बिजनेस स्टैंडर्ड - बिजली दरों पर बदलने लगा राज्यों का दिल
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बिजली दरों पर बदलने लगा राज्यों का दिल

ज्योति मुकुल और श्रेया जय /  08 10, 2017

हाल-ए-बिजली

कंपनियों का कहना है कि कई राज्यों में बिजली खरीद के पुराने समझौते खत्म करने से निवेशकों के बीच उनकी साख प्रभावित होगी

बड़ी बिजली परियोजनाओं को पहले जहां कम टैरिफ के कारण वित्तीय संकट का सामना करना पड़ा था लेकिन अब ज्यादा टैरिफ उनके लिए परेशानी का सबब बन रहा है। राज्यों के बिजली खरीद समझौतों से पलटने के कारण देश की कई बिजली कंपनियां अनिश्चितता के दौर से गुजर रही हैं। हाल तक राज्य प्रतिस्‍पर्धी बोली में तय दरों पर खुशी-खुशी बिजली खरीद रहे थे। यह व्यवस्था जनवरी 2011 से लागू हुई थी। लेकिन अब उन्हें लगता है कि खासकर अक्षय ऊर्जा की दरें बहुत ज्यादा हैं। उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने कोयला आधारित 7 परियोजनाओं के साथ कुल 7,040 मेगावाट बिजली खरीद के समझौते रद्द कर दिए। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि ये परियोजनाएं तय समय पर बिजली उत्पादन शुरू करने में नाकाम रहीं। इन परियोजनाओं पर कुल 35,000 करोड़ रुपये का निवेश हुआ है।

राज्य सरकार ने साथ ही 3,800 मेगावाट के बिजली खरीद समझौते भी रद्द कर दिए क्योंकि इन समझौतों के तहत बिजली की कीमत स्पॉट मार्केट से ज्यादा थी। राज्य की पिछली समाजवादी पार्टी सरकार ने 3.2 रुपये से 5 रुपये प्रति यूनिट की दर से 5,056 मेगवाट बिजली खरीदने के लिए दिसंबर 2015 में इन समझौतों पर हस्ताक्षर किए थे। इसके अलावा उत्तर प्रदेश नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा विकास एजेंसी ने 215 मेगावाट बिजली खरीदने के लिए कंपनियों से दरों में कटौती करने को कहा है। यह समझौता करीब दो साल पहले हुआ था। एजेंसी का कहना हे कि राज्य बिजली नियामक ने 7.02 रुपये से 8.60 रुपये की दर पर बिजली खरीदने को मंजूरी नहीं दी है। बोली के समय टेंडर के लिए बेंचमार्क रेग्यूलेटेड टैरिफ 9.33 रुपये था।

जबसे भारतीय सौर ऊर्जा निगम की 1,000 मेगावाट की निविदा में 3.46 रुपये की बोली लगी है, आंध्र प्रदेश की वितरण कंपनियां पवन ऊर्जा के लिए दो साल पहले हुए खरीद समझौतों में संशोधन की मांग कर रही हैं। अगर दरों में कटौती होती है तो इससे 6,000 करोड़ रुपये का निवेश बुरी तरह प्रभावित हो सकता है। दूसरे राज्यों में भी बिजली खरीद की दरों में कटौती की मांग बढ़ रही है। कर्नाटक में राज्य बिजली नियामक ने 400 मेगावाट के खरीद समझौते रद्द करके कम दरों पर फिर से समझौता करने को कहा है। नियामक ने 3.46 रुपये की दर से एक पवन ऊर्जा परियोजना की लागत प्रति मेगावाट 4.50 करोड़ रुपये निकाली। स्थानीय अंतर के लिए 10 फीसदी समायोजन के बाद उसने कहा कि 4.80 करोड़ रुपये एक मेगावाट क्षमता की स्थापना के लिए पर्याप्त पूंजी है। झारखंड ने 1,200 मेगावाट सौर ऊर्जा खरीदने के लिए 2016 में निविदा आमंत्रित की थी लेकिन उसने प्राप्त दर पर अनुबंध पर हस्ताक्षर नहीं किए। राज्य सरकार चाहती है कि निविदा जीतने वाली कंपनियों दरों पर दोबारा बातचीत करे।

दूसरी तरफ मध्य प्रदेश सरकार अक्षय ऊर्जा की प्राथमिकता खत्म करना चाहती है। इससे कई कंपनियां मुसीबत में पड़ जाएंगी क्योंकि राज्य प्राथमिकता के आधार पर उनसे बिजली नहीं खरीदेगा। राज्य के बिजली विभाग के एक वरिष्ठï अधिकारी ने कहा, 'हमने वर्ष 2016-17 के लिए 96 फीसदी पवन ऊर्जा और 117 फीसदी सौर ऊर्जा खरीद दायित्व पूरा कर लिया है। लेकिन हमारे पास 3,000 मेगावाट अतिरिक्त बिजली है, इसलिए हमने नियामक से अनुरोध किया है कि अक्षय ऊर्जा के लिए आसान रोड मैप दिया जाए।'

पहले के उलट अब राज्य बिजली नियामक भी दरों में संशोधन की वितरण कंपनियों की मांग पर सकारात्मक रुख दिखा रहे हैं। वर्ष 2013 में सोलर पैनल की कीमतों में भारी गिरावट के मद्देनजर गुजरात ऊर्जा विकास निगम ने खरीद समझौतों पर फिर से बातचीत की मांग की थी। लेकिन बिजली अपीलीय पंचाट ने उसकी अपील को खारिज कर दिया था। बिजली क्षेत्र की कंपनियों का कहना है कि राज्यों के खरीद समझौतों पर हस्ताक्षर करने के बाद इनसे मुकरने से निवेशकों के बीच उनकी छवि प्रभावित होगी। उनका कहना है कि उत्तर प्रदेश सरकार महज 165 मेगावाट बिजली खरीदने के लिए फिर से बातचीत करना चाहती है जबकि उसने अगले 5 साल में 10 गीगावाट से अधिक सौर ऊर्जा क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा है। यह समझ से परे है।

फीडबैक कंसल्टिंग के प्रमुख (बिजली, तेल एवं गैस) रुद्रनील रॉयशर्मा कहते हैं, 'राज्यों की बिजली की भारित औसत लागत पर विचार करना चाहिए। उदाहरण के लिए 3.46 रुपये प्रति यूनिट की दर पर पवन ऊर्जा को उच्च लागत बिजली के साथ रखा जा सकता है। वितरण कंपनियों को बिजली को उस तरह डिजाइन करना चाहिए और निविदाओं को रद्द नहीं करना चाहिए।'

उनका कहना है कि बिजली की दरों को संशोधित करने की प्रवृत्ति से न केवल निवेशकों का विश्वास डगमगाएगा बल्कि जिन मामलों में निर्माण शुरू हो चुका है वहां अग्रिम लोन गैर निष्पादित परिसंपत्तियों में बदल जाएगा। दुनिया के दूसरे देशों की बात करें तो स्पेन और यूनान ने पिछली तारीख से फीड इन टैरिफ में बदलाव किया है और अक्षय ऊर्जापर कर लगाए हैं। चीन ने भी अक्षय ऊर्जा अधिभार संग्रह और वितरण व्यवस्था में बदलाव के लिए साल 2009 में अपने अक्षय ऊर्जा नियमों में बदलाव किया था। अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं की बिजली की अतिरिक्त लागत की पूर्ति औद्योगिक और वाणिज्यिक उपभोक्ताओं द्वारा दिए जाने वाले अधिभार से होती है। वितरण कंपनियां फिर इसे सब्सिडी के तौर पर अक्षय ऊर्जा उत्पादकों को देती है। 

रॉयशर्मा कहते हैं, 'जब बिजली की कमी चरम पर थी तो सरकार ने स्वतंत्र बिजली उत्पादकों को संयंत्र लगाने के लिए आमंत्रित किया था। लेकिन द्वितीय बाजार में कीमतें गिरने से खरीद समझौतों का पालन नहीं किया जा रहा है।' उन्होंने कहा कि खरीद समझौतों को रद्द करने के बजाय जिन मामलो में कोयला खदानों के कारण उत्पादन में देरी हुई है, उनमें सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ईंधन आपूर्ति समझौते बरकरार रहने चाहिए।

वितरण कंपनियों के ऋण के पुनर्गठन के लिए शुरू की गई उदय योजना में केंद्र सरकार इनाम और दंड वाली नीति अपना रही है। राज्य चाहते हैं कि वितरण कपंनियां दरों में बढ़ोतरी करें या फिर पारेषण और वितरण नुकसान पर काबू करके लागत कम रखें और महंगी बिजली खरीदने से परहेज करें। उन्होंने कहा कि अक्षय ऊर्जा के साथ समस्या यह है कि देश ने इसे अपनाना शुरू कर दिया है जबकि इसकी तकनीक अभी विकास के दौर में है। वह कहते हैं कि कई कंपनियां इस क्षेत्र में घुसने के लिए रिटर्न के महज एक फीसदी दर पर बोली लगा रही हैं। अचानक अतिरिक्त क्षमता का जुडऩा बंद हो जाएगा क्योंकि बाजार में बहुत ज्यादा बुलबुला है। अलबत्ता एक वितरण कंपनी के वरिष्ठï अधिकारी ने कहा कि जब तक वितरण कंपनियां रहेंगी तब तक अक्षय ऊर्जा का अस्तित्व बना रहेगा।

रॉय शर्मा ने कहा कि इस दलदल से निकलने का एक रास्ता यह है कि उच्च लागत वाली बिजली को व्यवहार्यता अंतर फंडिग (वीजीएफ) मुहैया कराई जाए। केंद्र सरकार ने 175 गीगावाट अक्षय ऊर्जा लक्ष्य रखा है जिससे इसकी लागत में कमी आई है। बिजली खरीद के समझौते रद्द करना से न केवल यह पता चलता है कि अब कई राज्यों की सरकारों इन अनुबंधों का पालन करने की च्छिुक नहीं रह गई हैं बल्कि इससे प्रतिस्पद्र्घी बोली आधारित बिजली दर के कारगर होने पर भी सवाल खड़े होते हैं। राज्यों में कोयला-आधारित बिजली परियोजनाओं के प्रति अनिच्छा का पैदा होना नुकसानदेह हो सकता है।
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