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संघर्ष के क्षण

संपादकीय /  August 17, 2017

जून तिमाही में कारोबारी आय के आंकड़ों में कोई उल्लेखनीय बात नजर नहीं आई। कंपनियों के शुद्घ मुनाफे में सालाना आधार पर 0.3 फीसदी की मामूली बढ़ोतरी दर्ज की गई है। जबकि इस अवधि में 4.4 फीसदी की राजस्व वृद्घि बीती छह तिमाहियों में सबसे धीमी है। हालांकि इसमें वित्त, तेल और गैस क्षेत्र की कंपनियां शामिल नहीं हैं लेकिन फिर भी ये कतई उत्साहजनक आंकड़े नहीं हैं। बैंक और ऊर्जा क्षेत्र की कंपनियों पर भी विचार किया जाए तो मुनाफे में वृद्घि और कमजोर नजर आती है। तब कुल शुद्घ मुनाफा 0.8 फीसदी तक घट गया जो तीन तिमाहियों की पहली गिरावट है। देश का उद्योग जगत विभिन्न मोर्चों पर चुनौतियों का सामना कर रहा है और जिंस तथा ऊर्जा क्षेत्र में कमजोर कीमतों का भी उसे कोई खास लाभ नहीं मिल सका है। 

 
बैंकिंग और तेल क्षेत्र की कंपनियों को छोड़ दिया जाए तो 1,261 कंपनियों के लिए कच्चे माल की लागत राजस्व के प्रतिशत के रूप में सालाना आधार पर 40 आधार अंक तक ऊपर गई। जबकि ऊर्जा की लागत 20 आधार अंक तक उछली। मूलभूत परिचालन मुनाफा मार्जिन सालाना आधार पर 90 आधार अंक कम हुआ। उपभोक्ता और वाहन उद्योगों की बात करें तो वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) व्यवस्था लागू होने के बाद डीलर के स्तर पर स्टॉक निपटाने के प्रयास और उपभोक्ताओं द्वारा खरीद टालने के चलते इस क्षेत्र पर असर पड़ा। व्यापक नमूने की बात करें तो 1,654 कंपनियों में सरकारी बैंकों पर एक बार पुन: असर पड़ा। परिसंपत्ति की गुणवत्ता और मुनाफा दोनों कमजोर हुए। दो प्रमुख क्षेत्रों, सूचना प्रौद्योगिकी और औषधि क्षेत्र ने अतीत में देश की वित्तीय सेहत पर काफी सकारात्मक प्रभाव डाला है लेकिन अमेरिकी नियामक द्वारा भारतीय कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई के चलते यह क्षेत्र भी प्रभावित हुआ। सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग की बात करें तो उसे मांग में कमी का सामना करना पड़ा। वहीं दूरसंचार कंपनियों को रिलायंस जियो के आगमन से तगड़ी चुनौती मिली। वहीं दूसरी ओर, निजी बैंक, गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियां और धातु तथा खनन क्षेत्र के फर्म अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन करने में सफल रहे। सीमेंट, विनिर्माण और इंजीनियरिंग कंपनियां भी बेहतर वृद्घि का आंकड़ा पेश करने में कामयाब रहीं। 
 
व्यापक स्तर पर देखें तो एक खास किस्म का रुझान उभरता नजर आ रहा है। बीते तीन सालों के दौरान सालाना अनुमान की शुरुआत दो अंकों की वृद्घि की बात के साथ होती आई है लेकिन इस वर्ष इसे घटाकर एक अंक में कर दिया गया। इसके अलावा इस वर्ष भी कई विश्लेषकों ने अनुमान जताया कि निफ्टी और सेंसेक्स में सूचीबद्घ कंपनियों के संयुक्त शुद्घ मुनाफे में वर्ष 2016-17 से 2018-19 के बीच 45 फीसदी तक की वृद्घि होगी। मौजूदा आंकड़ों को देखते हुए तो यह दूर की कौड़ी प्रतीत हो रही है। ऐसी भी चिंताएं हैं कि नोटबंदी और जीएसटी के आगमन के  कारण बाजार में जो विसंगति पैदा हुई है वह शुरुआती अनुमान की तुलना में कहीं ज्यादा है। खासतौर पर दूसरे और तीसरे दर्जे की कंपनियां इससे बुरी तरह प्रभावित हुई हैं। कुछ विश्लेषक पहले ही वर्ष 2017-18 में आय में कमी आने की बात कह रहे हैं। खासतौर पर बैंकिंग, धातु, औषधि और खनन क्षेत्र में। 
 
अगर वर्ष 2017-18 आय के मामले में विफल वर्ष साबित हुआ तो हमारे मौजूदा मूल्यांकन को उचित ठहराने के लिए केवल वर्ष 2018-19 की आय रह जाएगी। अगली तिमाही से बाजार का ध्यान उस पर केंद्रित होगा। शेयर बाजार में आई तेजी और मौजूदा मूल्यांकन से पता चलता है कि बाजार को आय में जल्द सुधार की उम्मीद है। परंतु उसके लिए मांग में तेज सुधार आवश्यक है।
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