की जनगणना के ही आंकड़ों का इस्तेमाल किया है। लेकिन अब 1971 की जनगणना के करीब 50 साल पूरे हो जाने के बाद उन आंकड़ों को इस्तेमाल करने का कोई औचित्य नहीं रह गया है। लेकिन वित्त आयोग अगर अपनी गणनाओं के लिए 2011 की जनगणना को आधार बनाता है तो दक्षिणी और पश्चिमी भारत के राज्यों को खासा नुकसान उठाना पड़ेगा। सवाल है कि क्या वित्त आयोग इस आकलन के लिए अन्य भरोसेमंद उपायों का सहारा ले सकता है?
आखिर में, मेरी दो खास आकांक्षाएं हैं। वार्षिक बजट प्रक्रिया अक्षम होने के साथ ही विश्वसनीयता को कम करती है और इससे राजकोषीय अधिकारियों को गैरजरूरी विशेष अधिकार भी मिल जाते हैं। इसका नतीजा राजकोषीय नीति के खराब क्रियान्वयन और अपव्यय के रूप में सामने आता है। कई वित्त आयोगों ने यह सुझाव दिया है कि एक मध्यम अवधि का राजकोषीय ढांचा लागू किया जाना चाहिए लेकिन अभी तक इस दिशा में किए गए प्रयास नाकाफी साबित हुए हैं। नए वित्त आयोग को ठोस, समयबद्ध उपायों का सुझाव देना चाहिए ताकि केंद्र और राज्यों के स्तर पर एक सक्रिय और आपसी सहमति वाला राजकोषीय ढांचा तैयार किया जा सके। इसे साकार करने के लिए वित्त आयोग कुछ सहूलियतों का भी सहारा ले सकता है।
दूसरी इच्छा राज्य के आकार को परिभाषित करने से जुड़ी हुई है। करीब 60 वर्षों से इस बुनियादी राजकोषीय सवाल को उठाया ही नहीं गया है। केंद्र और राज्य सरकारें करीब 17 फीसदी हिस्सा कर के जरिये जुटाती हैं और 6-7 फीसदी हिस्सा कर्ज से जुटाती हैं। इसका मतलब है कि जीडीपी में राज्य का योगदान करीब 24 फीसदी होता है। हम आने वाले समय में जिस तरह की सेवाएं हासिल करना चाहते हैं उसके लिए यह हिस्सा बहुत कम, बहुत थोड़ा या पर्याप्त है? इस सवाल का जवाब विभिन्न सार्वजनिक सेवाओं से जुड़े फैसलों को प्रभावित करेगा। जैसे, अगर हर कोई शिक्षा पर जीडीपी का 2 फीसदी हिस्सा खर्च करने के लिए तैयार हो जाता है तो हम यह कह सकते हैं कि इस खर्च का इंतजाम करने के लिए कर-जीडीपी अनुपात को 2 फीसदी बढ़ा दिया जाना चाहिए। लेकिन इससे राज्य के आकार में 2 फीसदी वृद्धि हो जाएगी। क्या यह वांछनीय है? अगर ऐसी ही मंशा रक्षा और स्वास्थ्य मद पर व्यय बढ़ाने की भी हो तो इस बढ़ोतरी की सीमा क्या होगी? राज्य के आकार पर आम सहमति बनाना ही प्रभावी राजकोषीय दक्षता की एकमात्र गारंटी है। एक संवैधानिक निकाय होने के नाते 15वें वित्त आयोग के लिए यह अहम होगा कि वह इस बुनियादी राजकोषीय सवाल का जवाब तलाशे।
(लेखक एनआईपीएफपी के निदेशक हैं और पहले 13वें वित्त आयोग के सलाहकार रह चुके हैं)

Keyword: finance commission, tax,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या अस्पतालों के शुल्क पर लगना चाहिए अंकुश?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS General News   Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.