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केंद्रीय मंत्रिपरिषद का पुनर्गठन करना जरूरी

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  August 08, 2017

संसद का मॉनसून अधिवेशन इसी सप्ताह समाप्त होने वाला है। पूरी संभावना है कि संसद सत्र समाप्त होते ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी मंत्रिपरिषद के पुनर्गठन की मुहिम में लग जाएंगे। मोदी सरकार के कार्यकाल का तीन साल बीत चुका है लेकिन इससे पहले कभी भी मंत्रिपरिषद पुनर्गठन की जरूरत इतनी शिद्दत से महसूस नहीं की गई थी। पिछले कुछ महीनों में मोदी सरकार के तीन वरिष्ठ मंत्री मंत्रिमंडल से बाहर निकल चुके हैं और उनके द्वारा संभाले जा रहे मंत्रालयों को अन्य कैबिनेट मंत्रियों के हवाले किया गया है। इस साल मार्च के महीने में मनोहर पर्रिकर ने रक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा देने के बाद गोवा के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी। उसके बाद वित्त मंत्री अरुण जेटली को रक्षा मंत्रालय का भी अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया। जेटली के पास पहले से ही वित्त और कंपनी मामलों के मंत्रालय की जिम्मेदारी थी लिहाजा उन पर रक्षा मंत्रालय के रूप में तीसरे मंत्रालय का भी बोझ आ गया।

 
पिछले महीने एम वेंकैया नायडू को जब सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की तरफ से उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाने का फैसला लिया गया तो उन्होंने भी शहरी विकास और सूचना प्रसारण मंत्री के अपने पद से इस्तीफा दे दिया। नायडू के इस्तीफे के बाद कपड़ा मंत्री स्मृति ईरानी को सूचना प्रसारण मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार दिया गया जबकि शहरी विकास मंत्रालय का प्रभार नरेंद्र सिंह तोमर को सौंपा गया। तोमर के पास पहले से ही ग्रामीण विकास, पंचायतीराज , पेयजल और स्वच्छता मंत्रालयों की जिम्मेदारी थी। इस तरह तोमर पर एक साथ चार मंत्रालयों को संभालने का भारी बोझ पड़ गया है। गत मई महीने में पर्यावरण एवं वन मंत्री अनिल माधव दवे के असामयिक निधन की वजह से भी एक और स्थान रिक्त हुआ था। दवे के निधन के बाद उनके मंत्रालय की जिम्मेदारी हर्षवद्र्धन को सौंपी गई। उनके पास पहले से ही विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के अलावा पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय का भी जिम्मा था। ऐसी स्थिति में मंत्रिमंडल के प्रस्तावित फेरबदल में प्रधानमंत्री मोदी के सामने पहली चुनौती अतिरिक्त मंत्रालयों के बोझ से दबे मंत्रियों को राहत दिलाने की होगी। इसका मतलब है कि मंत्रिमंडल में नए मंत्रियों को शामिल करना होगा लेकिन राजग में मंत्री बनाने लायक नेताओं की कमी को देखते हुए ऐसा कर पाना आसान नहीं होगा। 
 
फिर प्रधानमंत्री मोदी के पास रास्ता क्या बचता है? इस मौके का इस्तेमाल वह 'अधिकतम शासन न्यूनतम सरकार' के अपने पुराने वादे को पूरा करने में कर सकते हैं। अगर प्रधानमंत्री अपनी सरकार के शीर्ष ढांचे का आकार कम करने में सफल रहते हैं तो वह अपने वादे को पूरा करने की दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं। ऐसा करने से मोदी को मंत्रालयों का जिम्मा संभालने लायक नेताओं की कमी की समस्या से भी राहत मिल सकती है। वह कुछ मंत्रालयों को एक-दूसरे में समाहित करने के प्रस्ताव पर अमल करने की दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं। 
 
मसलन, एयर इंडिया की बिक्री का प्रस्ताव होने के साथ क्या अब अलग से नागरिक विमानन मंत्रालय की कोई जरूरत रह गई है? नागरिक विमानन आखिर एक बहुउद्देशीय परिवहन मंत्रालय का हिस्सा क्यों नहीं हो सकता है? परिवहन मंत्रालय के तहत ही एक राज्य मंत्री को नागरिक विमानन का प्रभार सौंपा जा सकता है। असल में रेलवे, सड़क, राजमार्ग, जहाजरानी, जल मार्ग और विमानन सभी को एक साथ समाहित कर एक बड़े मंत्रालय में ला दिया जाए और एक कैबिनेट मंत्री को उसका नेतृत्व सौंपने के साथ संबंधित विभागों का जिम्मा राज्यमंत्रियों को दे दिया जाना चाहिए।
 
मोदी पहले भी ऊर्जा क्षेत्र से संबंधित विभागों को एक ही मंत्री के तहत लाने का काम कर चुके हैं। हालांकि पेट्रोलियम के अलावा सभी ऊर्जा क्षेत्रों को एक मंत्रालय में शामिल नहीं किया गया है। अब उनके सामने अगला कदम उठाने की चुनौती है। ऊर्जा से संबंधित सभी विभागों को एक ही बड़े मंत्रालय में ला दिया जाए जिसमें कोयला, बिजली, गैर-परंपरागत ऊर्जा और पेट्रोलियम विभाग भी शामिल हों। इस ऊर्जा मंत्रालय का नेतृत्व एक कैबिनेट मंत्री करें और संबंधित विभागों के लिए एक-एक राज्य मंत्री बना दिए जाएं। वैसे सामरिक वजहों से नाभिकीय ऊर्जा विभाग सीधे प्रधानमंत्री के पास ही बने रहने देना होगा। आखिर सरकार को इस्पात मंत्रालय में ही दो मंत्रियों को रखने की क्या जरूरत है? एक को कैबिनेट मंत्री बनाया गया है तो दूसरा राज्य मंत्री है। इस्पात को एक समग्र उद्योग मंत्रालय का ही हिस्सा क्यों न बना दिया जाए? इसी तरह सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग और भारी उद्योग एवं सार्वजनिक उपक्रम मंत्रालयों को अलग-अलग बनाए रखने का क्या औचित्य है? समझदार विकल्प तो यह होता कि इन तीनों मंत्रालयों को एक ही उद्योग मंत्रालय के मातहत ला दिया जाए। अगर बहुत जरूरी लगे तो एक कैबिनेट मंत्री के साथ संबंधित क्षेत्रों के लिए अलग राज्य मंत्री भी बनाए जा सकते हैं।
 
राजीव गांधी ने वर्ष 1985 में दो बड़े मंत्रालयों का गठन किया था। उसमें से मानव संसाधन विकास मंत्रालय का जिम्मा पी वी नरसिंह राव को सौंपा गया था जबकि परिवहन मंत्रालय का जिम्मा बंसीलाल को दिया गया था और सभी परिवहन विभागों के लिए अलग राज्य मंत्री भी बनाए गए थे। सियासी लाभ उठाने के लिए सरकारों ने लगातार इस सिद्धांत को नजरअंदाज करने का काम किया है। परिवहन मंत्रालय को अब भंग किया जा चुका है और फिर से पुरानी स्थिति बहाल हो चुकी है। इसी तरह मानव संसाधन विकास मंत्रालय से भी संस्कृति, कला, खेलकूद, युवा कल्याण, महिला और कौशल विकास को अलग कर या तो स्वतंत्र मंत्रालय या अलग विभाग बनाया जा चुका है। क्या मोदी एक बार फिर पुरानी कवायद को आगे बढ़ाने की पहल करेंगे? संबंधित कार्यों में लगे मंत्रालयों एवं विभागों को एक-दूसरे में समाहित कर सरकार को अधिक सक्षम एवं कारगर बनाया जा सकता है।
Keyword: parliament, BJP, congress,,
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