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नई पूंजी बनाम किफायत

संपादकीय /  August 21, 2017

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर ऊर्जित पटेल ने सप्ताहांत पर कहा कि केंद्रीय बैंक और सरकार इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि सरकारी बैंकों की पूंजी की समस्या को समयबद्घ ढंग से निपटाया जा सकता है या नहीं। यह अच्छी बात है कि बैंकिंग नियामक के रूप में आरबीआई और सरकारी बैंकों के मुख्य अंशधारक के रूप में सरकार इस पर चर्चा कर रहे हैं। बैंकिंग व्यवस्था के पूरे फंसे हुए कर्ज (एनपीए) की बात करें तो गत वित्त वर्ष के अंत तक वह कुल बैंक ऋण का 10वां हिस्सा था। फंसा हुआ कर्ज सरकारी बैंकों का है और उनमें से कुछ का एनपीए अनुपात इस क्षेत्र के औसत से बहुत ज्यादा है। बैंकों के बहीखातों की फंसी हुई संपत्ति के चलते पहले ही उद्योग जगत को मिलने वाले ऋण में मंदी आई है। इसके चलते आर्थिक वृद्घि में निजी निवेश की गति धीमी हुई है। हालांकि फंसे हुए कर्ज की समस्या ने वित्तीय तंत्र को एक व्यवस्थित जोखिम में डाल दिया है।
यह दलील उचित ही दी गई है कि बैंक तब तक ऋण नहीं दे पाएंगे और जोखिम तब तक कम नहीं हो पाएगा जब तक कि सरकार सार्वजनिक बैंकों में नए सिरे से पूंजी नहीं डालती। पटेल ने कहा कि मौजूदा फंसे हुए कर्ज को निपटाने के लिए बैंकों का आकार सीमित करना होगा। इसका असर उनके पूंजी प्रावधान पर भी होगा। बहरहाल सीमित बजट संसाधनों और भारी भरकम एनपीए की तुलना करें तो तस्वीर बहुत उत्साहित करने वाली नहीं दिखती। गत वित्त वर्ष के अंत में एनपीए की राशि करीब 6 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा थी। ऐसे में अगर बैंकों को सीधे नई पूंजी दी गई तो राजकोष पर गहरा दबाव उत्पन्न होगा।
इतना ही नहीं गहरे प्रशासनिक सुधारों के अभाव में यह भी दावे से नहीं कहा जा सकता है कि यह समस्या दोबारा सर नहीं उठाएगी। इसलिए यह जरूरी है कि बैंकों को उबारने की कोई भी कोशिश ऐसी हो जहां भविष्य में गड़बडिय़ां करने का प्रोत्साहन नहीं मिले। सरकार द्वारा पूंजी डालने के अलावा पटेल ने बाजार से पूंजी जुटाने, सरकारी हिस्सेदारी कम करने और तुच्छ संपत्ति के विलय और बिक्री की मदद से धन जुटाने की बात भी कही। परंतु केवल इतना करना पर्याप्त नहीं है। सरकारी हिस्सेदारी को कम करने के साथ-साथ सरकारी नियंत्रण में भी कमी करना आवश्यक है। यह दलील दी जाती रही है कि खातों की हालत इतनी खस्ता होने पर निजीकरण करना मुश्किल होता है। लेकिन ऐसा इसलिए है क्योंकि बाजार सरकारी हस्तक्षेप को ठीक नहीं मानता। प्रशासनिक सुधार और सरकार का नियंत्रण त्यागने पर तैयार होना अपने आप में हालात बदलने वाला साबित होगा।
लब्बोलुआब यह कि जो बैंक एनपीए को नियंत्रित करने में नाकाम रहे हैं उनको जवाबदेह ठहराया जाए। जरूरत पड़े तो उनका दायरा सीमित किया जाए और पुनर्पूंजीकरण का आकलन करते समय जवाबदेही को भी ध्यान में रखा जाए। विभिन्न बैंकों के बीच पूंजी को बांटने का तरीका कुछ ऐसा निकाला जाए कि मजबूत बैंकों को अधिक पूंजी मिले और कमजोर बैंकों को तब तक अपना कर्ज बांटना स्थगित करना पड़े या कम करना पड़े जब तक उनके प्रदर्शन में जरूरी सुधार नहीं हो जाता। अगर हम ऐसा रुख अपनाते हैं तो हम सरकारी बैंकिंग व्यवस्था को मजबूत बनाने में सफल होंगे और साथ ही किफायत को प्रोत्साहित करने पर भी बल जाएगा। सरकार को बैंक प्रबंधन, कर्जदारों तथा बैंकिंग यूनियनों के दबाव में नहीं आना चाहिए। साथ ही उसे वित्तीय अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण के क्रम में बैंकों पर नियंत्रण के आकर्षण पर भी अंकुश लगाना होगा। निश्चित तौर पर हम लगातार फंसे हुए कर्ज से निपटने के लिए पैसे नहीं फंसा सकते।

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Keyword: RBI, Reserve bank of india, banks,
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