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नाकाम नीति

संपादकीय /  August 16, 2017

इस वर्ष मई में 2016-17 की चौथी तिमाही में बैंक के निराशाजनक प्रदर्शन की घोषणा करते हुए भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) की चेयरपर्सन अरुंधती भट्टïाचार्य ने कहा था कि निकट भविष्य में 'थोड़ा और कष्टï सहन करना पड़ सकता है। चौथी तिमाही के नतीजे एसबीआई, पांच संबद्घ बैंकों और भारतीय महिला बैंक (बीएमबी) के विलय के बाद के पहले नतीजे थे। यह विलय की सरकार की समावेशन की कोशिश का नतीजा था। इस विलय के बाद एक ओर जहां देश का सबसे बड़ा बैंक दुनिया के शीर्ष 50 बैंकों में शामिल हो गया, वहीं फंसे हुए कर्ज (एनपीए) के संदर्भ में बैंक की ताकत काफी कम हो गई। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही के नतीजे बीते शुक्रवार को घोषित हुए तो पता चला कि जिसे थोड़ा और कष्टï कहा जा रहा था वह दरअसल एक बड़ा कष्ट था। 

 
प्रथम दृष्टïया पता लगता है कि देश के सबसे बड़े बैंक के समेकित शुद्घ मुनाफे में तीन गुना का इजाफा हुआ। परंतु अकेले एसबीआई के मुनाफे में 20 फीसदी की गिरावट आई। इतना ही नहीं एसबीआई के पोर्टफोलियो में संदिग्ध कारोबारी ऋण विरासत से जुड़े हुए थे। विलय के बाद इसका आकार बढ़कर कुल ऋण के 10 फीसदी के बराबर हो गया। जबकि शुद्घ फंसे हुए कर्ज का आकार तिमाही आधार पर  3.7 फीसदी से बढ़कर 6 फीसदी हो गया। केवल एसबीआई के फंसे हुए कर्ज की प्रोविजनिंग सालाना आधार पर बढ़कर 91 फीसदी हो गई। आश्चर्य नहीं कि परिसंपत्ति की गुणवत्ता में आई गिरावट के लिए कमजोर बैंकों के साथ विलय जिम्मेदार रहा। ऐसा भी नहीं कि एसबीआई के लिए केवल यही एक चिंता है। बैंक को अभी भी फंसे हुए कर्ज वाले 12 बड़े कॉर्पोरेट खातों के 50,000 करोड़ रुपये के जोखिम के बदले 30,000 करोड़ रुपये की राशि जुटानी है। 
 
देश के जमा का करीब 23 फीसदी हिस्सा भी एसबीआई के पास जाता है। इसके बावजूद जून तिमाही में इसकी ऋण वृद्घि की दर घटकर 1.5 फीसदी रह गई। ऐसी स्थिति से बनने वाले दबाव से बचने के लिए एसबीआई ने हाल ही में अपने जमाकर्ताओं के लिए ब्याज दर कम कर दी है। एसबीआई के इस पूरे किस्से में सरकार के लिए सबक छिपे हैं। सरकार अभी हाल तक प्रतीक्षा कर रही थी कि सरकारी बैंक अपने पहली तिमाही के नतीजे घोषित करें ताकि वह समावेशन की प्रक्रिया को आगे बढ़ा सके। इससे पहले न्यू बैंक ऑफ इंडिया के पंजाब नैशनल बैंक में विलय, और ग्लोबल ट्रस्ट बैंक के ओरियंटल बैंक ऑफ कॉमर्स में विलय जैसे उदाहरणों में हम देख चुके हैं कि कैसे बेहतर बैंक का प्रदर्शन भी गड़बड़ा जाता है। यह सरकार की विलय की खराब योजनाओं का उदाहरण है।
 
एसबीआई का उदाहरण एक बार फिर यही तस्वीर दिखाता है। भविष्य के विलय की संभावना इस बात से भी सीमित होती है कि एसबीआई के उदाहरण के उलट अन्य मामलों में विवाद और कार्य संस्कृति का अलगाव ज्यादा हो सकता है और इसलिए परिचालन स्तर पर एकरूपता लाने में कहीं अधिक कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है। उदाहरण के लिए अगले विलय के बाद बने बैंक का भौगोलिक दायरा बड़ा होता है तो इसके साथ ही साथ सांस्कृतिक अंतर भी पैदा होता है। सच तो यह है कि एक ओर जहां सरकारी बैंकों का समावेशन कागज पर बेहतर प्रतीत होता है, वहीं हकीकत में यह उतना बेहतर साबित नहीं होता है। देश के सरकारी बैंक इस समय कहीं अधिक गहरी समस्या का सामना कर रहे हैं और विलय इसका हल नहीं हो सकता है। इसके हल के लिए जरूरी है कि इन बैंकों में नए सिरे से पूंजी मुहैया कराई जाए और संचालन के स्तर पर सुधार किए जाएं। ऐसा करने से ही बैंक अपनी गलती दोहराना बंद करेंगे।
Keyword: bank, loan, debt, भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई),
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