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आर्थिक मंदी और सुधार के कारक

अजय शाह /  August 13, 2017

आर्थिक गिरावट के मौजूदा दौर से निकलने का एक तरीका यह भी है कि 15 वर्ष पुराने उपायों पर नजर डाली जाए और उनका अनुसरण किया जाए। विस्तार से बता रहे हैं अजय शाह 

 
वर्ष 2011 के बाद से हम लगातार मंदी के दौर से जूझ रहे हैं। सवाल यह है कि आखिर इसका अंत कैसे होगा? अगर हम सन 1990 के दशक की पिछली गंभीर मंदी पर नजर डालें तो बेहतर होगा। हम विभिन्न फर्मों से निजात पाकर, उनकी उत्पादकता सुधारकर, नीति निर्माताओं पर यकीन करके और वैश्विक सुधार के चलते उससे उबरने में कामयाब रहे थे। इससे हमें एक मोटा अंदाजा भी मिलता है कि हम इस मंदी के दौर से कैसे उबर सकते हैं। इस बार हम विभिन्न फर्मों के निजीकरण, दिवालिया सुधार तथा निस्तारण आयोग की मदद से इससे निपट सकते हैं।
 
सन 1990 के दशक के मध्य में ऋण में जबरदस्त उछाल आई थी। बैंकिंग नियमन ठीक नहीं था इसलिए बैंकों ने फंसे हुए कर्ज दिए और हम बैंकिंग संकट में फंस गए। अगस्त 1997 में एशियाई संकट की शुरुआत हुई। आरबीआई ने जनवरी 1998 में दरों में 200 आधार अंकों का इजाफा कर दिया ताकि रुपये को बचाया जा सके। इसका असर घरेलू अर्थव्यवस्था पर हुआ। इसके बाद सूचना प्रौद्योगिकी का बुलबुला फूटा और अमेरिका में आतंकी हमला हुआ। यह संकट सन 1997 से 2002 तक चला। आखिरकार भारत ने बेहतरीन वापसी की। सन 2002 से 2007 के बीच सूचीबद्ध गैर वित्तीय, गैर तेल कंपनियों की शुद्ध बिक्री में 2.5 गुना सुधार हुआ। यह वास्तविक संदर्भों में 20 फीसदी की औसत सालाना वृद्धि थी।
 
इतिहास अपने आप को दोहराता ही नहीं है बल्कि कई बार वह बेहद काव्यात्मक ढंग से ऐसा करता है। सन 2004 से 2008 तक हमने ऋण वृद्धि देखी। बैंकिंग नियमन की खामियों के चलते एक बार फिर बैंकों ने फंसा हुआ कर्ज बांटा और हम संकट में फंस गए। सन 2013 में रुपये को बचाने के लिए आरबीआई ने दरों में 400 आधार अंकों की वृद्धि की। इसका घरेलू अर्थव्यवस्था पर बुरा असर हुआ। इस समय सूचीबद्ध गैर वित्तीय, गैर तेल कंपनियों की वृद्धि नकारात्मक है। यह सिलसिला वर्ष 2011 से जारी है। बाहरी मांग को लेकर जो भी अनुमान हैं वे भू राजनैतिक जोखिम के शिकार हैं क्योंकि दुनिया भर में राष्ट्रवाद का उभार हो रहा है।
 
पिछली बार अर्थव्यवस्था में नाटकीय सुधार कैसे आया? इस कहानी का पहला तत्त्व था विभिन्न फर्मों से निजात पाना। हजारों फर्में कारोबार से बाहर हो गईं। उन दिनों कारोबार से बाहर होने का तात्पर्य प्रत्यक्ष तौर पर दिवालिया होना नहीं था। हजारों कंपनियों ने या तो परिचालन बंद कर दिया या उनका आकार बहुत छोटा हो गया। इससे प्रतिस्पर्धा कम हुई। बची कंपनियों ने उत्पादकता बढ़ाई। बचने वालों के सामने कोई आसान विकल्प नहीं था। सीमा शुल्क दरें और एफडीआई की बाधाएं खत्म हो रही थीं। उन्होंने पूरा ध्यान उत्पादकता पर दिया। उस वक्त भारतीय कंपनियों में बदलाव के कई प्रमाण मौजूद हैं। बेहतर प्रक्रियाएं और बढिय़ा प्रबंधन इसका उदाहरण हैं। नीति निर्माताओं की स्थिति सुखद नहीं थी। अर्थव्यवस्था की कठिनाइयों को लेकर हलचल थी और इन दबावों ने आर्थिक सुधार की राह बनाई। टीमें गठित कर कई जटिल सुधार किए गए। इनमें बैंकिंग संकट को हल करना, शेयर बाजार सुधार, नई पेंशन योजना, एनएचएआई, दूरसंचार सुधार और कर नीति सुधार शामिल थे। 
 
इन टीमों ने गहन सुधार पर ध्यान दिया। उदाहरण के लिए यूटीआई संकट के बाद पड़े बोझ का बंटवारा करदाताओं और यूटीआई उपभोक्ताओं के बीच आधा-आधा किया गया। पुराने यूटीआई अधिनियम को बदला गया और उसके अहम हिस्से का निजीकरण किया गया। इससे यूटीआई की समस्या का स्थायी निदान निकल आया। इसी तरह शेयर बाजार सुधार में बंबई और कलकत्ता स्टॉक एक्सचेंज की बदला ट्रेडिंग की पुरानी व्यवस्था खत्म की गई और डेरिवेटिव ट्रेडिंग की शुरुआत हुई। इससे देश के शेयर बाजार की स्थिति मजबूत हुई। इसी प्रकार दूरसंचार सुधार में देश के दूरसंचार क्षेत्र का नियंत्रण सरकारी कंपनियों से परे किया गया और निजी और विदेशी कंपनियों ने दस्तक दी। इससे भी क्रांतिकारी बदलाव आया। सुधारों की यह सफलता अपने आप में महत्त्वपूर्ण थी। सबसे अहम बात थी इनसे जुड़ी अपेक्षाएं। देश और विदेश में निजी क्षेत्र ने देश के नीति निर्माताओं का इज्जत देना शुरू किया। एक टीम जो आज राजमार्ग बनाने में सिद्धहस्त है वह भविष्य में विमान तल और रेलवे बनाना सीख सकती है। एक टीम जो शेयर बाजार बना सकती है वह भविष्य में बॉन्ड-करेंसी-डेरिवेटिव का गठजोड़ भी बना सकती है।
 
अमेरिका में हुए आतंकी हमले के बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था ने करवट ली और 2007 तक अच्छा सुधार देखने को मिला। मजबूत भारतीय कंपनियां इस अवधि में अंतरराष्ट्रीय मांग को पूरा करने में सक्षम थीं। इससे घरेलू मांग की स्थितियां और आशावाद प्रभावित हुए। भारतीय कंपनियां अब निर्यात कर रही थीं और बहुराष्ट्रीय निगम तैयार कर रही थीं। आशावाद का आकलन निजी क्षेत्र द्वारा सीएमआईई कैपेक्स डाटा में घोषित परियोजनाओं के आधार पर किया जाता है। इन परियोजनाओं का आकार वर्ष 2003 के 5 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2007 तक 30 लाख करोड़ रुपये हो गया था। हालांकि वर्ष 2017 तक इसमें कुछ कमी आ चुकी है। संक्षेप में कहें तो भारत 2002 के बाद वापसी चार वजहों से कर सका: कंपनियों का निर्गम, बची कंपनियों की उत्पादकता में सुधार, नीतिगत प्रतिष्ठानों की प्रतिष्ठा और वैश्विक सुधार। इससे हमें मोटामोटा अंदाजा तो मिल ही जाता है कि मौजूदा संकट से निकलने के लिए क्या कुछ किए जाने की आवश्यकता है।
 
इसमें विभिन्न फर्मों से निजात पाना एक बेहतर विकल्प है। द इंसॉल्वेंसी ऐंड बैंकरप्सी कोड (आईबीसी) एक आधा अधूरा सुधार है जो वास्तव में कंपनियों के निर्गम की गति बहुत तेज कर सकता है। निजीकरण की प्रक्रिया इस दिशा में अहम लाभ दिला सकती है। विभिन्न फर्मों का बाहर निकलना श्रम, पूंजी और जमीन को भी मुक्त करेगा। इससे इनकी लागत में कमी आएगी और बची कंपनियों को आसानी होगी।
 
कई कंपनियां ऐसी होती हैं जो अपने बलबूते नहीं चल सकतीं। उनको बैंक या सरकार की बाहरी मदद से जिंदा रखा जाता है। वे वस्तुओं और सेवाओं की बिक्री कृत्रिम रूप से कम कीमत पर करती हैं। यह बात स्वस्थ कंपनियों के मुनाफे को प्रभावित करती है। अगर सरकार एयर इंडिया से अपना हाथ खींच लेती है या बैंक उन कंपनियों की मदद बंद कर देते हैं जो उनकी मदद पर ही निर्भर हैं तो इसका फायदा क्षेत्र की उन कंपनियों को मिलेगा जो बची हैं और अपने बूते पर कारोबार कर रही हैं। ये लाभ हासिल करने के लिए चार मोर्चों पर काम करना होगा: निजीकरण, आईबीसी, निस्तारण निगम और बैंकिंग नियमन में सुधार।
Keyword: economy, आर्थिक मंदी,
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