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तमाम भ्रमों से इतर अपेक्षाकृत बेहतर है मौजूदा जीएसटी

कराधान
सुकुमार मुखोपाध्याय /  August 09, 2017

वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को लागू हुए एक माह से अधिक वक्त बीत चुका है। इसे लागू करने की प्रक्रिया उम्मीद से कहीं अधिक आसान थी। परंतु अर्थशास्त्रियों, विश्लेषकों, उद्योग जगत तथा कारोबारियों आदि ने इसकी काफी आलोचना भी की है जिस पर मैं यहां चर्चा करना चाहता हूं। अर्थशास्त्रियों के रुख की बात करें तो मुझे यह देखकर काफी आश्चर्य हुआ कि उनमें जीएसटी को लेकर समझ की काफी कमी है। एक सुप्रसिद्घ अर्थशास्त्री ने एक संगोष्ठïी में कहा कि दुनिया में कनाडा के रूप में केवल एक संघीय देश में जीएसटी लागू है। शायद उनको जानकारी नहीं है कि ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया, रूस और चीन जैसे देशों में मूल्यवर्धित कर (वैट)/जीएसटी लागू हैं। 

 
सच तो यह है कि ब्राजील सन 1967 में वैट लागू करने वाला दुनिया का पहला देश बना था। कुछ अन्य अर्थशास्त्रियों के मन में एक आम भ्रम यह भी है कि अधिकांश देशों में वैट लागू है, जीएसटी नहीं। यह धारणा भी गलत है। वैट के दो अर्थ हैं। इसका तात्पर्य केवल कर की दर से है, मसलन 12 फीसदी या 18 फीसदी। इसका एक अर्थ और है: यह वस्तुओं और सेवाओं के मूल्यवर्धन पर लगने वाला कर है। इसलिए इसे या तो वैट कहा जा सकता है या जीएसटी। इस लिहाज से देखा जाए तो जीएसटी अपने आप में वैट भी है।
 
एक परिस्थिति ऐसी भी है जहां वैट, जीएसटी नहीं होता। उस वक्त सेवाएं इसमें शामिल नहीं होती हैं केवल वस्तुएं इसमें शामिल होती हैं। 30 जून 2017 तक देश के राज्यों में यही स्थिति थी। अब देश में जो जीएसटी लागू है उसे वैट भी कहा जा सकता है। ध्यान देने वाली बात है कि दुनिया में वैट पर आधारित सर्वश्रेष्ठï पत्रिका वैट मॉनिटर उन सभी देशों को शामिल करती है जहां करों को या तो वैट या फिर जीएसटी के नाम से जाना जाता है।
 
यह बात भी समझनी होगी कि वैट मूलभूत रूप में किसी टर्नओवर टैक्स से अलग होता है। टर्नओवर कर कुल उत्पादन पर लगने वाला शुल्क है। एक बार इनपुट टैक्स क्रेडिट की इजाजत मिलने के बाद यह वैट बन जाता है। सर्वोच्च न्यायालय के एक निर्णय में कहा गया था कि केंद्रीय उत्पाद शुल्क वैट और और सेवा कर भी। यह कहना सही नहीं होगा। केंद्रीय उत्पाद शुल्क सन 1986 तक एक टर्नओवर कर था। उस वक्त कुछ विशिष्टï वस्तुओं के लिए मोडवैट (संशोधित वैट) लागू किया गया। हालांकि यह सभी वस्तुओं पर लागू नहीं होता था, पूंजीगत वस्तुओं पर तो कतई नहीं। 
 
ऐसे में यह आंशिक रूप से टर्नओवर कर था और आंशिक तौर पर वैट। पूंजीगत वस्तुओं के लिए इनपुट क्रेडिट की इजाजत सन 1994 के केंद्रीय बजट में दी गई। तभी यह वैट बन पाया। इसी प्रकार सन 1994 के बजट में जब सेवा कर लागू किया गया तो केवल चार सेवाओं पर कर लगाया गया था। उस वक्त भी कोई इनपुट टैक्स क्रेडिट नहीं दिया गया था। उसकी शुरुआत बाद में की गई। कर योग्य सेवाओं की तादाद लगातार बढ़ती गई लेकिन कभी भी समस्त सेवाओं पर कर नहीं लगाया गया। यही वजह है कि सेवा कर कभी भी वैट नहीं बन पाया। यह एक टर्नओवर कर बना रहा जहां इनपुट टैक्स क्रेडिट नहीं दिया गया और यह ऐसा वैट बन गया जहां इनपुट क्रेडिट दिया गया था। 
 
मूलभूत स्थिति यह है कि ये न तो केंद्रीय उत्पाद शुल्क है और न ही सेवा कर या वैट। यह एक ऐसा वैट है जो इस बात पर निर्भर है कि इनपुट टैक्स दिया जाता है या नहीं।  आलोचना यह भी रही कि मौजूदा जीएसटी में पेट्रोलियम, शराब और अचल संपत्ति को शामिल नहीं किया गया। पेट्रोलियम और शराब को इस दायरे से बाहर रखा गया ताकि राज्य जरूरत के मुताबिक कुछ राजस्व हासिल कर सकें। अचल संपत्ति को शामिल न कर सही किया गया क्योंकि यह न तो वस्तु है और न ही सेवा। इसे जीएसटी में शामिल करने के लिए व्यापक संविधान संशोधन की आवश्यकता है। इसमें राज्य सूची के 63, 54, 49 और 18 तथा केंद्र सूची के प्रावधान 84 को शामिल करना होगा। यह फिलहाल न तो व्यवहार्य है और न ही वांछित। आम आलोचना यह है कि दरों की विविधता की वजह से कानूनी मामले बनेंगे। असली विवाद 12 और 18 फीसदी की दर के बीच है। तमाम अन्य दरें एकदम स्पष्टï हैं और विशिष्टï भी। बहरहाल, आदर्श स्थिति यही होगी कि 12 और 18 फीसदी के स्थान पर 16 फीसदी की दर तय की जाए। निष्कर्ष यही है कि मौजूदा जीएसटी सर्वश्रेष्ठï भले न हो लेकिन यह बेहतर है।
 
(लेखक केंद्रीय उत्पाद शुल्क और सीमा शुल्क बोर्ड के सेवानिवृत्त सदस्य हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं। )
Keyword: GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,,
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