बिजनेस स्टैंडर्ड - शिक्षा की स्थिति
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शिक्षा की स्थिति

संपादकीय /  August 09, 2017

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने शिक्षा का अधिकार अधिनियम के अधीन 'नो डिटेन्शन' नीति (अनुत्तीर्ण न करने की नीति) में संशोधन का निर्णय लिया है। यह देश में स्कूल छोडऩे वाले बच्चों की शिक्षा के निराशाजनक हालात में सुधार की दिशा में छोटा लेकिन अहम कदम है। सच तो यह है कि 24 राज्यों में संसदीय संशोधन की उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा की जा रही है ताकि अकादमिक वर्ष 2018 से स्कूली विद्यार्थियों की आकलन के आधार पर प्रोन्नति की जा सके। इससे यही संकेत मिलता है कि केंद्र सरकार इस हकीकत को समझ रही है कि 20 फीसदी से अधिक बच्चे कक्षा 9 में स्कूल छोड़ देते हैं और यह कहीं न कहीं व्यवस्था की गड़बड़ी है। मौजूदा कानून के तहत बच्चों को स्कूल में बने रहने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। कक्षा 8 तक उनको स्वत: आगे बढऩे दिया जाता है। इस प्रावधान के आने के बाद जो कानून बनेगा उसके तहत राज्यों को यह अनुमति होगी कि वे कक्षा 5 और कक्षा 8 के बाद वर्षांत में छात्रों का आकलन कर सकें। ये वे वर्ष हैं जब बच्चे माध्यमिक शिक्षा लेते हैं। अगर बच्चे उस आकलन में अनुत्तीर्ण होते हैं तो राज्य के पास अधिकार होगा कि वह चाहे तो दो माह बाद बच्चों की दोबारा परीक्षा ले। जो बच्चे दो बार अनुत्तीर्ण हो जाएं उनको आगे रोका जा सकता है। 

 
अगर ऐसा होता है तो कम से कम यह संभावना बनेगी कि राज्य प्रशासन स्कूलों और शिक्षकों पर दबाव बनाए कि वे अकादमिक रूप से पिछड़े बच्चों को बेहतर तैयारी कराएं। बहरहाल, यह तभी कारगर होगा जबकि शिक्षण मानकों में भी बेहतरी लाई जाए। एक के बाद एक  वेतन आयोग के आगमन और वेतन भत्तों में बेहतरी के बावजूद शिक्षण के मानक कमजोर बने हुए हैं। इस कमजोरी की वजह से हमारा देश बहुचर्चित जननांकीय लाभांश का लाभ नहीं उठा पा रहा है। जबकि नीति निर्माता भविष्य को लेकर जब भी कोई बात करते हैं तो उसमें जननांकीय लाभांश का उल्लेख शामिल रहता है। इसमें दो राय नहीं कि देश के अधिकांश बच्चों को शिक्षण के लिए पर्याप्त सामग्री नहीं मिल पाती। ऐसे में साल के अंत में होने वाली परीक्षा में बड़ी तादाद में बच्चे अनुत्तीर्ण भी हो सकते हैं। अगर ऐसा हुआ तो अधिनियम का उद्देश्य विफल रहेगा। 
 
प्रथम एजुकेशन फाउंडेशन की 2016 की सालाना शिक्षा संबंधी रिपोर्ट बहुत निराशाजनक तस्वीर पेश करती है। स्कूलों में नामांकन सुधरने के बावजूद शौचालय, पक्के भवन और अन्य सुविधाओं के मामले में, लैंगिक अंतर, गणित और पढऩे के कौशल, देश के ग्रामीण इलाकों में शिक्षा के स्तर आदि के मामले में हम पीछे हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि कक्षा 5 के बच्चों में पढऩे का स्तर वर्ष 2011 और 2016 के बीच जस का तस रहा। कक्षा 8 के छात्रों के लिए इस मानक में इस अवधि में कमी आई। सामान्य गणितीय कौशल में कक्षा 5 के बच्चे बहुत खराब स्थिति में हैं जबकि हमारा देश सूचना प्रौद्योगिकी जगत की ताकत होने का दम भरता है। बमुश्किल एक चौथाई बच्चे सामान्य गुणा-भाग कर सके। कक्षा 8 के बच्चों में यह अनुपात बेहद खराब हुआ। सन 2010 में जहां 68.4 फीसदी बच्चे ऐसा कर पाते थे वहीं 2016 में यह तादाद 43.3 फीसदी रह गई। 
 
समस्या इस वजह से भी है क्योंकि शिक्षण को अभी भी दूसरे दर्जे का काम माना जाता है। यानी लोग जब कोई काम करने में नाकाम रहते हैं तो वे शिक्षक बन जाते हैं। सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति में जो भ्रष्टाचार है वह भी सरकारी शिक्षा के संकट का अहम बिंदु है। इन मुद्दों से शीघ्र निपटने की आवश्यकता है ताकि हम ऐसा देश न बन जाएं जहां उच्च प्रतिस्पर्धा वाले विश्व में अशिक्षित बच्चे बाहर निकलें।
Keyword: cabinet, education, student,,
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