बिजनेस स्टैंडर्ड - नीति निर्माण को लेकर विशिष्टï हो विचार
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Tuesday, November 21, 2017 12:02 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|
 
होम विशेष खबर

नीति निर्माण को लेकर विशिष्टï हो विचार

नीलकंठ मिश्रा /  August 09, 2017

देश के नीति निर्माण के लिए यह आवश्यक है कि देश की विशिष्ट परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए शोध कार्य किए जाएं। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं नीलकंठ मिश्रा

 
आजादी को सात दशक से अधिक वक्त बीत चुका है। इस पूरी अवधि में देश में लोकतांत्रिक शासन ही रहा है। परंतु इसके बावजूद हम अब तक देश की आबादी के एक बड़े हिस्से तक पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास, बिजली तथा हर मौसम में काम आने वाली सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएं मुहैया नहीं करा पाए हैं। इसके लिए केवल खराब क्रियान्वयन या राजनीतिक कट्टïरता को वजह नहीं बताया जा सकता। इस पूरी अवधि में जो आर्थिक उपाय अपनाए गए उनमें भी कहीं न कहीं कमी देखने को मिली। आखिरकार, अगर कोई मरीज इलाज के दौरान लगातार संघर्ष करता है और ठीक नहीं हो पाता है तो चिकित्सक को भी इसका दोष तो सहना ही होगा। अगर इसका विश्लेषण किया जाए तो कहीं अधिक गहन मुद्दे सामने आ सकते हैं लेकिन एक बात यह भी है कि कहीं आयातित आर्थिक नीतियों पर अत्यधिक भरोसा भी इसकी वजह हो सकता है। 
 
एक सामान्य उदाहरण की मदद से इस विषय को समझा जा सकता है। दशकों तक सरकार के आकार को लेकर असहजता बनी रही कि सरकार का आकार बहुत बड़ा है। यह असहजता केवल विदेशी टीकाकारों की बात में नहीं झलकती थी बल्कि देसी प्रशासकों की बात में भी यह नजर आती थी। सरकार की ओर से ऋण के आधिक्य ने निजी निवेश को प्रभावित किया। इससे पूंजी की लागत बहुत बढ़ गई और आर्थिक दृष्टिï से अहम कई क्षेत्रों में सरकार के एकाधिकार ने उन क्षेत्रों का उचित विकास नहीं होने दिया। बहरहाल शायद इसी असहजता की वजह से कानून-व्यवस्था और शिक्षा जैसे अहम क्षेत्रों में सरकार का आकार लंबे समय से संक्षिप्त ही रहा है। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश में पुलिस कर्मियों की संख्या को दोगुना करने की आवश्यकता है। अगले पांच साल तक उन्हें हर वर्ष 30 हजार नए जवानों को भर्ती करना होगा। उल्लेखनीय है कि यह अहम कमी है जिसे कई साल पहले दूर कर लिया जाना चाहिए था। इन उपायों के बावजूद उत्तर प्रदेश की आबादी के अनुपात में पुलिस बल की मौजूदगी बमुश्किल राष्टï्रीय औसत के पार पहुंचेगी। हमारा राष्टï्रीय औसत वैसे भी दुनिया में बहुत कम में से है। अगर कानून व्यवस्था बेहतर नहीं हो तो कोई भी अर्थव्यवस्था स्वस्थ नहीं रह सकती है और कानून व्यवस्था बेहतर रखने के लिए पर्याप्त पुलिस बल की मौजूदगी अनिवार्य है। 
 
आजादी के बाद के शुरुआती सालों में देश की शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह विकसित नहीं थी। उस वक्त विदेशी विश्वविद्यालयों से विशेषज्ञ बुलाना उचित था। उस वक्त वे आर्थिक विशेषज्ञ वही आर्थिक ढांचा लेकर आए जिसका उनको प्रशिक्षण हासिल था। अगर ये सिद्घांत अपने जन्मस्थान पर सफल थे तो भी भारत में उनकी सफलता की बात तो हमेशा से संदिग्ध थी। मुक्त बाजार को लेकर छिड़ी बहस के इर्दगिर्द इस बात पर किसी ने ध्यान ही नहीं दिया कि मूलभूत ढांचा ही नदारद है। बाजार को मुक्त रखना या उसे नियंत्रित रखना अपने आप में कोई मायने नहीं रखता है जब तक कि वस्तुओं और सेवाओं का आवागमन ही सुचारु न हो। इसके बाद विश्व बैंक और अंतरराष्टï्रीय मुद्रा कोष की फंडिंग पर अत्यधिक निर्भरता ने भी हमें उनका ढांचा अपनाने पर विवश किया। हमने मूल्यांकन के भी उनके ही मानक इस्तेमाल करने शुरू कर दिए, भले ही वे भारत के लिए अच्छे न रहे हों। 
 
फिलहाल ये दोनों ही बाधाएं नहीं रहीं। निजी पूंजी की आवक हो रही है और हमारे यहां न केवल श्रेष्ठï संस्थान और उत्कृष्टï शोधकर्ता हैं बल्कि पश्चिमी विश्वविद्यालयों में भी ऐसे केंद्र स्थापित किए गए हैं जहां भारत के बारे में या भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में अध्ययन-अध्यापन किया जाता है। इसके बावजूद हमने उन आर्थिक विश्लेषणों और नीतिगत विचारों को अधिक तवज्जो नहीं दी है जो भारत के लिए विकसित किए गए। बीते महीने मुझे ऐसे दो अनुभव हुए जो मेरे इस विचार की पुष्टिï करते हैं। 
 
जुलाई महीने में इंडिया पॉलिसी फोरम में अपनी बात रखते हुए देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार डॉ. अरविंद सुब्रमण्यन ने देश में नीति निर्माण के लिए उपयुक्त आर्थिक शोध की कमी पर निराशा जाहिर की। उन्होंने कहा कि देश के समक्ष जो समस्याएं मौजूद हैं उन्हें देखते हुए पर्याप्त शोध नहीं किया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि देश के श्रेष्ठï अर्थशास्त्रियों की विशेषज्ञता जरूरत के वक्त सरकार को नहीं मिल पाती। उसके बाद गत सप्ताह आईआईटी कानपुर के मेरे साथी ने सिविल इंजीनियरिंग के एक प्राध्यापक के साथ अनौपचारिक बातचीत में इसके पीछे की अहम वजह पर कुछ प्रकाश डाला। वह सस्ते मकानों की गुणवत्ता तय करने से जुड़ी कठिनाई पर प्रकाश डाल रहे थे। 
 
उन्होंने कहा कि मकान बनाने की तय मानक सामग्री में सीमेंट, इस्पात और ईंट आदि आते हैं। इनका इस्तेमाल हर तरह का मकान बनाने में किया जाता है। लेकिन सस्ते आवासों को लेकर कोई तयशुदा मानक नहीं है क्योंकि पश्चिमी देशों में ऐसी किसी समस्या पर कभी शोध नहीं किया गया। वहीं भारत में शोधकर्ताओं ने इस पर ध्यान नहीं दिया क्योंकि ऐसा कोई शोध अंतरराष्टï्रीय जर्नल के काम का नहीं था। जब तक हमारे अकादमिक जगत के लोगों का आकलन ऐसे जर्नल में उनके प्रकाशन को आधार मान कर किया जाता रहेगा तब तक शोध को प्रेरणा कहां से मिलेगी? भारतीय जर्नलों को प्राय: कमतर माना जाता है और यही वजह है कि उनके प्रकाशन के साथ कोई लाभ भी नहीं जुड़ा है। 
 
ऐसे में आश्चर्य नहीं कि सरकारी क्षेत्र के बार या सरकार समािथर््ात संस्थानों और थिंक टैंक आदि में भी उन मसलों को लेकर पर्याप्त शोध नहीं हो रहा है जो नीति निर्माण को प्रभावित कर सकें। देश के सर्वश्रेष्ठï मस्तिष्क दुनिया की समस्याएं हल करने में मुब्तिला हैं। हमारी नीतियां भी कुछ ऐसी हैं कि वे ऐसा करने को प्रोत्साहित होते हैं। बीते कुछ वर्ष के दौरान 'मेक इन इंडिया' सुर्खियों में रहा। कुछ लोगों ने 'मेक फॉर इंडिया' का नारा भी बुलंद किया। ऐसे में मेरा कहना है कि 'थिंक फॉर इंडिया' पर विचार करने की आवश्यकता है और इसे 'मेक इन इंडिया' के समान प्रचार की आवश्यकता भी नहीं होगी। यह कहीं अधिक प्रभावी भी साबित हो सकता है। वहीं 'थिंक इन इंडिया' की मदद से समस्याओं के निवारण की दिशा में हम कुछ आगे बढ़ सकते हं। हालांकि हमेशा ऐसा हो यह जरूरी नहीं है। 
 
(लेखक क्रेडिट सुइस के इंडिया इक्विटी स्ट्रैटेजिस्ट हैं। लेख में प्रस्तुत विचार पूर्णतया निजी हैं। )
Keyword: niti ayog, नीति निर्माण,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 इन्फ्रा के दर्जे से लॉजिस्टिक्स को मिलेगा बढ़ावा?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS General News   Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.