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मोदी के 'न्यू इंडिया' में बदल जाएगा रोजगार का स्वरूप

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  August 16, 2017

स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चौथे संबोधन को लाल किले के प्राचीर से दिए गए उनके सबसे छोटे भाषण के तौर पर याद किया जाएगा और चार खास वजहों से भी यह स्मरणीय होगा। उन्होंने लोगों से मिले सुझावों को ध्यान में रखते हुए 57 मिनट में ही अपना भाषण पूरा कर लिया। प्रधानमंत्री का 2014 में लाल किले से दिया पहला भाषण करीब 65 मिनट का था जिसमें नई योजनाओं और नारों की भरमार थी। हालांकि एक नई सरकार के मुखिया से इस तरह के भाषण की उम्मीद भी की जाती है। उन्होंने विनिर्माण के प्रोत्साहन के लिए मेक इन इंडिया अभियान, वित्तीय समावेशन के लिए जन-धन योजना, सफाई के बारे में जागरूकता लाने के लिए स्वच्छ भारत अभियान और कामगारों की दक्षता बढ़ाने के लिए स्किल इंडिया अभियान शुरू करने का ऐलान किया था। योजना आयोग को खत्म कर उसके स्थान पर नीति आयोग के गठन की भी घोषणा की गई थी। प्रधानमंत्री ने खुद को देश का 'प्रधान सेवक' बताते हुए कहा था कि वह राष्ट्रीय नीतियों, विकास और शासन पर ध्यान देने के लिए प्रतिबद्ध हैं। 

 
उसके बाद 2015 और 2016 में दिए गए उनके भाषण क्रमश: 86 और 94 मिनट लंबे रहे थे। उन दोनों ही भाषणों में उन्होंने नई योजनाओं की घोषणा के बजाय मौजूदा कार्यक्रमों के बेहतर क्रियान्वयन पर ही जोर दिया।  ग्रामीण भारत और किसानों की बेहतरी के लिए जरूरी कदम उठाने का जिक्र किया। विपक्षी दल उन पर धनी लोगों के लिए समर्पित 'सूट-बूट की सरकार' चलाने के आरोप लगा रहे थे लिहाजा ऐसे नजरिये की वजह समझी जा सकती है। पिछले दोनों साल के भाषणों में उन्होंने ग्रामीण भारत के लिए बनाई गई अपनी योजनाओं के बारे में अधिक बातें की। लेकिन भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन की जरूरत या राज्यों को पट्टïे पर जमीन देने की नीति शुरू करने के लिए मनाने या श्रम कानूनों को लचीला बनाने जैसे कदमों के बारे में कोई भी बात नहीं सुनाई दी थी।
 
मोदी ने लाल किले से दिए अपने चौथे भाषण में एक तरह से अपनी सरकार की विभिन्न उपलब्धियों का रिपोर्ट कार्ड पेश किया लेकिन सियासी नजरिये से भी यह काफी अहम है। अगले आम चुनाव में दो साल से भी कम समय रह जाने के बीच प्रधानमंत्री मोदी ने वर्ष 2022 तक देश को 'न्यू इंडिया' में तब्दील करने का एक नया एजेंडा भी रख दिया। उनके सपनों के इस भारत में सभी को आवास, बिजली और पानी मिलेगा, किसानों की आय दोगुनी हो जाएगी और युवाओं-महिलाओं के लिए नए अवसर पैदा होंगे तथा आतंकवाद और सांप्रदायिकता का खात्मा हो जाएगा, जाति-आधारित अपराधों का नामो-निशां नहीं होगा और भ्रष्टाचार एवं भाई-भतीजावाद का भी उन्मूलन हो जाएगा।
 
इन सभी लक्ष्यों से खुद मोदी एवं उनकी पार्टी की सत्ता में वापसी की संभावनाएं मजबूत होंगी। लेकिन न्यू इंडिया अभियान में स्वास्थ्य देखभाल या शिक्षण संस्थानों की क्षमता एवं गुणवत्ता सुधारने का कोई जिक्र न होना थोड़ा अटपटा है। हालांकि उन्होंने गोरखपुर के अस्पताल में मासूम बच्चों की दुखद मौत का जिक्र किया और रोजगार के इच्छुक लोगों को रोजगार देने की स्थिति में पहुंचाने की जरूरत भी बताई लेकिन स्वास्थ्य और शिक्षा की नीतियों में बदलाव के बगैर स्थिति नहीं सुधारी जा सकती है। लेकिन न्यू इंडिया कार्ययोजना में इन दोनों क्षेत्रों के लिए जरूरी कदमों पर चुप्पी साध ली गई।
 
मोदी के संबोधन में दूसरी अहम बात वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) में आगे और सुधार करने की प्रतिबद्धता है। उन्होंने ऐसे संकेत दिए हैं कि 1 जुलाई को लागू जीएसटी में आगे चलकर कुछ जरूरी सुधार किए जाएंगे। कई तरह की कर दरों में कटौती की जाएगी और अभी तक जीएसटी से बाहर रखे गए उत्पादों को भी इसके दायरे में लाया जाएगा। यह एक अच्छी खबर है।
 
तीसरी अहम बात, मोदी ने अपने भाषण में आधारभूत ढांचे से संबंधित परियोजनाओं के तीव्र क्रियान्वयन, नोटबंदी के असर और काले धन के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान का जिक्र किया। हालांकि नोटबंदी से हुए प्रत्यक्ष लाभ अब भी अस्पष्ट हैं लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि पिछले कुछ महीनों में टैक्स रिटर्न जमा करने वाले लोगों की संख्या बढ़ी है। इसके अलावा मुखौटा कंपनियों पर भी एक समन्वित तरीके से प्रहार किया जा रहा है। प्रधानमंत्री यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि वह काले धन को खत्म करने के अपने वादे के प्रति काफी गंभीर हैं। इस भाषण में बेनामी संपत्ति कानून लाने, नोटबंदी के बाद सामने आए काले धन और मुखौटा कंपनियों पर कार्रवाई का जिक्र दरअसल लोगों को यही संदेश देने के लिए हुआ है।
 
चौथी और अंतिम बात, ऐसा लगता है कि मोदी रोजगार पर अपनी सरकार की रणनीति में बदलाव कर रहे हैं। उन्होंने बड़े पैमाने पर लोगों को रोजगार देने का वादा किया था लेकिन सरकार की कोशिशों का मामूली असर ही दिख रहा है। मोदी सरकार रोजगार के नए अवसर नहीं पैदा कर पाई और कृत्रिम बुद्धिमत्ता एवं डिजिटल तकनीक के विस्तार ने उसकी चुनौतियां और भी बढ़ा दी हैं। सीएमआईई के नवीनतम सर्वेक्षण से पता चलता है कि बेरोजगारी दर लगातार बढ़ रही है। अगर अर्थव्यवस्था की धीमी पड़ती रफ्तार के साथ जोड़कर इसे देखा जाए तो करोड़ों युवाओं के लिए रोजगार सृजन एक सपना ही रह गया है।
 
इस संदर्भ में मोदी का यह बयान एक नीतिगत बदलाव की ओर इशारा करता है कि रोजगार के इच्छुक लोगों को अब रोजगार देने वाले के रूप में बदलना होगा। संभवत: प्रधानमंत्री मोदी को यह आभास हो चुका है कि अधिक युवाओं को रोजगार दे पाना काफी चुनौतीपूर्ण होगा। व्यावहारिकता ने उन्हें अपना रोजगार कर रहे लोगों के लिए अवसर पैदा करने पर ध्यान देने को कहा है ताकि ये लोग दूसरों को भी रोजगार दे सकें। इसके लिए स्व-रोजगार करने वाले लोगों को आगे चलकर जरूरी मदद देनी होगी। लेकिन सरकार की सोच में आए इस बदलाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। 
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