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हिंद महासागर में विवाद बढऩे के आसार

नितिन पई /  August 17, 2017

भारत और चीन के बीच इन दिनों जो संबंध हैं वे दोनों देशों के बीच स्थायी प्रतिद्वंद्विता की पृष्ठïभूमि तैयार कर सकते हैं। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं नितिन पई 

 
भारत और चीन के सैनिकों के बीच डोकलाम में जो सैन्य गतिरोध इन दिनों देखने को मिल रहा है, उसे समझने और उससे निपटने का एक मॉडल हम भारतीयों के दिमाग में पहले से मौजूद हैं। भारत सरकार सन 1950 के दशक से ही हिमालय के कई इलाकों में सीमा विवाद से जूझ रही है। सन 1960 के दशक से सेना भी इसे लेकर जागरूक है और संसद में और सार्वजनिक जीवन में भी इसे लेकर बहस चलती रही है। 
 
हो सकता है हम इस बात पर सहमत नहीं हों कि क्या किया जाना है, यह भी हो सकता है कि हमने चीन के इरादों को लेकर गलत अनुमान लगाए हों लेकिन हमारे देश में हिमालयीन क्षेत्र को लेकर राजनेता, सरकारी अधिकारी और नागरिक समाज, तीनों की सोच स्पष्टï है। कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि इस संबंध में क्या किया जाए, इसे लेकर आम सहमति है लेकिन हमें ऐसी स्थिति से निपटने का अनुभव अवश्य है। 
 
परंतु हिंद महासागर क्षेत्र के बारे में यही बात नहीं कही जा सकती है। हमें नहीं पता है कि हमारे पूर्वी, दक्षिणी और पश्चिमी समुद्री क्षेत्र में चीन की ताकत से कैसे निपटना है। इसमें दो राय नहीं है कि हमारे सत्ता प्रतिष्ठïान का एक धड़ा वर्ष 2000 के मध्य से हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की मौजूदगी और उसके विस्तार पर नजर रखे हुए है लेकिन इस संबंध में कोई भी बहस सम्मेलन कक्षों से बाहर नहीं आई है। यहां तक कि सामरिक समुदाय में भी केवल कुछ ही लोगों ने हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की उभरती भूमिका की अवधारणा का चित्रण किया था। 
 
आमतौर पर कहा यही जाता है कि चीन हिंद महासागर में भारत को नियंत्रित करने के लिए 'स्ट्रिंग्स ऑफ पल्र्स (मोतियों की माला यह शब्द इस क्षेत्र में चीन की रणनीति के लिए इस्तेमाल होता है)' निर्मित कर रहा है। यह जुमला पेंटागन के लिए ऊर्जा सुरक्षा विषय पर तैयार की गई एक रिपोर्ट से लिया गया है। भारत को सीमित करने की धारणा से अलग इसका तात्पर्य दरअसल चीन के उन राजनीतिक और अन्य संबंधों से भी है जो वह संचार के समुद्री माध्यमों को सुरक्षित करने के लिए इस क्षेत्र में बना रहा है। खाड़ी देशों से ईंधन आयात करने के लिए वह इन्हीं माध्यमों का प्रयोग करता है। हमने इसे अप्रश्नेय ढंग से अपना लिया और अपनी समुद्री नीति को लेकर गंभीरतापूर्वक चर्चा करने लगे, यह हमारे वैचारिक दारिद्रय का एक उदाहरण है। 
 
डोकलाम के हालिया तनाव और हिमालय के मोर्चे पर तनाव बढऩे की आशंका के बीच भी हमें हिंद महासागर क्षेत्र की अधिक चिंता करनी चाहिए। कुछ ही वर्ष के भीतर चीन ने इस क्षेत्र में नौसैनिक क्षमता, ठिकाने और रिश्ते सभी कायम किए हैं। वह इस क्षेत्र में बड़ी समुद्री ताकत बनने के करीब है। इस रुतबे को हासिल करने के लिए वह भारत और अमेरिकी नौसेनाओं से भी जूझ जाएगा। इसकी शुरुआत हो चुकी है। भारतीय नौसेना अपने क्षेत्र में चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के युद्घ पोतों और पनडुब्बियों की तलाश कर रही है। आने वाला दशक कुछ अप्रत्याशित परिस्थितियों का साक्षी बनेगा क्योंकि दोनों नौसेनाओं का आमना-सामना बार-बार होगा। 
 
पश्चिमी प्रशांत सागर के उलट चीन हिंद महासागर क्षेत्र के किसी इलाके पर दावा नहीं कर सकता है। कम से कम अभी तो बिल्कुल नहीं। हालांकि हम नहीं कह सकते कि कब कोई पुराना नक्शा सामने आ जाए और चीन का दावा भी। ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि आखिर चीन हिंद महासागर क्षेत्र में अपना दबदबा क्यों कायम करना चाहता है? उसका लक्ष्य क्या है? 
पहली बात तो यह कि हिंद महासागर क्षेत्र में स्थायी मौजूदगी के साथ चीन अमेरिका तथा उसके पूर्वी एशियाई सहयोगियों को चुनौती दे सकेगा। अगर पीएलए के नौसैनिक पोतों को पश्चिम एशिया में या पूर्वी अफ्रीका की ओर जाना हो तो अपने देश से ऐसा करते हुए उनको कई ऐसे स्थानों से गुजरना होगा जो अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की नौसेनाओं की दृष्टिï से संवेदनशील हों। इसके लिए चीन को विदेशी सैन्य ठिकाने की आवश्यकता है। इन अड्डों पर युद्घपोत, विमान और सैनिक तैनात करके चीन क्षेत्र में तेजी काम कर सकेगा और पूर्वी एशियाई प्रतिद्वंद्वी देशों द्वारा बाधित होने से भी बचा रह सकेगा। हाल ही में उद्घाटित जिबूती सैन्य अड्डे और पाकिस्तान में ग्वादर तथा श्रीलंका में हम्बनटोटा बंदरगाहों पर नियंत्रण की मदद से चीन की नौसेना हिंद महासागर क्षेत्र में स्थायी अड्डïा निर्मित करने में कामयाब रही है।
 
दूसरा, बिना समुद्री नियंत्रण के चीन वैसी महाशक्ति नहीं बन सकता जैसी कि वह बनना चाहता है। ऐसे में उसे यह क्षमता विकसित करनी होगी कि वह ऐसे किसी भी देश से आगे रहे जो उसकी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं को चुनौती दे सकता है। अंतरराष्टï्रीय व्यवस्था को सुव्यवस्थित बनाने के इरादे से भी समुद्री शक्ति बहुत महत्त्वपूर्ण है। अब देखना यह होगा कि चीन पुरानी व्यवस्था में कुछ बदलाव चाहता है या अपनी नई व्यवस्था कायम करना चाहता है। 
 
तीसरी बात, समुद्री मार्ग चीन की समृद्घि के मार्ग बने रहे हैं और उसकी आर्थिक प्रगति में इनकी बहुत अहम भूमिका है। पूर्वी अफ्रीका और पश्चिम एशिया में राजनीतिक जोखिम लगातार बढ़ रहा है और चीन को अपनी ऊर्जा और व्यापार क्षेत्र की आपूर्ति को इन बढ़ती चुनौतियों से बचाने की आवश्यकता है। कुछ अन्य वजह भी हैं लेकिन ये तीनों वजहें सबसे अधिक अहम हैं। शुरुआती दोनों बिंदुओं पर भारत से टकराव लाजिमी है जबकि तीसरे मोर्चे पर सहयोग हो सकता है। बहरहाल, डोकलाम के बाद भारत और चीन के रिश्तों में समुद्री क्षेत्र में प्रतिद्वंद्विता की पृष्ठïभूमि तैयार है। भारत के लिए इसके तमाम निहितार्थ हैं लेकिन एक बात एकदम स्पष्टï है: हमें एक मजबूत और बड़े आकार की नौसेना की आवश्यकता होगी। भारत अगर हिंद महासागर क्षेत्र पर तवज्जो देने की सोचता भी है तो भी हम बिना भारतीय नौसेना को अधिक उन्नत बनाए उस दिशा में कुछ खास नहीं कर पाएंगे।
Keyword: india, china, navy,,
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