बिजनेस स्टैंडर्ड - आर्थिक मंदी और सुधार की प्रक्रिया
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आर्थिक मंदी और सुधार की प्रक्रिया

शंकर आचार्य /  August 20, 2017

आर्थिक गतिविधियों की गति सुधारने और नए रोजगार पैदा करने के लिए नीति निर्माता आखिर क्या कर सकते हैं। बता रहे हैं शंकर आचार्य

बीते एक वर्ष के दौरान देश के आर्थिक उत्पादन, निवेश और रोजगार के क्षेत्र में मंदी के प्रमाण लगातार बढ़ते नजर आए हैं। इससे यह सवाल पैदा हुआ है कि नीति निर्माताओं, खासतौर पर सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने और नए रोजगार सृजित करने पर ध्यान देना चाहिए।
मंदी :
आर्थिक वृद्धि से जुड़े आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2015-16 की चौथी तिमाही से वर्ष 2016-17 की चौथी तिमाही के दरमियान सकल मूल्य वर्धन (जीवीए) की वृद्धि दर में गिरावट आई तथा यह 8.7 फीसदी से घटकर 5.6 फीसदी पर आ गई। अधिकांश विश्लेषकों के मुताबिक बीती दो तिमाहियों में आई गिरावट नवंबर 2016 की नोटबंदी के चलते ही आई है। वे कहते हैं कि चूंकि आधिकारिक आंकड़ों में असंगठित क्षेत्र की सीधी जानकारी शामिल नहीं होती है (यह क्षेत्र गैर कृषि उत्पादन का एक तिहाई समेटे हुए है। गैर कृषि रोजगार का आधा हिस्सा यहीं है।) और नोटबंदी ने भी नकदी पर काम करने वाले असंगठित क्षेत्र को बहुत अधिक प्रभावित किया। उनका यहां तक कहना है कि आधिकारिक आंकड़ों में संभवत: दूसरी तिमाही और उसके बाद जीवीए वृद्धि दर को बढ़ाकर और हाल में इसमें आई गिरावट को कम करके आंका गया है।
दूसरा, जीवीए वृद्धि में गिरावट के साथ-साथ सकल जमा निवेश दर में भी गिरावट देखने को मिली है। यह दर 2015-16 की चौथी तिमाही के 28.5 प्रतिशत से घटकर वर्ष 2016-17 की समान तिमाही में 25.5 फीसदी रह गई। वास्तविक संदर्भों में देखें तो सकल जमा निवेश 2017 की चौथी तिमाही में एक साल पहले की तुलना में 2 फीसदी नीचे था। इतना ही नहीं नया औद्योगिक उत्पादन सूचकांक बताता है कि वर्ष 2017-18 के शुरुआती दो महीनों में पूंजीगत वस्तुओं के उत्पादन में 3 फीसदी की गिरावट आई। निकट भविष्य की बात करें तो सेंटर फॉर मॉनिटरिंग द इंडियन इकनॉमी (सीएमआई) और आरबीआई द्वारा जुटाए गए आंकड़े बताते हैं कि नई परियोजनाओं के लिए माहौल ठीक नहीं है। आरबीआई 2 अगस्त के अपने मौद्रिक नीति वक्तव्य में कहता है, 'पूंजीगत व्यय चक्र में आई कमजोरी नए निवेश की घोषणाओं को भी प्रभावित कर रही है। वर्ष 2017-18 की पहली तिमाही में यह 12 वर्ष के न्यूनतम स्तर पर आ गई। लंबित परियोजनाओं का क्रियान्वयन ठिठका हुआ है। बुनियादी वस्तुओं के उत्पादन में कमी आई है और कॉर्पोरेट क्षेत्र की स्थिति भी ठीक नहीं है।'
तीसरा, वर्ष 2015 में जब से राष्ट्रीय आय के आकलन की नई शृंखला जारी हुई है तब से जीडीपी और जीवीए के वृद्धि आंकड़ों में अहम विसंगति देखने को मिल रही है। इसके अतिरिक्त बैंक ऋण, सूची बद्ध कंपनियों की बिक्री और आय के आंकड़े, आईआईपी, सीमेंट उत्पादन, यात्री वाहनों की बिक्री आदि जैसे आर्थिक गतिविधियों के संकेतकों में भी विसंगति नजर आती है।
इनसे निकलने वाले संकेत राष्टï्रीय आय के आधिकारिक आंकड़ों से भी कमजोर प्रदर्शन की ओर इशारा करते हैं। इसी प्रकार अप्रैल-मई 2017 के आईआईपी आंकड़े केवल 2 फीसदी वृद्घि दर्शाते हैं। जून महीने में मूलभूत क्षेत्रों में बमुश्किल 0.4 फीसदी का विस्तार हुआ। इतना ही नहीं निक्केई-मार्किट पीएमआई की बात करें तो विनिर्माण और सेवा क्षेत्र मिलकर भी जुलाई में 46 पर ही रहा। गौरतलब है कि 50 से नीचे मंदी मानी जाती है। यह मार्च 2009 के बाद का न्यूनतम स्तर है। इसके लिए कुछ हद तक वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की नई व्यवस्था की ओर प्रस्थान को भी जिम्मेदार माना जा सकता है।
चौथी और सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि हमारे पास रोजगार के स्तर और रुझान को लेकर विश्वसनीय आंकड़े नहीं हैं। राष्टï्रीय नमूना सर्वेक्षण का अंतिम बड़ा नमूना 2011-12 का है। जब तक ताजा आंकड़े नहीं आते हैं तब तक हमें रोजगार क्षेत्र के अनुमान के लिए सीएमआईई के खुदरा सर्वेक्षण पर भरोसा करना होगा जो करीब 5 लाख वयस्कों पर आधारित है और जिसमें रोजगार और बेरोजगारी के आंकड़े 2016 के आरंभ से दर्ज करने शुरू किए गए।
इनसे पता चलता है कि जनवरी- अप्रैल 2017 के दरमियान असंगठित क्षेत्र समेत कुल रोजगार में सितंबर-दिसंबर 2016 तिमाही की तुलना में 15 लाख की गिरावट आई है। इतना ही नहीं सर्वेक्षण बताते हैं कि श्रम की भागीदारी की दर में भी उल्लेखनीय कमी आई है। ऐसी चिंताजनक गिरावट उत्पादन में मंदी के भी अनुरूप है। इसे भी नोटबंदी का असर माना जा सकता है।
मौजूदा रुझानों और नीतियों तथा नए जीएसटी सुधार के कारण उपजी बदलावपरक विसंगति को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि वर्ष 2017-18 में जीवीए वृद्घि के 6 फीसदी से अधिक  होने की कोई संभावना नहीं है। रोजगार में भी खासा इजाफा होता नहीं दिखता।

सुधार?
अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए क्या किया जा सकता है? मध्यम अवधि में जीएसटी, नई दिवालिया संहिता और सरकार की बैंकों की दोहरे बैलेंस शीट के घाटे और कर्जग्रस्त कंपनियों से निपटने की कोशिश जैसे ढांचागत सुधार तथा नए शिक्षा और कौशल, श्रम सुधार तथा भूमि सुधार आदि वृद्घि को गति दे सकते हैं। लेकिन इनसे अगले 12-18 महीनों में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं आएगा। निकट भविष्य के लिए हमें वृहद आर्थिक नीतियों पर ध्यान देना होगा।
राजकोषीय नीति इसकी कम ही संभावना नजर आती है। अगर केंद्र सरकार के बजट लक्ष्य हासिल भी हो जाते हैं तो भी राज्यों की स्थिति देखते हुए यही अनुमान लगाया जा सकता है कि वर्ष 2017-18 में संयुक्त  राजकोषीय घाटा जीडीपी के 7 फीसदी के आसपास रहेगा। इससे भविष्य में किसी तरह के कदम की संभावना कम हो जाएगी, जबकि केंद्र सरकार पहले ही सभी संभव कदम उठा रहा है। निश्चित तौर पर अल्पावधि के जीएसटी राजस्व से जुड़ी अनिश्चितताएं और विनिवेश प्राप्तियों में अस्वाभाविक कमी के चलते केंद्र सरकार के राजकोषीय लक्ष्यों से भटकाव हो सकता है।
मौद्रिक नीति इस नीति के तहत दरों में तेज कटौती का काम पहले ही किया जाना चाहिए था क्योंकि हाल के महीनों में खुदरा महंगाई में कमी आई है। लेकिन अर्थव्यवस्था में आपूर्ति क्षेत्र की दिक्कतों और दोहरी बैलेंस शीट की समस्या को देखते हुए कहा जा सकता है कि रीपो दर में आधा प्रतिशत तक की और कमी होने पर भी निवेश और वृद्धि दर में खास सुधार की अपेक्षा नहीं की जा सकती है।
विनिमय दर नीति यह वह क्षेत्र है जहां सरकार और आरबीआई की नीति में गंभीर खामी है। बीते 18 महीनों के दौरान लगातार रुपये का अधिमूल्यन हुआ है और यह सिलसिला अब भी जारी है। इससे वस्तुओं एवं सेवाओं के निर्यात पर भी नकारात्मक असर हुआ है और घरेलू उत्पादन की वृद्धि पर भी असर हुआ है। अधिक प्रतिस्पर्धी विनिमय दर के कई फायदे हैं। हम जीवीए और रोजगार के संदर्भ में जितनी जल्दी ये लाभ उठाएंगे उतना बेहतर होगा।

Keyword: economic slowdown, आर्थिक मंदी, reforms,
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