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'ओपेक की ढिलाई से तेल गिर सकता है 42 डॉलर तक'

राजेश भयानी /  August 08, 2017

पिछले साल पेट्रोलियम निर्यातक देशों के समूह ओपेक के सदस्य देशों और कुछ अन्य गैर-सदस्य देशों के बीच कच्चे तेल के उत्पादन को घटाने को लेकर हुए समझौते को अमलीजामा पहनाने में कई अड़चनें आ रही हैं। लंदन की नेटिक्सिज ग्लोबल कमोडिटीज मार्केट्स रिसर्च के मुख्य ऊर्जा विश्लेषक अभिषेक देशपांडे ने राजेश भयानी को बताया कि तेल की कीमतें बढऩे में लंबा समय लग सकता है। बातचीत के अंश : 

 
तेल की कीमतें नीचे आ रही हैं। इसकी वजह ओपेक के सदस्य देशों के अपने कोटे से ज्यादा उत्पादन करना है या शेल तेल की आपूर्ति बढऩा है? 
 
दोनों। शेल तेल का उत्पादन बढ़ा है। इसकी वजह यह है कि अमेरिकी उत्पादक अपनी लागत घटा रहे हैं और ओपेक और गैर-ओपेक देशों के बीच समझौते के बाद 2017 में होने वाले उत्पादन की ऊंची कीमतों पर हेजिंग कर रहे हैं।  ओपेक सदस्यों का उत्पादन भी बढ़ रहा है, जिन्होंने कभी उत्पादन की सीमा तय नहीं की, विशेष रूप से लीबिया और नाइजीरिया। इस अतिरिक्त तेल के उत्पादन से ओपेक के अन्य सदस्य देश भी समझौते का पूरी ईमानदारी से पालन नहीं कर रहे हैं। सदस्य देश समझौते का पालन करते हुए थक चुके हैं। यह ओपेक के लिए सबसे खराब स्थिति है, जब तेल की कीमतें भी कम हैं और निर्यात भी कम बना हुआ है। सटोरिया निवेशक भी तेल में बड़ी खरीद से पहले सतर्कता बरत रहे हैं। 
 
ओपेक की हाल की बैठक में उत्पादन कटौती के समझौते की खामियां दूर करने का फैसला किया गया है। इससे कीमतों पर क्या असर पड़ेगा? साल के अंत में ब्रेंट और डब्ल्यूटीआई (क्रूड तेल) की कीमतें किस स्तर पर होंगी? 
 
जब तक लीबिया, नाइजीरिया और ईरान अपने उत्पादन में संभावित कटौती नहीं करते और अन्य ओपेक सदस्य  समझौते पर ईमानदारी से अमल नहीं करते, तेल की कीमतों को बढऩे में ज्यादा समय लगेगा। हमारा अनुमान है कि ब्रेंट की कीमतों का औसत करीब 55 डॉलर प्रति बैरल रहेगा। लेकिन अगर नाइजीरिया और लीबिया तेल उत्पादन बढ़ाते रहे और ओपेक के अन्य सदस्यों ने भी समझौते का पूरी ईमानदारी से पालन नहीं किया तो ब्रेंट के औसत दाम 42 डॉलर प्रति बैरल पर आ सकते हैं। 
 
बाजार में निवेशकों का क्या रुख है? 
 
उन्होंने फरवरी से जून के बीच अपनी शुद्ध लॉन्ग पॉजिशन में 50 करोड़ बैरल ब्रेंट एवं डब्ल्यूटीआई अनुबंधों की कमी की है। हालांकि जुलाई में सटोरियों की शुद्ध लॉन्ग पॉजिशन में 12 करोड़ बैरल ब्रेंट एवं डब्ल्यूटीआई के अनुबंधों का इजाफा हुआ है। मगर यह फरवरी के स्तर की तुलना में बहुत कम है। 
 
तेल की कीमतें नियंत्रित रहने से रिफाइनिंग कारोबार और रिफाइंड उत्पादों की कीमतों पर क्या असर पड़ेगा? 
 
रिफाइनरी के लिए वर्ष 2015 और 2016 अच्छे रहे। वर्ष 2017 में अब तक पूरे विश्व में उन्हें अच्छा मार्जिन मिल रहा है। कारण कि तेल की अच्छी मांग है और कीमतें तेजी से नहीं बढ़ रही हैं। हालांकि यह संभव है कि कुछ वजहों से यह वर्ष पिछले साल जितना अच्छा नहीं रहे।
 
जब कीमतें करीब 30 डॉलर प्रति बैरल थीं, तब भारत और चीन ने स्टॉक किया था। क्या आपको लगता है कि वे फिर ऐसा करेंगें और अगर हां तो किस कीमत स्तर पर? 
 
भारत और चीन के लिए रणनीतिक भंडार हमेशा अहम रहा है। यह तेल की कीमतों और उपलब्ध भंडारण क्षमता पर निर्भर करता है। चीन पहले और दूसरे चरण की भंडारण क्षमताएं बना चुका है और उसके पास 25 करोड़ बैरल के भंडारण की क्षमता है। भारत इस मामले में पीछे है, लेकिन वह तेजी से अपनी भंडारण क्षमता बना रहा है। इस समय भारत में जितनी क्षमता तैयार करने की योजना बनाई गई है, वह 11 करोड़ बैरल है। इसमें से 3.8 करोड़ बैरल का स्टॉक किया जा चुका है। भारत और चीन अपने रणनीति भंडार को भरने के लिए कच्चे तेल का और आयात कर सकते हैं, लेकिन आम धारणा के विपरीत अगर कीमतें कम रहने रहीं तो तुरंत भंडार भरने का रुझान सुस्त रह सकता है। 
Keyword: cruid oil, market, price,,
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