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टाटा, बिड़ला और महिंद्रा का ही बचा दबदबा

कृष्ण कांत /  08 16, 2017

आजादी के 70 साल बाद भी परिवारों के कब्जे में भारतीय कॉर्पोरेट जगत

अंग्रेजों की गुलामी से वर्ष 1947 में आजादी मिलने के बाद भारत आर्थिक विकास के कई चरणों से होकर गुजरा है। लेकिन आजादी के सात दशक लंबे दौर में भी अर्थव्यवस्था में एक बात लगातार कायम रही है। भारत में परिवार के स्वामित्व वाले कारोबार का वर्चस्व बदस्तूर जारी है। अर्थव्यवस्था के तमाम क्षेत्रों में सक्रिय अधिकांश बड़ी कंपनियां पिछले 70 वर्षों में सरकारी नियंत्रण वाले उपक्रमों की संख्या बढ़ने के बावजूद अब भी परिवार के ही नियंत्रण में बनी हुई हैं। 

आजादी के बाद भारत ने मुक्त बाजार वाली अर्थव्यवस्था अपनाई थी लेकिन 1950 के दशक के मध्य में यह एक नियोजित अर्थव्यवस्था में तब्दील हो गया। नई व्यवस्था में निजी कंपनियों को सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों की तुलना में दोयम दर्जे की भूमिका निभाने के लिए बाध्य किया गया। लेकिन 1991 में आर्थिक नियोजन को त्याग कर बाजारवादी व्यवस्था अपना ली गई और एक बार फिर निजी क्षेत्र को मनचाहे तरीके से विकास करने की छूट मिल गई।

अर्थव्यवस्था के स्वरूप में हुए इन बदलावों ने समय-समय पर विजेताओं और पराजितों के अलग-अलग समूह खड़ा कर दिया। कुछ नई कंपनियां उभरकर सामने आईं तो कई पुरानी और अक्षम कंपनियों को पतन का दौर देखना पड़ा। मसलन, आजादी के सात दशक लंबे समय में केवल तीन कारोबारी समूह ही अपना ऊंचा स्थान बनाए रखने में सफल रहे हैं। ये टाटा, बिड़ला (अब आदित्य विक्रम बिड़ला) और महिंद्रा समूह हैं। इन तीनों समूहों को 1951 में देश के शीर्ष 20 कारोबारी समूहों में जगह मिली थी और अब भी वे देश के बड़े कारोबारी समूहों में अपना स्थान बरकरार रखे हुए हैं।

हालांकि आजादी के समय देश के शीर्ष 20 कारोबारी समूहों में शामिल रहीं कंपनियों में से केवल बजाज ही अपना स्थान बनाए रख पाया है। वर्ष 2017 की सूची में बजाज समूह को 18वां स्थान मिला है। आज के दिग्गज कारोबारी समूह-मुकेश अंबानी के नियंत्रण वाला रिलायंस, भारती, वेदांत, अदाणी, जेएसडब्ल्यू, ओपी जिंदल, विप्रो और सन फार्मा तो 1980 और 1990 के दशकों में हुए आर्थिक सुधारों की उपज हैं।

अर्थशास्त्रियों का कहना है कि यह बदलाव भारतीय अर्थव्यवस्था और उसके उद्यमी वर्ग की गतिशीलता को रेखांकित करता है। अर्थशास्त्री और बिज़नेस इतिहासकार रमन महादेवन कहते हैं, 'अगर आजादी के तत्काल बाद वाले आर्थिक माहौल से तुलना करें तो भारत का निजी क्षेत्र अब काफी गतिशील हो गया है।' वह कहते हैं कि भारतीय कॉर्पोरेट जगत के समकालीन इतिहास की एक खासियत यह है कि अब भी कारोबारी समूहों और कंपनियों पर नियंत्रण परिवारों का ही रहा है। 

आंकड़े भी इस दावे की पुष्टि करते हैं। परिवार के स्वामित्व वाली कंपनियां कॉर्पोरेट संपत्ति के बड़े हिस्से को नियंत्रित करती हैं और संगठित क्षेत्र में वे अच्छा-खासा राजस्व भी जुटाती हैं। आजादी के बाद सार्वजनिक क्षेत्र के व्यापक विस्तार के बावजूद यह प्रवृत्ति बनी हुई है। अगर 2016-17 के शीर्ष 20 कारोबारी समूहों की परिसंपत्तियों का आकलन करें तो परिवार के स्वामित्व वाले कारोबारी समूहों के पास करीब 84 फीसदी परिसंपत्तियां हैं। इसी तरह इन शीर्ष समूहों के कुल राजस्व में पारिवारिक नियंत्रण वाली कंपनियों की हिस्सेदारी 79 फीसदी है।

अगर सभी पंजीकृत कंपनियों की कुल परिसंपत्ति और राजस्व की गणना करें तो पिछले वित्त वर्ष में परिवार के स्वामित्व वाली कंपनियों का 60 फीसदी परिसंपत्ति और 55 फीसदी राजस्व पर अधिकार था। इसकी तुलना में वर्ष 2016-17 की इस अवधि में सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों की परिसंपत्ति हिस्सेदारी 30 फीसदी थी जबकि संस्थागत स्वामित्व वाली स्वतंत्र कंपनियों के पास आठ फीसदी हिस्सा था। 

यह विश्लेषण बीएसई 500, बीएसई मिडकैप और बीएसई स्मालकैप सूचकांकों में शामिल 820 कंपनियों के साझा नमूने पर आधारित है। कारोबारी घरानों को सूची में जगह उनके नियंत्रण वाली सूचीबद्ध कंपनियों की समेकित पूंजी के आधार पर दी गई है। टाटा और गोदरेज समूहों के आंकड़ों में इन समूहों की गैर-सूचीबद्ध कंपनियों टाटा संस और गोदरेज ऐंड बॉयस के 2015-16 के आंकड़ों को रखा गया है। बैंकों और वित्तीय सेवा कंपनियों के मामले में परिसंपत्तियों के बजाय उनकी हैसियत को आधार बनाया गया है।

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि परिवारों के नियंत्रण वाले समूहों के अब तक बचे रहने का श्रेय बदलते हुए आर्थिक माहौल एवं सरकारी नीतियों के अनुरूप खुद को ढालने की क्षमता को दिया जाना चाहिए। महादेवन कहते हैं, 'स्थापित कारोबारी समूहों ने औद्योगिक लाइसेंसिंग प्रणाली का इस्तेमाल कई उद्योगों में दूसरों को प्रवेश करने से रोकने के लिए किया और इस तरह नई पूंजी का प्रवाह भी बाधित किया।'

वर्ष 1970 के दशक में भारत में उद्यमी चरित्र का विस्तार हो रहा था। कारोबार में कदम रखने वाले इन उद्यमियों ने निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्र की बड़ी कंपनियों के आपूर्तिकर्ता के तौर पर अपना सफर शुरू किया था लेकिन अब इनमें से कुछ उद्यमियों के पास ऑटोमोबाइल, टिकाऊ खाद्य उत्पाद, धातु, मोबाइल फोन, औषधि और रसायन क्षेत्रों की कुछ दिग्गज कंपनियों का स्वामित्व है। 

हालांकि जो पुराने कारोबारी समूह बदलतेे हुए दौर को पहचान पाने में नाकाम रहे और कपड़ा एवं कृषि आधारित उपभोक्ता वस्तुओं के ही धंधे में लगे रहे, उन्हें धीरे-धीरे अपनी हैसियत गंवानी पड़ी। जहां तक टाटा और बिड़ला समूहों का वर्चस्व अभी तक कायम रहने का सवाल है तो उसमें पोर्टफोलियो की भूमिका काफी अहम है। जैसे, टाटा देश के शुरुआती समूहों में शामिल था जो कपड़ा क्षेत्र से निकल गए और फिर ऑटोमोबाइल एवं सूचना प्रौद्योगिकी जैसे उभरते क्षेत्रों में निवेश किया। उसी तरह बिड़ला ने भी सीमेंट, अलौह धातुओं और दूरसंचार क्षेत्र में बड़े-बड़े दांव लगाए। आज के समय में इन्हीं उद्योगों का उसके पोर्टफोलियों में वर्चस्व है।

हालांकि पिछले समय में परिवार के स्वामित्व वाले समूहों के सामने एक बार फिर हालात बदलने लगे हैं। इनमें से कई समूहों को घरेलू एवं वैश्विक वृद्धि दर में गिरावट के साथ भारी कर्ज की समस्या का भी सामना करना पड़ रहा है। इसी के साथ उन्हें नए उभरते उद्यमियों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों से भी चुनौती झेलनी पड़ रही है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि हाल-फिलहाल तो परिवारों के स्वामित्व वाली भारतीय कंपनियों के वर्चस्व को कोई खतरा नहीं है। भारतीय अर्थव्यवस्था में इन कारोबारी समूहों की जड़ें काफी गहराई तक फैली हैं।
Keyword: आजादी, परिवार, कॉर्पोरेट जगत, आर्थिक विकास, टाटा, बिड़ला, महिंद्रा, अंबानी, रिलायंस, भारती,
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