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अगले 2-3 साल में जीएसटी की समीक्षा संभव : पानगड़‍िया

एके भट्टाचार्य /  08 09, 2017

बीएस बातचीत

मौजूदा स्वरूप में वस्तु एवं सेवा कर में कई तरह की विसंगतियां हैं। नीति आयोग के निवर्तमान उपाध्यक्ष अरविंद पानगड़‍िया ने एके भट्टाचार्य के साथ साक्षात्कार में कहा कि कई मामलों में कच्चे माल पर अंतिम उत्पाद से ज्यादा कर है। वह इस बात पर सहमत हैं कि कई मामलों में सरकार को समझौता करना पड़ा लेकिन उन्होंने साथ ही कहा कि 3 साल में इन विसंगतियों को दूर किया जाएगा। संपादित अंश...

नीति आयोग में आपके कार्यकाल के दौरान नोटबंदी और जीएसटी जैसे साहसिक फैसले लिए गए। भारतीय अर्थव्यवस्था में उन्हें किस तरह लागू किया गया है?

मैंने इन दोनों फैसलों का मजबूती से बचाव किया है। नोटबंदी का मुख्य उद्देश्य भ्रष्टाचार पर लगाम लगाना था। अगर आप इसके क्रियान्वयन की बात करें तो पहले कभी इस तरह का कदम नहीं उठाया गया था। इसलिए शुरुआत में कुछ अनिश्चितता थी लेकिन जैसे-जैसे चीजें सामने आती गईं, सरकार ने उस हिसाब से कदम उठाए। यह एक प्रक्रिया थी और अब हमें इसका अनुभव हो गया है। अगर कोई देश ऐसा कदम उठाना चाहे तो वह भारत के अनुभव का इस्तेमाल कर सकता है। नोटबंदी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को आगे बढ़ाया है। अब बहुत लोग आय कर रिटर्न भर रहे हैं। साथ ही संदिग्ध बैंक खातों की संख्या बढ़ गई है। मुझे पूरा विश्वास है कि अगर किसी को 8 नवंबर, 2016 से पहले भ्रष्टाचार से लडऩे के प्रधानमंत्री के संकल्प पर संदेह था तो अब उसे उनके वादे पर भरोसा हो जाएगा।

जीएसटी पर आप क्या कहेंगे?

जीएसटी कड़े संघर्ष का परिणाम है। आपको राज्यों और केंद्र सरकार को साथ लाना पड़ा, जीएसटी परिषद बनाया गया, सभी हितधारकों के बीच आम सहमति बनाई गई, संविधान में संशोधन किया गया और इससे होने वाले नुकसान की भरपाई के उपाय किए गए। मुझे लगता है कि आगे इसमें और कदम उठाए जाएंगे। दो-तीन साल में हमें इसकी समीक्षा करनी चाहिए और यह देखना चाहिए कि क्या हम कर की दरों में समानता ला सकते हैं। अलग-अलग दरों के कारण करों में बहुत फेरबदल हो गया है। कई मामलों में कच्चे माल पर अंतिम उत्पाद से ज्यादा कर है।

जीएसटी का प्रमुख सिद्धांत यह है कि हम टैक्स इनपुट यूजर नहीं चाहते हैं। यह गंतव्य आधारित कर है यानी मूल्य वर्धित कर, जहां आपको इनपुट पर किसी भी कर से बचना चाहिए ताकि आप उत्पादन को बाधित न करें। आप अधिक से अधिक उत्पादन कर सकते हैं और अंतिम खपत पर राजस्व एकत्र कर सकते हैं। फिलहाल जिस तरह जीएसटी लागू किया गया, इसमें कई इनपुट टैक्स जुड़े हैं। वित्त मंत्री इससे वाकिफ हैं और वह देेखेंगे कि इन विसंगतियों को कैसे दूर किया जा सकता है। 

नोटबंदी के आलोचकों का कहना है कि इससे फायदा कम हुआ है और नुकसान ज्यादा?

मुझे अब भी लगता है कि आलोचकों ने जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया दिखाई और लागत को बढ़ाचढ़ाकर पेश किया। जब आप पैसों की आपूर्ति रोकते हैं तो कीमतों में गिरावट आनी चाहिए थी। सच्चाई यह है कि कीमतों का लगभग उसी दर से बढ़ना बदस्तूर जारी रहा। साथ ही सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की दर भी 7.1 फीसदी रही जो पिछले साल 8 फीसदी थी।

संभवत: अनौपचारिक क्षेत्र पर इसका ज्यादा असर रहा ...

पहले काले धन को तेजी से सफेद में बदला जाता था। चार्टर्ड अकाउंटेंटों और दूसरे लोगों की मदद से ऐसा किया जाता था। अगर अमीर लोग ऐसा कर सकते हैं तो फिर वैध लेनदेन करने वाले लोग भी इस राह पर चल सकते हैं। काला धन रखने वाले लोगों में कानून का डर होना चाहिए। अगर आप दिल्ली के बाजारों में जाते तो आपको पता चलता कि वहां लेनदेन के कई तरीके मौजूद थे। और 2,000 का नया नोट जल्दी ही आ गया था। एक बार मैंने एक दुकानदार को 2,000 रुपये का नोट दिया और उसे खाता बनाने को कहा। इस तरह यह एक तरीके का अनौपचारिक ऋण बाजार है। आप अग्रिम भुगतान करते हैं और जब जमा की हुई 2,000 रुपये की राशि खत्म हो जाती है तो आप फिर 2,000 रुपये का दूसरा नोट देते हैं। इस तरह की भी शिकायतें थी कि नोटबंदी का गांवों में गरीब सबसे अधिक प्रभावित हुए। गांवों में कितने लोग रोजाना बड़े नोटों का इस्तेमाल करते हैं? वे छोटे नोट इस्तेमाल करते हैं और मुझे पता है कि रिजर्व बैंक ने ग्रामीण इलाकों में छोटे नोटों की आपूर्ति के लिए विशेष प्रयास किया था। 

नीति आयोग के उपाध्यक्ष के तौर पर आप अपनी सबसे बड़ी 3 उपलब्धियां क्या मानते हैं?

पहली उपलब्धि यह है कि हम नीति आयोग को नीति निर्माण के एक प्रमुख केंद्र के रूप में स्थापित करने में सफल रहे। जब मैं आया तो मेरे मन में कई तरह की आशंकाएं थीं। मैं शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ा था। इस काम में सरकारी प्रयास, अर्थतंत्र, आम सहमति निर्माण और कई दूसरी चीजें जुड़ी हुई थीं। लेकिन आज मैं पूरी तरह संतुष्ट हूं।

दूसरी बात यह है कि जब हमने शुरुआत की थी तो हमें राज्यों से उस तरह मदद नहीं मिली जैसी योजना आयोग को मिला करती थी। हमें अलग तरह से अपने संबंध बनाने पड़े। हमें यह साबित करना पड़ा कि हमारे पास कुछ अच्छे सुझाव हैं और हम राज्यों की विकास की प्रक्रिया में उनके साझेदार बन सकते हैं। इस दिशा में हमने उल्लेखनी प्रगति की है।

तीसरी उपलब्धि यह है कि हमने आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों के साथ मिलकर काम किया। राज्यों में हमने कृषि में मार्केटिंग सुधारों को लेकर अच्छी प्रगति की है। इसी तरह हम केंद्र की 18-20 बीमार कंपनियों के बंद करने के करीब हैं। इसी तरह निजीकरण के क्षेत्र में भी हम अपने स्तर पर आगे बढ़ रहे हैं। कंपनियों की बिक्री नहीं हुई है क्योंकि यह काम वित्त मंत्रालय को करना है। चिकित्सा शिक्षा में सुधार के मामले में हमने एक विधेयक तैयार किया है। हमने भारतीय चिकित्सा परिषद की जगह राष्ट्रीय स्वास्थ्य आयोग बनाने का प्रस्ताव दिया है। साथ ही हमने होम्योपैथी में सुधार पर भी काम किया है। हम उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी काम कर रहे हैं और मुझे उम्मीद है कि मेरे जाने से पहले हम कुछ और उपलब्धियां हासिल कर लेंगे। 

नीति आयोग अपने पूर्ववर्ती योजना आयोग से किस तरह अलग है?

दो मायनों में यह अलग है। पहला यह कि योजना आयोग पंचवर्षीय योजना बनाकर उन्हें क्रियान्वित करता था। हमने क्रियान्वयन एजेंडा बनाया जो सुधारात्मक, दूरगामी तथा व्यापक है। दूसरा राज्यों के संबंध में है। योजना आयोग फंड आवंटित करता था और इस तरह वार्षिक योजना के तौर तरीकों को निर्धारित करता था। नीति आयोग में हम राज्यों का दौरा करते हैं। मैं, हमारे मुख्य कार्याधिकारी और सदस्य लगातार राज्यों के दौरे कर रहे हैं और उन्हें अपने विकास को आगे बढ़ाने के लिए सुझाव दे रहे हैं।पिछले कुछ हफ्तो में रुपया काफी मजबूत हुआ है जो निर्यात और घरेलू विनिर्माण क्षेत्र के लिए अच्छी खबर नहीं है। इसी तरह मुद्रास्फीति की गिरती दरों के अनुरूप व्याज दर में पर्याप्त कटौती नहीं की गई है। इन दो मुद्दों पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?सैद्धांतिक तौर पर मैंने हमेशा विनिमय दर नीति और मौद्रिक नीति पर प्रतिक्रिया करने से परहेज किया है क्योंक यह रिजर्व बैंक का मामला है। 

अगर आपको नीति आयोग छोड़ने से पहले कोई संदेश देना हो तो यह क्या होगा? 

हम सभी को भारत के लिए काम करना चाहिए। प्रधानमंत्री इसके लिए काम कर रहे हैं और हम सभी को अपनी तरफ से इसमें योगदान करना चाहिए।
Keyword: जीएसटी, नीति आयोग, अरविंद पानगड़‍िया, साक्षात्कार, समझौता, नोटबंदी, अर्थव्यवस्था, भ्रष्टाचार,
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