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एक नई और कामयाब दूरसंचार नीति

श्याम पोनप्पा /  August 10, 2017

वर्ष 2018 में नई और मजबूत दूरसंचार नीति के लिए स्थायित्व भरी और एकीकृत नीति की आवश्यकता है जो वास्तविकता का सामना कर सके। विस्तार से जानकारी दे रहे हैं श्याम पोनप्पा

 
सरकार ने आखिकार जुलाई में यह घोषणा कर ही दी कि अंशधारकों से चर्चा के उपरांत नई दूरसंचार नीति (एनटीपी-2018) मार्च 2018 तक पेश कर दी जाएगी। इस सिलसिले में हमें सक्षम और सहयोगी नीतियों की आवश्यकता है जो जनहित में हों। सरकार को इन्हीं नीतियों पर ध्यान देना और इनको आगे बढ़ाना चाहिए। कोशिश यही होनी चाहिए कि यह किसी धमकी की शिकार न हो जाए, न ही इसे सरकार का राजस्व बढ़ाने, विकृत हितों की पूर्ति जैसी बातों पर केंद्रित होने देना चाहिए। 
 
विभिन्न क्षेत्रों और संभावित मांग की तात्कालिक समीक्षा से यह पता चलता है कि हमें किन जरूरतों को पूरा करने की आवश्यकता है। दूरसंचार क्षेत्र के सेवा प्रदाताओं पर 4.6 लाख करोड़ रुपये का उच्च ब्याज दर वाला कर्ज है। यह कर्ज स्पेक्ट्रम नीलामी के दौरान लगी आक्रामक बोली, का नतीजा है। घटते ब्याज और कीमतों की जंग ने समस्या को और गंभीर कर दिया। इस बीच बेहतर पहुंच और आपूर्ति तथा गहन और विस्तारित इस्तेमाल के पूरे फायदे के लिए नेटवर्क में निवेश की तत्काल आवश्यकता है। इसके लिए पूंजी, सक्षम नीतियों और व्यवस्थित बाजार की जरूरत पड़ेगी। इन तमाम कमियों के चलते दुनिया का सबसे सफल संचार बाजार बनने की क्षमता रखने वाला भारतीय बाजार संकट में आ गया। इसके बजाय, भारत का संचार उद्योग एक हद तक ढहने के कगार पर पहुंच गया है। इसके लिए पुरातनपंथी नीतियां और व्यवहार, अस्थायित्व भरा वित्तीय मॉडल, विभिन्न स्कैंडल और असंगत प्रतिस्पर्धा जिम्मेदार है।
 
अब दूरसंचार विभाग और तमाम सरकारी एजेंसियों के लिए भविष्य की सबसे बेहतर राह यही है कि वे लक्ष्यों को मिलकर व्याख्यायित करें और आपसी मशविरे से ऐसी नीतियां तैयार करें जो एक प्रभावी और मजबूत क्षेत्र विकसित कर सकें। 
एनटीपी-2018 को लेकर कुछ सुझाव इस प्रकार हैं। 
 
एनटीपी-2018 के लक्ष्य 
1. नेटवर्क: अधिकतम क्षमता का इस्तेमाल / प्रवाह क्षमता
 
प्रवाह क्षमता बढ़ाकर नेटवर्क का अधिकतम इस्तेमाल सुनिश्चित करना। इसके लिए जरूरी है कि निवेश की गई पूंजी का जनहित के लक्ष्यों की पूर्ति के लिए अधिकतम इस्तेमाल किया जाए तथा अन्य वैकल्पिक संगठनात्मक स्वरूप खंगाले जाएं। इसमें सरकारी भागीदारी की मदद से यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और साझा हित का ध्यान रहे। संचार के लिए व्यवस्थित बाजार और प्रतिस्पर्धा आवश्यक हैं। हालांकि एक सीमा से परे जाकर देखें तो टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं और गैर पूंजी प्रोत्साहित क्षेत्रों से इतर इस क्षेत्र में जो आवश्यक है जरूरी नहीं कि वह रचनात्मक भी हो।
 
2. स्पेक्ट्रम आवंटन और प्रबंधन: अधिकतम प्रवाह
 
संचार सुविधा के लिए अधिकतम बेतार प्रवाह का प्रयोग करना होगा। इस क्रम में बड़े बैंड में कम लागत पर अधिक स्पेक्ट्रम की उपलब्धता सुनिश्चित कराने जैसे काम किए जा सकते हैं। इसके अलावा सेवा प्रदाताओं और उनके समूह आपसी विचार विमर्श कर स्पेक्ट्रम की पूलिंग और उसकी द्वितीयक साझेदारी जैसे काम कर सकते हैं।
 
3. वित्तीय रुख: राजस्व साझेदारी का इस्तेमाल
 
स्पेक्ट्रम तथा नेटवर्क अधिकारों, उपयोग तथा अन्य सरकारी शुल्कों की क्षतिपूर्ति के लिए राजस्व साझेदारी का इस्तेमाल। ठीक उसी तरह जैसे सन 1999 की राष्ट्रीय दूरसंचार नीति में लाइसेंस शुल्क के साथ किया गया।
 
कुछ चीजों से बचें
 
1. उपशामक उपाय
 
नीतियों से छेड़छाड़ करना आसान होता है और बड़े व्यवस्थित बदलाव करना मुश्किल। ऐसे में एक आसान रास्ता यह होगा कि प्रतिस्पर्धा और मुक्त बाजार की समझ को अपनाया जाए और अपेक्षा की जाए कि सब ठीक हो जाएगा। मिसाल के तौर पर सरकार ने एक अंतर मंत्रालयीन समूह की स्थापना की ताकि दूरसंचार क्षेत्र का वित्तीय दबाव कम किया जा सके। इस समूह ने अनुशंसा की कि तय भुगतान 10 से 16 साल की अवधि में लिया जाए और ब्याज दरों को 12 फीसदी से घटाकर 8 फीसदी कर दिया जाए। ऐसी बातों को एनटीपी 2018 का आधार बनाया जा सकता है। इस बीच यह अपेक्षा की जा सकती है कि बाजार में बदलाव आएगा और समावेशन से अपर्याप्त कवरेज और आपूर्ति की समस्या हल होगी। इससे होगा बमुश्किल यह कि लंबी अवधि में सेवा प्रदाता का भुगतान दोबारा निर्धारित होगा। परंतु ढांचागत समस्या बनी रहेगी क्योंकि अपर्याप्त नेटवर्क कवरेज, तकनीकी बाधाओं आदि को वायरलेस फाइबर और कम विकिरण वाले छोटे सेल्स से लाभान्वित होने की संभावना कम है।
 
2. मशविरों पर भरोसा और पूर्वनियोजित विचारों से दूरी 
 
एनटीपी-2018 को लेकर ऐसे वक्तव्य उचित नहीं हैं कि यह ऐप निर्देशित होगा न कि संचार निर्देशित। बल्कि इनको गलत भी कहा जा सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि सेवाओं की प्रभावी आपूर्ति के लिए संचार ही सबसे अहम है। संचार की कमी न केवल ग्रामीण और अद्र्धशहरी इलाकों में हैं बल्कि घने शहरी इलाकों में भी ऐसा ही है। बल्कि संचार की अनदेखी करना भारत के रुख में शामिल रहा है। नेटवर्क और बुनियादी ढांचा विकसित करते समय भी इस पर पूरा ध्यान नहीं दिया जाता। जरूरत इस बात की है कि नेटवर्क को अधिक व्यापक पहुंच वाला बनाया जाए। देश के संचार जगत की यह आवश्यकता है। फिर चाहे मामला ब्रॉडबैंड का हो या नैरोबैंड इंटरनेट ऑफ थिंग का। अगर ऐसा नहीं किया गया तो यह वैसे ही होगा जैसे बिना पाइपलाइन के नेटवर्क या बिना पर्याप्त वितरण नेटवर्क के बिजली।
 
3. प्रतिस्पर्धा विरोधी विसंगति
 
विसंगति हमारे संचार क्षेत्र की हकीकत है। दरअसल यह पूरा उलझाव भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग और भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण का है। जानकारी के मुताबिक प्रतिस्पर्धा आयोग ने जोर देकर कहा है कि प्रतिस्पर्धा अधिनियम 2002 आक्रामक मूल्य, रसूखदार स्थिति और प्रासंंगिक बाजारों को परिभाषित करता है। ये सब इसके दायरे में आते हैं। यह भी कि इसने इस ढांचे को बीते आठ सालों में दूरसंचार समेत तमाम क्षेत्रों में लागू किया है।
 
टर्फ  का मुद्दा भारत में विशिष्ट नहीं है और दुनिया के तमाम देशों में उसे हल किया जा चुका है। कंज्यूमर यूनिटी ऐंड ट्रस्ट सोसाइटी के महासचिव प्रदीप मेहता कहते हैं कि वर्ष 2011 में एक समिति ने प्रतिस्पर्धा अधिनियम में संशोधन करके यह प्रावधान अनिवार्य करने को कहा था कि जरूरत पडऩे पर आयोग और क्षेत्रीय नियामक के बीच सलाह-मशविरा हो। 
यहां प्रश्न यह है कि अगर दूरसंचार क्षेत्र की वास्तव मेंं निगरानी हो रही थी तो यहां ऐसी विसंगति की इजाजत कैसे दी गई? मीडिया रिपोर्ट से यह स्पष्ट नहीं होता है कि उपयुक्त नियमों की कमी है अथवा दबदबे और आक्रामक कीमतों को लेकर सीसीआई या ट्राई के आकलन में। इस मामले में बिना जमीनी हालात का आकलन किए विकसित देशों को नजीर बना लिया गया। जरा इस धारणा पर विचार कीजिए कि दबदबे के लिए बाजार हिस्सेदारी या महत्त्वपूर्ण बाजार शक्ति एक अहम घटक है। बहरहाल एक विकासशील अर्थव्यवस्था में अगर एक बड़ा समूह एक नए क्षेत्र में निवेश करता है तो वह शून्य हिस्सेदारी के बावजूद महत्त्वपूर्ण बाजार शक्ति साबित हो सकता है क्योंकि उसका आकार और उसके संसाधन बहुत बड़े हैं। वह आर्थिक दृष्टि से बहुत अधिक शक्तिशाली हो सकता है। यूरोपीय आयोग भी वित्तीय संसाधनों तक प्राथमिकता वाली पहुंच, आर्थिक आकार और दायरे तथा प्रवेश बाधाओं आदि सभी का जिक्र करता रहा है। वर्ष 2018 में एक मजबूत एनटीपी लाने के लिए जरूरी है कि नीतियों को सुसंगत और स्थायी बनाया जाए। ये नीतियां हमारी जमीनी हकीकतों के अनुकूल होनी चाहिए न कि अकादमिक आधार पर बनाई जानी चाहिए।
Keyword: telecom, दूरसंचार trai,,
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