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आवास ऋण आकलन में छल-कपट और लूट

देवाशिष बसु /  08 16, 2017

एक दशक से अधिक समय से आरबीआई लगातार बैंकों को उनके ग्राहकों को लूटने में मदद कर रहा है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं देवाशिष बसु

मनीलाइफ फाउंडेशन से जुड़े स्वयंसेवक श्रीनिवास मराठे एक सेवानिवृत्त बैंकर हैं। सितंबर 2015 में उनकी पत्नी और बेटे ने एक सरकारी बैंक से 10 फीसदी की अस्थिर दर से आवास ऋण लिया। जब 1 मार्च, 2017 को उन्होंने बैंक से अपने ऋण पर लगने वाली ब्याज दर के बारे में जानकारी मांगी तो बैंक ने कहा कि यह दर 9.75 फीसदी है। जबकि इस अवधि में आरबीआई की रीपो दर 7.25 फीसदी से घटकर 6.25 फीसदी हो चुकी थी और बैंक की मानक आधार दर 10 फीसदी से गिरकर 9.75 फीसदी थी लेकिन बैंक ने मासिक किस्त में कोई कमी नहीं की थी।
 
सत्यम सावला ने सितंबर 2007 में एक निजी बैंक से आवास ऋण लिया था। उस वक्त बैंक की प्रमुख ऋण दर 14 फीसदी थी। अगस्त 2012 में उन्हें पता लगा कि उनकी ब्याज दर 17.5 फीसदी थी। यह दर उतनी ही ज्यादा थी जितनी कि आमतौर पर असुरक्षित ऋण की होती है। उनकी ईएमआई की तादाद भी 108 से बढ़ाकर 123 कर दी गई थी। जब उन्होंने बैंक से इस बारे में बात की तो नवंबर 2012 में दरों को कम करके 12.3 फीसदी किया गया जबकि ईएमआई की तादाद घटाकर 114 की गई।
 
सावला और मराठे दोनों की दलील थी कि आरबीआई ने बैंकों को इस बारे में व्यापक दिशानिर्देश जारी कर रखे हैं कि ऋण पर कैसे ब्याज लगाना है। जुलाई 2010 के मास्टर सर्कुलर में कहा गया है कि लंबी अवधि या तय अवधि के मौजूदा ऋण के मामले में बैंकों को अस्थिर दर को समीक्षा अवधि के मुताबिक या ऋण खातों के नवीनीकरण के वक्त नए सिरे से तय करना चाहिए। इसके लिए संबंधित ऋण लेने वाले की सहमति लेनी चाहिए। जाहिर है ऋण लेने वाले से संपर्क करने, उसकी सहमति हासिल करने और दरों को नए सिरे से तय करने की पूरी जवाबदेही बैंक की बनती है। एक अस्पष्ट और अनैतिक तंत्र खामोशी के साथ ग्राहक को तब तक लूटता रहता है जब तक कि वह सामने नहीं आता। 
 
जब सावला ने निजी बैंक से पूछा कि आखिर अब तक यह क्यों नहीं किया गया था तो बैंक ने कहा कि उसने उन्हें जो मंजूरी पत्र जारी किया था उसमें ऋण की समीक्षा के बारे में कुछ नहीं लिखा था। सावला ने यह मामला बैंकिंग लोकपाल के समक्ष उठाया जिसने आशा के अनुरूप ही कुछ खास नहीं किया। आरबीआई ने भी उनके सवालों का जवाब देने से इनकार कर दिया। जैसा कि मैं कई बार कह चुका हूं। हमारे देश में नियामकों का रुख उपभोक्ताओं के प्रतिकूल है।
 
ये दोनों घटनाएं बताती हैं कि दरअसल देश के लाखों आवास ऋण लेने वालों के साथ क्या होता है। मीडिया दरों में हर कटौती के बाद उत्साहित होकर उनको बताता है कि आवास ऋण सस्ता हो गया है। लेकिन कटु सत्य यह है कि बैंकों के लिए अस्थिर दर भी तय बनी रहती है जबकि दरें लगातार कम होती रहती हैं। इसके बावजूद वे दरों में कटौती नहीं करते। लेकिन जब दरों में इजाफा होता है तो वे तत्काल उन्हें बढ़ा देते हैं। यहां सवाल यह पैदा होता है कि क्या जो लोग तत्काल अपने बैंक से दरें कम करने को कहते हैं क्या उनको भी उचित परिणाम मिल पाता है? 
 
मराठे एक बैंकर थे और गणितीय आकलन में पारंगत हैं। उन्होंने ब्याज को लेकर आरबीआई के दिशानिर्देश का अध्ययन किया और तमाम वेबसाइटों पर जाकर हर सूचना जुटाई जो ऋण दर से ताल्लुक रखती थी। उन्होंने जो कुछ पाया वह इस प्रकार है:
 
अधिकांश बैंकों द्वारा घोषित आधार दर में 1 जनवरी, 2015 के बाद से अब तक 50 आधार अंक से अधिक का बदलाव नहीं आया है। जबकि आरबीआई ने दरों में तेजी से कटौती की है। तथ्य तो यह है कि रीपो दर 1 जनवरी, 2015 के 8 फीसदी से घटकर अब 6 फीसदी पर आ गई है। आरबीआई ने 1 अप्रैल, 2016 के एमसीएलीआर (मार्जिनल कॉस्ट ऑफ लेंडिंग रेट) जारी की। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि उसे आभास हो गया था कि बैंक रीपो दर में बदलाव के आधार पर ब्याज दरों में कमी करने के इच्छुक नहीं दिख रहे। बहरहाल, मराठे ने बैंक से जो बातचीत की उससे यह स्पष्ट हुआ कि बैंक ने ये दिशानिर्देश अपनी विभिन्न शाखाओं को दो माह की देरी से मुहैया कराए।
 
अधिकांश बैंकों ने या तो ग्राहकों को दरों में बदलाव के बारे में कोई जानकारी ही नहीं दी थी या फिर चुनिंदा ढंग से जानकारी प्रदान की थी। सावला कहते हैं कि संबंधित निजी बैंक ने उन्हें कोई सूचना नहीं दी। इन दिनों जबकि हम कागज रहित बैंकिंग की ओर बढ़ रहे हैं, बैंक आसानी से उनको एसएमएस या ईमेल के जरिये सूचना दे सकता था। खासतौर पर तब जबकि बैंक दरों में इजाफे को लेकर उनसे संवाद करता रहता था।
 
मराठे शंका जताते हैं कि बैंक एमसीएलआर का सही आकलन करने में आरबीआई के दिशानिर्देश का पालन नहीं कर रहे हैं और इस तरह ग्राहकों पर अनावश्यक  रूप से ऋण का अतिरिक्त बोझ लाद रहे हैं। उन्हें यकीन है कि बैंक फंसे हुए कर्ज की वसूली उनसे अतिरिक्त शुल्क वसूल करके करने का प्रयास कर रहे हैं जबकि वह समस्या उनके अपने गलत ऋण संबंधी निर्णय और भ्रष्टाचार की देन है। अपनी बात को सही ठहराने के लिए उन्होंने सात बैंकों में सूचना के अधिकार का प्रयोग किया लेकिन अधिकांश मामलों में वह कोई जानकारी पाने में नाकाम रहे। जब ग्राहक बैंकों से दर कम करने के लिए संपर्क करते हैं तो उन पर मनमाना शुल्क थोपा जाता है।
 
आरबीआई ने भी इस लूट में बैकों की मदद करने का जज्बा लगातार दिखाया है। इसकी शुरुआत वर्ष 2008 में हुई जब बैंकों ने नए ग्राहकों को कम ब्याज दर की पेशकश शुरू की। वर्ष 2010 में आरबीआई ने बैंकों से कहा कि वे ऋणों को दोबारा तय करें। लेकिन इससे संबंधित परिपत्र में कहा गया कि बीपीएलआर व्यवस्था के अधीन लिए जा रहे मौजूदा ऋण अपनी परिपक्वता अवधि तक जारी रह सकते हैं। अगर मौजूदा ग्राहक नई व्यवस्था अपनाना चाहते हैं तो उनको इसका विकल्प दिया जाना चाहिए और इस बदलाव के लिए कोई शुल्क नहीं लिया जाना चाहिए। एमसीएलआर के अधीन यह लूट पूरी हो गई जब अंतिम वाक्य भी हटा दिया गया। अब यह एकतरफा लूट हो गई। चूंकि कर्ज लेने वाले दबाव समूह में नहीं आते हैं और उनको इसका अंदाजा नहीं कि उन्हें कितना नुकसान हो रहा है इसलिए कोई शोरगुल भी नहीं है।
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