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भारतीय फिल्मों की समीक्षा के नई सच्चाइयों से रूबरू होने का वक्त

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  August 18, 2017

हाल ही में आई इम्तियाज अली की फिल्म 'जब हैरी मेट सेजल' रवानगी से भरपूर एक रोचक फिल्म है। यह दर्शकों को यूरोप के कई देशों की सैर पर लेकर जाती है। इसकी कहानी लीक से हटकर है जिसमें नायक (शाहरुख खान) नायिका (अनुष्का शर्मा) की सगाई की गुम हो चुकी अंगूठी तलाशने में मदद करता है। फिल्म का पहला हिस्सा आपको पूरी तरह बांध लेता है लेकिन दूसरा हिस्सा उतना सुगठित नहीं है। इसके बावजूद यह देखने लायक फिल्म है। जब यह फिल्म देखकर मैं सिनेमाघर से बाहर निकली तो मेरे चेहरे पर एक मुस्कान थी लेकिन मेरे जेहन में थोड़ी उधेड़बुन भी चल रही थी। मैं सोच रही थी कि आखिर समीक्षकों ने इस फिल्म को क्यों नकार दिया?

 
आलोचकों की तीखी टिप्पणियों के बाद सोशल मीडिया में भी इसे लेकर काफी नकारात्मक बातें कही जा रही थीं। ऐसा तब है जब इस फिल्म ने अपने प्रदर्शन के पहले सप्ताहांत में ही बॉक्स ऑफिस पर 100 करोड़ रुपये का आंकड़ा पार कर लिया। यह फिल्म विदेशी बाजारों में काफी अच्छा कारोबार कर रही है। विदेश में शाहरुख के प्रशंसकों की बड़ी तादाद है और गत 20 वर्षों में वैश्विक बाजारों से राजस्व जुटाने वाली फिल्मों में आधी से अधिक में शाहरुख मौजूद रहे हैं। वैसे इस लेख का संबंध एक फिल्म समीक्षक या फिल्म आलोचक की भूमिका पर है। आखिर उसका क्या काम होता है? उसका काम किस तरह से बदल रहा है? क्या समीक्षक अब भी प्रासंगिक बने हुए हैं? 
 
अगर आलोचकों की टिप्पणियों को मैंने तवज्जो दी होती तो जग्गा जासूस, जब हैरी मेट सेजल या एजेंट विनोद जैसी फिल्में मैंने नहीं देखी होतीं। मुझे हद से ज्यादा आंकी गई फिल्म बाजीराव मस्तानी और हिंदी मीडियम को पसंद करना चाहिए था। वैसे कभी-कभी मैं समीक्षकों की राय से सहमत भी होती हूं। अनारकली ऑफ आरा और दंगल वाकई में बेहतरीन फिल्में हैं।
 
सवाल यह है कि फिल्म समीक्षक कौन होता है? फिल्म अध्येता बारबरा एल बेकर ने 2016 में वेबसाइट कोरा पर बताया था कि फिल्म समीक्षा के तीन तरीके होते हैं। पहला तरीका लोकप्रियता या मनोरंजन पहलू का आकलन है। इस तरह की समीक्षाएं दर्शकों की टिप्पणियों या सुझावों के जरिये सामने आती हैं। यानी एक सफल फिल्म वह है जो ढेर सारा पैसा कमाती है। दूसरे तरीके का इस्तेमाल पेशेवर फिल्म समीक्षक करते हैं। समाचारपत्रों या पत्रिकाओं के लिए समीक्षाएं लिखने के लिए ये लोग फिल्म की गुणवत्ता मापने के तौर-तरीके आजमाते हैं। वे फिल्म को उसकी मौलिकता, दर्शकों के लिए प्रासंगिकता या फिल्म तकनीकों के उम्दा इस्तेमाल के आधार पर आंकते हैं। क्या कोई फिल्म आपको सोचने के लिए बाध्य करती है, भावनात्मक तौर पर उद्वेलित करती है या मानवीय संवेदनाओं के एक नए सिरे को उद्घाटित करने की कोशिश करती है, जैसे पैमाने पर ये आलोचक फिल्मों को तौलते हैं। उनका आकलन फिल्म की लोकप्रियता जैसे पहलू को पूरी तरह नजरअंदाज करता है।
 
तीसरे तरह के फिल्म आलोचक विश्लेषणात्मक प्रक्रिया का सहारा लेते हैं लेकिन यह विधा अक्सर शोध पत्रों और अकादमिक कार्यों के लिए इस्तेमाल की जाती है। स्पष्ट है कि पेशेवर भारतीय समीक्षकों का एक बड़ा हिस्सा फिल्म समीक्षा के दूसरे तरीके का ही इस्तेमाल करता है। वे समीक्षा के दौरान लोकप्रियता वाले पहलू पर शायद ही अधिक ध्यान देते हैं। सामाजिक परिप्रेक्ष्य को भी उनके एजेंडे में बहुत तवज्जो नहीं मिलती है। सूरज बडज़ात्या की 2006 में आई फिल्म विवाह को समीक्षकों ने उसके परंपरावादी मूल्यों के चलते उसे रूढि़वादी करार दिया था। अधिकतर समीक्षक सीधे-सपाट अंदाज में कहानी बयां करने वाली फिल्मों के प्रति पक्षपाती होते हैं। समीक्षक अस्तित्ववादी और सघन फिल्मों को लेकर भी आग्रही होते हैं।
 
बहरहाल जिस तरह समीक्षकों को अपनी पसंद और नजरिये के हिसाब से फिल्मों को आंकने का अधिकार है, उसी तरह दर्शकों को भी हक है। समस्या तब होती है जब दोनों में से कोई भी पक्ष अपनी चाहत को दूसरे पर थोपने की कोशिश करता है। अनुराग कश्यप की गैंग्स ऑफ वासेपुर सीरीज मुझे काफी पसंद आई थी लेकिन सिनेमाघर से निकलते समय ऐसा लगा कि इसमें कोई कहानी ही नहीं थी। हालांकि उन फिल्मों को ऊंची रेटिंग देने वाले समीक्षक दोस्त मेरी इस राय से इत्तफाक नहीं रखते हैं। क्या कोई ऐसी जगह हो सकती है जहां आलोचक, दर्शक, लोकप्रिय सिनेमा और बाजार सभी एक-दूसरे से तालमेल बिठा पाएंगे? सच तो यह है कि इस तरह की विषयनिष्ठ चर्चाओं में कभी भी स्पष्ट जवाब नहीं मिल पाते हैं। 
 
लंबे समय तक लोकप्रिय भारतीय सिनेमा को अधिकतर फिल्म समीक्षकों की टेढ़ी नजरों का सामना करना पड़ा। जब ब्रिटेन या अमेरिका के अध्येताओं ने भारतीय फिल्मों का अध्ययन शुरू किया और इसके अपने मुहावरों और शैली की तारीफ करनी शुरू की तब जाकर भारतीय लोगों में यह अहसास जगा कि गानों से सजी कहानी कहने का अपना तरीका भी सही है। सच तो यह है कि भारतीय सिनेमा दुनिया के कुछ फिल्म माध्यमों में से एक है जो बिना सरकारी मदद और संरक्षण के हॉलीवुड का मुकाबला कर रहा है।चीन में एक साल के भीतर केवल 34 विदेशी फिल्मों का ही प्रदर्शन हो सकता है। वहीं भारत में बनी फिल्में बिना किसी संरक्षण के भारतीय बाजार में अपना वर्चस्व बनाए रखने में सफल रही हैं। पिछले दशक में फिल्म कारोबार का स्वरूप नाटकीय रूप से बदला है, एक शिल्प के तौर पर भारतीय फिल्में पुरानी बंदिशों से आजाद हुई हैं जिसकी वजह से अब मसान और बदलापुर जैसी फिल्में बन पा रही हैं। भारतीय फिल्म उद्योग पहले की तुलना में अधिक प्रासंगिक हुआ है जो वैश्विक स्तर पर एक ताकतवर देश के तौर पर भारत की पहचान को भी पुख्ता करता है। ऐसे में क्या फिल्म समीक्षकों के लिए भी अपनी भूमिका नए सिरे से गढऩे का वक्त नहीं आ गया है?
Keyword: film, movie,,
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