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निर्णयों का मनमानापन और विधि का शासन

बाअदब
सोमशेखर सुंदरेशन /  August 20, 2017

भारतीय प्रतिभूति बाजार में एक बार फिर एकतरफा फैसलों की भरमार है। कानून की नजर में भी किसी व्यक्ति की गैरमौजूदगी में उसके खिलाफ आदेश पारित करना तभी उचित है जबकि यह एकदम अनिवार्य हो और इसमें और देरी बरदाश्त न की जा सकती हो।
इसके बावजूद जब कभी ऐसे एकतरफा फैसले लिए जाते हैं संबंधित निर्णय लेने वाले प्राधिकार से उम्मीद की जाती है कि वह अपनी पूरी तैयारी से आएगा और यह स्पष्टï करेगा कि मामले में इतनी जल्दी निर्णय लेना क्यों आवश्यक था। साथ ही वह किसी भी तरह की चुनौती मिलने की स्थिति में अपने कदमों को उचित भी ठहराएगा यानी अपने निर्णय का बचाव करेगा। बात करते हैं 331 सूचीबद्घ कंपनियों के मामले की। कंपनी मामलों के मंत्रालय ने पूंजी बाजार नियामक से कहा कि ये शेल कंपनियां यानी फर्जी कंपनियां हैं। ये ऐसी कंपनियां होती हैं जिनका कोई परिचालन या कामकाज नहीं होता। ये बस नाम की कंपनियां होती हैं।
भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड ने इस सूची पर आंख मूूंद कर भरोसा कर लिया और कह दिया कि ये सारी कंपनियां शेल कंपनियां हैं। मीडिया की रिपोर्ट बताती हैं कि कई उल्लेखनीय नामों को एक झटके में शेल कंपनी घोषित कर दिया गया। उनको शेल कंपनी घोषित करने का तात्पर्य यह है कि उनकी मौजूदगी की बाकायदा जांच की जाएगी और उनको शेयर बाजार पर परित्यक्त का दर्जा दे दिया जाए। उनको महीने में केवल एक बार कारोबारी की इजाजत होगी। जाहिर है इसका इन कंपनियों में हिस्सेदारी रखने वालों पर गहरा असर होगा।
कुछ निवेशकों ने अपने शेयरों के बदले कर्ज ले रखा होगा। कर्जदारों के लिए तो यह देनदारी में चूक का सा मामला है क्योंकि उन्होंने जिस संपत्ति पर ऋण दिया था वह बेमानी हो चुकी थी। अन्य लोगों ने भी कुछ बातों को ध्यान में रखते हुए ही इन शेयरों के बारे में अपनी राय बनाई होगी। बहरहाल उनके इस आकलन के बावजूद अगर इन कंपनियों को अचानक बंद कर दिया गया और इन पर कारोबार प्रतिबंधित हो गया तो इससे इन अंशधारकों को जबरदस्त नुकसान होना तय है।
अगर ऐसा कोई कदम उठाया जाता है तो संबंधित पक्षों को पहले नोटिस देना जरूरी है क्योंकि वे इससे प्रभावित होंगे। इसके बाद उनको एक मौका दिया जाना चाहिए ताकि वे अपनी बात सामने रख सकें। कम से कम यह उम्मीद तो थी ही कि कोई भी कदम उठाए जाने के पहले कम से कम व्यवस्थित जांच परख कर ली जाएगी। ऐसा करने से कम से कम निवेशक के संरक्षण का लक्ष्य तो पूरा होता। परंतु ऐसा कुछ नहीं किया गया। अगर महज इंटरनेट पर साधारण जांच परख से यह पता चल सकता है कि इनमें से कुछ कंपनियां सुचारु रूप से काम करने वाली, फायदे में चलने वाली और कर्ज लेने वाली कंपनियां हैं तो कम से कम इन पर शेल कंपनी होने का इल्जाम तो नहीं लगता।
वित्तीय बाजारों का इतिहास ऐसे निर्णयों के इतिहास से भरा हुआ है। अंतरिम उपाय के रूप में एकतरफा आदेश देना आम हो चला है और ये स्थायी उपाय का रूप लेते जा रहे हैं। ऐसे उपाय पांच-पांच साल तक चलते रहते हैं। अचानक झटका लगने और चकित करने वाले उदाहरण अब आसानी से नजर आने लगे हैं। महीने के बीच में अब डेरिवेटिव श्रेणी में प्रतिभूतियां पेश की जा रही हैं। ऐसे ही महीने के बीच में शेयरों को डेरिवेटिव से अलग भी किया जा रहा है। ऐसे तमाम उदाहरण देखने को मिल रहे हैं।
असामान्य और अप्रत्याशित निर्णय अक्सर जांच की मांग करते हैं। खासतौर पर तब जबकि उनमें कारोबार के कुछ असामान्य रुझान नजर आएं। अक्सर ऐसे मामलों में भेदिया कारोबार का आरोप लगता है और जांच आदि होती है। वास्तव में हाल ही में लिए गए एक एकतरफा निर्णय ने इससे जुड़े नाम वाले हर शख्स के बैंक खाते को रातोरात जब्त करा दिया। लोग कौड़ी-कौड़ी को मोहताज हो गए।
एक दूसरे तरह का जोखिम ऐसे दोहराव का है जो आगे चलकर रुझान का रूप ले लेता है। निजी फोरेंसिक रिपोर्ट (जिन्हें अक्सर अंकेक्षण और लेखा कंपनियां अंजाम देती हैं। उनके पास जांच का सही अनुशासन भी नहीं होता) के आधार पर ही नियामक एकतरफा निर्णय कर लेते हैं। आमतौर पर ये रिपोर्ट ऐसे स्पष्टïीकरण से भरी रहती हैं जो बतौर प्रमाण उनकी उपादेयता बहुत कम कर देते हैं। बहरहाल, मौजूदा समय में जब तक यह साबित होगा कि उनमें कोई ठोस वैधानिक प्रमाण नहीं हैं, तब तक व्यक्तिगत स्तर पर और संस्थानों का भी भरपूर नुकसान हो चुका होता है।
क्या इससे निपटने का कोई बेहतर तरीका है? निश्चित तौर पर अगर कोई खुद से बार-बार सवाल करे तो जवाब मिल जाएगा। आपातकालीन उपायों का बार-बार दोहराव उनको बेअसर कर देगा। विधि व्यवस्था की अवधारणा का मोल तब समझ में आता है जब प्रतिकूल परिस्थितियां मौजूद हों। बिना कठोर परीक्षण के नियम कायदों पर टिके रहना कोई बड़ी बात नहीं है। लेकिन अगर नियामकीय जांच परख की अनुपस्थिति हो और मनमानापन देखने को मिलने लगे तो कहा जा सकता है कि विधि के शासन का स्थान इंसानी शासन ने ले लिया। इससे कानून प्रवर्तन की विश्वसनीयता को बड़ा जोखिम उत्पन्न हो जाएगा।

Keyword: SEBI, shell company, regulator,
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